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बॉलीवुड लीजेंड्स
द्वारा Shakuntala Sinha
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      बॉलीवुड लीजेंडस     Part   1 .       दादा साहब फाल्के           जन्म 30 अप्रैल - 1870 , त्रयम्केश्वर ( नासिक ) , बॉम्बे ब्रिटिश इंडिया  ...

बहीखाता - 21
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 120

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 21 रिसेप्शन मुझे उनकी दो बातें चुभने लगी थीं। एक तो सिगरेट पीना और दूसरे शराब पीकर बड़बोला हो जाना। ...

बहीखाता - 20
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 140

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 20 सवाल मुझे पता था कि लंदन में इस समय ठंड होगी। ठंड तो दिल्ली में भी खूब थी। मैं ...

इज़्तिरार
द्वारा Prabodh Kumar Govil Verified icon
  • 208

(1)यदि कल्पना या सुनी सुनाई बातों का सहारा न लेना हो तो मुझे केवल पैंसठ साल पहले की बात ही याद है। अपने देखे हुए से दृश्य लगते हैं ...

बहीखाता - 19
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 182

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 19 उड़ान मैं और हवाई जहाज एकसाथ उड़ रहे थे। जहाज अपनी स्पेश में और मैं अपनी स्पेश में। यह ...

बहीखाता - 18
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 250

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 18 झूठा वायदा और चूड़ियों की खनक वैनकुवर के एयरपोर्ट से बाहर निकलते हुए सोच रही थी कि इस देश ...

बहीखाता - 17
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 214

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 17 जान बची ! मैं जज़्बों की बड़ी बड़ी लहरों पर टंगी फिरती थी। बाहर से मन में ठहराव रखती, ...

बहीखाता - 16
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 220

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 16 रिश्ता ज़िन्दगी के कई वर्ष गुज़र गए, घर का सपना अभी सपना ही था जिसको हक़ीकत की ज़मीन अभी ...

बहीखाता - 15
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 218

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 15 सह-संपादक अब मैंने साहित्य में आगे के कदम रखने शुरू कर दिए थे। मेरा एक मुकाम बन चुका था। ...

बहीखाता - 14
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 252

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 14 दिल्ली स्कूल ऑफ़ क्रिटिसिज़्म और वापसी जैसा कि मैंने पहले कहा, अब तक दिल्ली स्कूल ऑफ़ क्रिटिसिज़्म कायम हो ...

बहीखाता - 13
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 226

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 13 पीएच.डी. एक दिन मैं यूनिवर्सिटी में आयोजित हो रहे एक सेमिनार में हिस्सा लेने गई। वहाँ जाकर देखा कि ...

बहीखाता - 12
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 292

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 12 माँ का पति भापा जी के निधन के बाद मैं ही घर में ऐसी थी जो घर का खर्च ...

ज़बाने यार मन तुर्की - 3
द्वारा Prabodh Kumar Govil Verified icon
  • 340

एक बार एक महिला पत्रकार को किसी कारण से मीना कुमारी के साथ कुछ घंटे रहने का मौक़ा मिला। ढेरों बातें हुईं। पत्रकार महिला ने बातों बातों में मीना ...

बहीखाता - 11
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 238

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 11 छात्राओं जैसी लेक्चरर मैं मैत्रेयी कालेज में लेक्चरर लग गई। अपनी आयु की लड़कियों को और कई अपने से ...

बहीखाता - 10
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 236

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 10 यूनिवर्सिटी मैंने कालेज में प्रवेश तो ले लिया था, पर हमारी अधिकतर कक्षायें यूनिवर्सिटी में ही लगा करती थीं। ...

बहीखाता - 9
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 218

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 9 लड्डू घाटी लड्डू घाटी पहाड़गंज का विशेष मुहल्ला हुआ करता था/है। यह रेलवे स्टेशन के करीब पड़ता था/है। अब ...

