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महाभारत की कहानी - भाग-१७५ अश्वत्थामा द्वारा धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पुत्रों...
थाइलैंड में चाय को ‘चा’ कहते हैं जिसमें दूध नहीं डाला जाता। दूध मिलाकर चाय प्राय...
व्यंग्यनंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेजविवेक रंजन श्रीवास्तव इंदौर मे...
भाग चारचिट्ठी का इंतजारउस दिन डाकिया चाचा की साइकिल गली में बहुत देर तक खड़ी रही...
शरीर पर लगे घाव तो भरने के लिए ही होते हैं,किंतु मन पर लगे घाव शरीर को भीतर से ख...
अध्याय एक: अपराधीमुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर...
तकरार से तकरार तकखन्ना मेंशन में सुरक्षा के घेरे और कड़े कर दिए गए थे। देब ने रा...
हॉस्पिटल में आईसीयू के बाहर की हवा भारी थी, जिसमें फिनाइल की तीखी गंध और वेंटिले...
Next Ep,,, Jin को खुद में बड़बड़ाते देख Rm चिल्लाया "भाई जल्दी पास कर,, म्यूजिक...
अंकित एक टाइम के लिए मान ली कि तुम्हें एक अच्छी सी जॉब मिल गई है। तुम्हारी शादी...
एक भयानक खोज दिल्ली की पुरानी लाइब्रेरी, जहां धूल से भरे शेल्फ़ और पन्नों की हल्की महक थी, रिया का पसंदीदा ठिकाना था। 22 साल की रिया, इतिहास की छात्रा थी, और उसे लगता था कि हर पुर...
रात इतनी गहरी थी कि चाँद की रौशनी भी शायद डर के छिप रही थी। बारिश की बूंदें पत्थरों पर जोर से गिर रही थीं, और हर तरफ सिर्फ अंधेरा था।यह कहानी है २२ साल के आरव की, जो कुछ ही समय पहल...
खामोश पेंटिंग की पहली साँस पुरानी गली की वह कला-दुकान हमेशा की तरह उस शाम भी आधी अँधेरे में डूबी हुई थी। बाहर बारिश की हल्की बूँदें पत्थरों से टकरा रही थीं और अंदर हवा में पुरान...
एक बार की बात है—निलेश, जय और पार्थ देर रात निलेश के घर पर पार्टी कर रहे थे। पार्टी खत्म होने के बाद जय और पार्थ अपने-अपने घर के लिए निकल पड़े। जय तो अपने घर पहुँच गया, लेकिन पार्थ...
मुंबई की रातें— जो कभी हज़ारों सपनों की धड़कन हुआ करती थीं, वे अब अविन अविनाशी चौहान के लिए किसी रोमांच से नहीं, बल्कि एक खामोश मजबूरी से भरी थीं। यह नवंबर की उमस भरी रात थी; मरीन...
कुछ प्रेम कहानियाँ ज़मीन पर शुरू होकर आसमान में बिखर जाती हैं। कुछ, मौत के बाद भी नहीं मिटती है । ये कहानी है एक ऐसे प्यार की, जो अधूरा रह गया… और एक ऐसी रूह की, जो अब अधूरी नही...
उस सड़क के बारे में गांव के बुजुर्ग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद वह रास्ता किसी और ही दुनिया में चला जाता है। जो वहां गया वह लौटा जरूर है पर पहले जैसा कभी नहीं रहा। उसी सड़क पर उस र...
हिमालय की ढलानों पर रात पूरी तरह उतर चुकी थी। देवदार के घने जंगल के बीच बने छोटे-से कैम्प में एक अलाव जल रहा था, जिसकी लपटें सबके चेहरों पर नारंगी रोशनी बिखेर रही थीं। ठंडी हवा तम्...
ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो हमारी अक़्ल और समझ से बाहर होती हैं। आप मानें या न मानें, लेकिन उन बातों को नकारा नहीं जा सकता। वे अपने आप को सच साबित कर ही देती हैं।...
(हॉरर ) गांव नरकटिया के दक्षिण कोने में एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे कोई नहीं जाता था। उसकी शाखाएं आसमान से बातें करती थीं, और हवा से फुसफुसाती थीं। लोग कहते थे, “वो पी...
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