विवरण
1.प्रेम या व्यापार?
जिसे तुम प्रेम कहते हो, ज़रा उसकी तह में जाकर देखो,
क्या वो रूह का मिलन है, या बस एक गहरा समझौता?
तुमने जिसे अपना कहा, क्या उसे सच में जाना है?
या अपनी अधूरी हसरतों को, उसके कंधों पर लादना है?
एक 'मैं' है, एक 'तू' है, और बीच में भारी दीवार है,
दो भूखे मन मिल गए, तो कहते हो कि प्यार है।
ये प्यार नहीं, ये एक-दूसरे को खाने की तैयारी है,
ये साथ नहीं, ये एक-दूसरे की आज़ादी पर भारी है।
तुम चाहते हो वो वैसा हो, जैसा तुम्हारी पसंद है,
तो तुमने उसे प्यार कहाँ किया? वो तो तुम्हारी पसंद में बंद है।
अगर वो बदल जाए ज़रा सा, तो तुम्हारी दुनिया हिलती है,
ये प्रेम नहीं है साहिब, ये तो बस स्वार्थ की खेती है।
सच्चा प्रेम तो वो है, जो तुम्हें खुद से आज़ाद कर दे,
जो तुम्हारे 'अहंकार' के किलों को, पूरी तरह बर्बाद कर दे।
जहाँ 'पाने' की कोई चाह नहीं, बस 'होने' का उल्लास है,
जहाँ दूरी होकर भी लगे, कि सत्य बिल्कुल पास है।
वो जो तुम्हें बांध ले, वो मोह की एक ज़ंजीर है,
वो जो तुम्हें मुक्त कर दे, वही असली पीर है।
देह के पार जो देख सके, उस चेतना का नाम प्रेम है,
बाकी जो है इस दुनिया में, वो बस मन का एक वहम है।
जिस दिन तुम खुद के लिए, पर्याप्त और पूरे हो जाओगे,
उस दिन तुम किसी को पाने के लिए, कभी न हाथ फैलाओगे।
तभी जन्म लेगा वो प्रेम, जो न कभी मरता है, न घटता है,
वो सूरज जैसा होता है, जो बस अपनी मस्ती में चमकता है।