ज़बाने यार मन तुर्की - 2
द्वारा Prabodh Kumar Govil Verified icon
  • 594

आम तौर पर फिल्मस्टारों को अपनी तरफ से कुछ बोलने का अभ्यास नहीं होता, क्योंकि उन्हें संवाद लेखक के लिखे संवाद बोलने के लिए दिए जाते हैं। लेकिन उस ...

बहीखाता - 8
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 264

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 8 कालेज की ज़िन्दगी कालेज में लड़के-लड़कियाँ एकसाथ पढ़ते थे, आपस में खुलकर बातें भी करते थे। कुछ एक जोड़े ...

क्या सुनाएं
द्वारा Ajay Kumar Awasthi Verified icon
  • 276

मुझे याद है स्कूल के वे दिन ,जब मैं सुबह सुबह तैयार होकर स्कूल के लिए पैदल निकलता था । सुबह एक कप चाय और रात की बासी रोटी ...

बहीखाता - 7
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 311

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 7 सपना भाबो अर्थात मामी हर समय मेरे अंग-संग ही रहती थी। कभी वह मुझसे पूछती कि मैं क्या बनना ...

बहीखाता - 6
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 365

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 6 माहौल हमारी गली का माहौल पूरी तरह पंजाबी था। हमारी गली क्या, पूरा मुल्तानी ढांडा ही पंजाबी था। जो ...

शौर्य गाथाएँ - 17 - अंतिम भाग
द्वारा Shashi Padha
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शौर्य गाथाएँ शशि पाधा (17) एक नदी-एक पुल सैनिक अधिकारी की पत्नी होने के नाते मैंने अपने जीवन के लगभग ३५ वर्ष वीरता, साहस एवं सौहार्द से परिपूर्ण वातावरण ...

बहीखाता - 5
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 331

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 5 मिडल स्कूल यह सन् 1960 की बात है जब मैं प्राइमरी की पढ़ाई पूरी करके मिडल स्कूल में पहुँच ...

ज़बाने यार मन तुर्की - 1
द्वारा Prabodh Kumar Govil Verified icon
  • 1.4k

- आप बाहर बैठिए, बच्ची को क्लास में भेज दीजिए। चिंता मत कीजिए, इतनी छोटी भी नहीं है। हैड मिस्ट्रेस ने कहा। बच्ची ने हाथ हिला कर मां को ...

बहीखाता - 4
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 378

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 4 अंदर की दुनिया मेरी हालत अजीब-सी रहने लगी। मैं खोयी खोयी घूमने लगी। यद्यपि मैं पूरी तरह नहीं जानती ...

शौर्य गाथाएँ - 16
द्वारा Shashi Padha
  • 268

शौर्य गाथाएँ शशि पाधा (16) शांतिदूत यह प्रसंग वर्ष १९९८ के आस -पास का है | कारगिल के भयंकर युद्ध में कितने ही शूरवीरों ने अपने जान की आहुति ...

बहीखाता - 3
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 306

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 3 ट्रकों वाले गली नंबर चार के एक कोने पर ट्रकों वालों का घर था। वैसे गली दोनों तरफ खुलती ...

शौर्य गाथाएँ - 15
द्वारा Shashi Padha
  • 200

शौर्य गाथाएँ शशि पाधा (15) शायद कभी वर्ष १९७१ के सितम्बर अक्टूबर के महीनों के आस पास भारत की सीमाओं पर पाकिस्तान की सेना का जमाव बढ़ रहा था ...

बहीखाता - 2
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 249

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 2 पहाड़गंज पहाड़गंज का मुल्तानी ढांडा, गली नंबर चार। यह गली सभी गलियों से चैड़ी होती थी। गली के दोनों ...

बहीखाता - 1
द्वारा Subhash Neerav Verified icon
  • 408

बहीखाता आत्मकथा : देविन्दर कौर अनुवाद : सुभाष नीरव 1 पहला कदम बचपन की पहली याद के बारे में सोचती हूँ तो मुँह पर ठांय-से पड़े एक ज़ोरदार थप्पड़ ...