सर्वश्रेष्ठ लघुकथा कहानियाँ पढ़ें और PDF में डाउनलोड करें

नीला रूमाल
द्वारा Abha Yadav

       "अब,कैसी हो?" एक अजनबी आवाज सुनकर मैंने आवाज की तरफ अपनी गर्दन घुमानी चाही तो मेरे होठों से एक दर्द भरी सिसकारी निकल गई."बहुत दर्द हो ...

दो कहानियां...
द्वारा Anurag mandlik_मृत्युंजय

कहानी कहानी - 1  मददभीड़भरी बस में एक बूढ़ी औरत चढ़ी। "अरे आप  अंदर तो आइए मैं जगह कर दूंगा.." कण्डक्टर ने लगभग दबाते हुए उनको अंदर किया और पीछे ...

अनोखी मित्रता - 4
द्वारा Payal Sakariya

 हमने देखा था कि  ( दिशा पढ़ रही होती हैं , तभी फोन की रिंग बजती है । ) अब आगे .....                ...

सैनिक
द्वारा Atul Kumar Sharma ” Kumar ”
  • 96

ठण्ड और बढ़ती जा रही थी।भयंकर बर्फ के बीच अपनी पोस्ट पर मुस्तेदी से पहरा देते हुए रूपेश और अकबर पल भर के लिए भी आँख नही झपका सकते ...

आज फिर एक उम्मीद मिट गई
द्वारा Krishna Kaveri K.K.
  • 118

उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी। मैं अपनी लोकल ट्रेन में कॉलेज के एक ट्रेनिंग प्रोग्राम से वापस लौट रही थी। मेरे सामने की सीट पर एक ...

दीवाना राजा
द्वारा प्रवीण बसोतिया
  • 259

कलयुग की शुरुआत से पहले ही महाभारत का युद्ध हुआ। ये कहने अति सहज होगा। कि नारी की लाज स्वमं भगवान को बचानी पड़ी और द्रौपती को जब सभी ...

मेरा घर
द्वारा Sunita Agarwal
  • 208

आज लगभग दो बर्ष का समय  हो गया है सुदेश और शो की बोलचाल बन्द हुए। ऐसा नहीं कि शोभा बोलती नहीं वो सुदेश की हर चीज़ का ख्याल ...

सिंदूरी मांग
द्वारा Deepika Mona
  • (13)
  • 639

नमस्कारलॉकडाउन में इतने दिन हो गए घर पर गए हुए पूरे 5 महीने, आज पापा मम्मी मेरे घर पे ही मिलने आ गए बहुत दिनों के बाद उन्हें देखा ...

एक कहानी ऐसी भी
द्वारा Sasmita Singh
  • 360

रात कि १२ बज छुके थे । अनुराधा को नींद आ नहीं रही थी। करवटें बदल रही थी और अपनी किसी खयालात कि दुनिया में खो गई थी । ...

ज़िन्दगी की धूप-छाँव - 5
द्वारा Harish Kumar Amit
  • 177

ज़िन्दगी की धूप-छाँव हरीशं कुमार ’अमित' चोरी इतवार की शाम को साहब ने अपने दोस्तों के साथ अगले दिन दोपहर को किसी रेस्टोरेंट में खाना खाकर फिल्म देखने का ...

जाॅनी वी.
द्वारा Priyan Sri
  • 506

"पापा... आपने मेरी डायरी को हाथ भी कैसे लगाया...????" जाॅनी अपने पापा पर लगभग चीखते हुए झल्लाया। इधर डेविड भी अपने किशोरवय बेटे की डायरी में लिखे शब्दों को ...

प्लीज पापा
द्वारा SURENDRA ARORA
  • 348

प्लीज पापा " पापा ! आज आपकी बहुत याद आई. सब लोग हँस रहे थे.खुद हंसने के साथ - साथ,हँसा भी रहे थे. मैं चुप थी. मेरी समझ में ...

कोरोना के खिलाफ
द्वारा Uma Sonaviya
  • 174

नमस्कार मित्रोअभी  जो कोरॉना काल चल रहा है उसे हराने के लिए देश के सभी डॉक्टर पुलिस कर्मचारी सब अपनी अपनी ड्यूटी पे युद्ध  लड़़ रहे हैं उनकी जान ...

इंद्रधनुषी नावें
द्वारा RITA SHEKHAR MADHU
  • 183

इंद्रधनुषी नावें “ज्योंहि आसमान में बादल छाए, पवन भी आह्लादित हो गई| उसने शीतलता की चादर ओढ़ ली और मंद मंद बहकर प्रकृति के साथ कदमताल मिलाकर थिरकने लगी| ...

सीमा- एक अपूर्ण किन्तु पूर्ण प्रेम कहानी
द्वारा RISHABH PANDEY
  • 990

याद से  समय से आ जाना मैं रोड साइड खड़े होकर वेट नहीं करूँगी पहले ही बता देती हूँ- ( फोन पर) सीमा ने अवनीश से कहाहाँ बाबा...!!! आ ...

पेन फ्रेंड
द्वारा S Sinha
  • 235

                                                           ...

सूरज की पहली किरण
द्वारा Sheetal
  • (20)
  • 563

उस दिन रात को अस्पताल का एक कमरा खुला रह गया था. बालकनी में कोइ खड़ा फोन पर बातें कर रहा था.उसकी बातों से ये लग रहा था कि ...

यारी - 4
द्वारा Prem Rathod
  • 272

हम सब के मना करने के बावजूद भी रघु ने पानी में छलांग लगा दी, कुछ देर तक रघु पानी से बाहर नहीं आया। हम सब लोग वहीं पर ...

मेंहदी है रचने वाली
द्वारा Pragya Chandna
  • 347

प्रतिक्षा बहुत खुश है क्योंकि उसकी शादी उसके बचपन के दोस्त मोहित से तय हो गई है। मोहित जिसके साथ वह बचपन से पढ़ती, खेलती रही है। उसी मोहित ...

तुम और मैं - 1
द्वारा Rahul Pandey
  • (19)
  • 3.1k

तुम और मैं - अध्याय - 1 (उनसे मुलाकात) — बचपन के कुछ किस्सों और कहानियों से निकाली गई एक छोटी सी लेखनी है। मैं Rahul Pandey ( ...

अनोखी मित्रता - 3
द्वारा Payal Sakariya
  • 195

{हमने देखा था कि आरूष सोचता है , " ये decoration  पक्का दिशा का ही काम है।" } अब आगे ....... ‌           फिर भी वो झुठमुठ ...

Ludo (Part 1)
द्वारा Abhishek
  • 270

शाम होने को आयी थी | दोपहर से कभी तेज तो कभी हलकी हो रही बारिश अब थम चुकी थी | विनायक बाबू सुहानी शाम का मजा लेने बारिश ...

ज़िन्दगी की धूप-छाँव - 4
द्वारा Harish Kumar Amit
  • 257

ज़िन्दगी की धूप-छाँव हरीशं कुमार ’अमित' डर शाम को घर पहुँचकर मैंने बहुत डरते-डरते खिलौने का डिब्बा मुन्नू के हाथ में पकड़ाया. उसका जन्मदिन बीते एक हफ़्ता हो गया ...

मानसून की रात..
द्वारा Anurag mandlik_मृत्युंजय
  • 155

भादों का महीना था और इतने घने बादल छाए हुए थे कि दोपहर में ही ऐसा लगता था मानो रात हो गई हो। घने काले बादल और उसपर से ...

नाला में जिंदगी
द्वारा Archana Singh
  • 284

भोला अपने मां बाप का एकलौता बेटा गांव से शहर नौकरी करने के सिलसिले में आ जाता है। माता पिता जरा गरीब होते हैं लेकिन बेटे को लेकर उनके ...

ज़िन्दगी की धूप-छाँव - 3
द्वारा Harish Kumar Amit
  • 320

ज़िन्दगी की धूप-छाँव हरीशं कुमार ’अमित' रिश्तों का दर्द शाम के समय वह दफ़्तर से घर पहुँचा, तो उसे बहुत तेज़ भूख लगी हुई थी. उसने सोचा था कि ...

नाम.
द्वारा SURENDRA ARORA
  • 335

नाम " लगता है, पागल हो गए हो " " क्या हुआ, मैंने बावलों जैसा कौन सा काम किया है ? " " रोज - रोज फोन और वो ...

उसका अपराधी कौन???
द्वारा NISHA SHARMA ‘YATHARTH’
  • 392

कमला तुम आज भी देर से आयी हो तुम्हें पता है न कि तुम्हारे देर से आने पर मेरा पूरा दिन खराब हो जाता है, मुंह बनाते हुए मिसेज ...

आज का रावण
द्वारा Kusum
  • 353

मैं यह रचना किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं लिख रही। यदि किसी को कुछ अच्छा न लगे तो कमी बताएं। क्षमा प्रार्थी हूं यदि ...

हिम्मत-ए-मर्दा
द्वारा सतविन्द्र कुमार राणा बाल
  • 828

"शादी को सात दिन हो गए हैं। लेकिन कायदे से हमारी सुहागरात अभी तक नहीं हुई।"आज शायद उसका पति कुछ ठान कर ही आया था।पर उसकी तरफ से कोई ...