हिंदी किताबें, कहानियाँ व् उपन्यास पढ़ें व् डाऊनलोड करें PDF

दिलकी बाते - १
by Vrishali Gotkhindikar
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जलवे ..      जुल्फ है या कोई घना कोहरा .. घटाए शायद दे रही है पेहेरा .. आखोमे छुपे है “मंजर”कई.सारे मस्तीके दिखते है हसीन नजारे . चेहेरेकी “रौनकका ...

माँ:एक गाथा - भाग - 1
by Ajay Amitabh Suman
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ये कविता संसार की सारी माताओं की चरणों में कवि की सादर भेंट है.  इस कविता में एक माँ के आत्मा की यात्रा स्वर्गलोक से ईह्लोक तक विभिन्न चरणों में ...

भोजपुरी माटी
by Radheshyam Kesari
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आइल गरमी ------------- सूरज खड़ा कपारे आइल, गर्मी में मनवा अकुलाइल। दुपहरिया में छाता तनले, बबूर खड़े सीवान। टहनी,टहनी बया चिरईया, डल्ले रहे मचान। उ बबूर के तरवां मनई, ...

अल्हड़
by Mukteshwar Prasad Singh
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तेज छिटकती बिजलीबादलों की गडगडाहटहवा के झूले पर डोलतीवारिस की बूंदें आ बैठती हैचेहरे पर।जलकणों से भीगता रोम रोम और सांसेंउतावली।बार बार तेज चमक से चौंकचुंधियाती आंखें मूंद जाती ...

शायराना कलाम
by Dr Gayathri Rao
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शायराना कलम - कुछ भावनाये,कुछ एहसास,...मेरी शायरी के कुछ नगीने जो आप सबको पेश करती हु.

ज्यादा बदलाव चाहोगे तो पीट दिये जाओगे (जुलाई २०१९)
by महेश रौतेला
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जुलाई २०१९१.ज्यादा बदलाव चाहोगे तोपीट दिये जाओगे,अधिक परिवर्तन चाहोगे तोमार दिये जाओगे,बहुत सुधार चाहोगे तोजेल भेज दिये जाओगे!मांगने पर कौरवों नेपाँच गांव भी नहीं दिये थे,और तुम जनता के ...

थोड़े से तो थोड़े से, हम बदले तो है..!
by Akshay Mulchandani
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शायद, हम थोड़े से,  अब बड़े हो गए है..। उसके ऑनलाइन आने की राह, हम आज भी देखते है, जैसे कुछ साल पहले देखा करते थे..! पर थोड़ा सा ...

व्यवधान
by Ajay Amitabh Suman
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एक फूल का मिट जाना हीं उपवन का अवसान नहीं,एक रोध का टिक जाना हीं विच्छेदित अवधान नहीं । जिन्हें चाह है इस जीवन में स्वर्णिम भोर उजाले की,उन ...

तेरा घमंड
by Manjeet Singh Gauhar
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मत कर इतना घमंड , ऐ तू ना-समझ इंसानतेरा घमंड ही एक दिन तुझे हरायेगा ।मेरा बारे में तू सोचना छोड़ देमैं क्या हूँ , ये तुझे वक़्त बतायेगा ...

मैं तो बस इतना चाहूँ
by Ajay Amitabh Suman
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(१)    मैं तो बस इतना चाहूँ   हाँ मैं बस कहना  चाहूँ,हाँ मैं बस लिखना चाहूँ,जो नभ में थल में तारों में,जो सूरज चाँद सितारों में। सागर के अतुलित धारों ...

गजल - वतन पर मिटने का अरमान
by डॉ अनामिकासिन्हा
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  • 66

                  " गरीब हूँ साहब"         **************************"भीगे हुए अरमान आज रोने को है|मत रोको गरीबी को, पेट के बल ...

राख़
by Ajay Amitabh Suman
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(१)   ये कविता मैंने आदमी की फितरत के बारे में लिखा है . आदमी की फितरत ऐसी है कि इसकी वासना मृत्यु पर्यन्त भी बरकरार रहती है. ये ...

नर या मादा
by Ajay Amitabh Suman
  • (5)
  • 60

(१)    माना कि समय के साथ बदलना वक्त की मांग है . पर आधुनिकीकरण और फैशन के नाम पे किसी तरह का पोशाक धारण करना , किसी तरह के ...

भोगमनित्यमेव
by Bhargav Patel
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नश्वर जगत में बसते, मानव का अधिकार । जाना वह भीतर झाँक, नीतिमय सदाचार ॥   मगध राज्य का वह काल कनक । भूप थे जब बिम्बिसार जनक ॥ ...

कैसे कहूँ है बेहतर, हिन्दुस्तां हमारा?
by Ajay Amitabh Suman
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(१)   कैसे कहूँ है बेहतर ,हिन्दुस्तां हमारा?   कह रहे हो तुम ये  , मैं भी करूँ ईशारा,सारे  जहां  से अच्छा , हिन्दुस्तां हमारा। ये ठीक भी बहुत  है, एथलिट सारे जागे ...

स्मृति शेष
by Namita Gupta
  • (6)
  • 49

पिता की अचानक हुई मृत्यु से मैं बहुत व्यथित हो गई । इस झटके को मैं काफी समय तक भूल नहीं पाई । यह सदमा आज भी मुझे सालता ...

बिकी हुई एक कलम
by Damini Yadav
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1 - ताज़ा ख़बरों का बासीपन 2 - मेरी अमर कलम 3 - एक फ़ालतू से समय में 4 - बिकी हुई एक कलम 5 - यूज़ एंड थ्रो वाला भगवान 6 - आत्ममुग्ध ...

पत्नी महिमा
by Ajay Amitabh Suman
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(१)   पत्नी महिमा   लाख टके की बात है भाई,सुन  ले काका,सुन ले ताई।बाप बड़ा ना बड़ी है माई, सबसे होती बड़ी लुगाई। जो बीबी के चरण दबाए , भुत ...

संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि - 10
by Manoj kumar shukla
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संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि (10) बदलते समीकरण मधु मक्खियों को छेड़ना किसी समय मौत को दावत देना कहा जाता था, और शहद पाने के लिये तो उन्हें आग ...

श्रंगार का सम्मोहन
by Neerja Dewedy
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            श्रंगार का सम्मोहन       ------------------------                १. प्रथम प्रणय की ऊष्मा. २. ऐ मेरे प्राण बता. ९. (अ) बन्सरी प्रीति की बज रही ...

संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि - 9
by Manoj kumar shukla
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संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि (9) फिंगर प्रिंट दौड़ते आ रहे, एक रास्ते के मोड़ पर थानेदार से हवलदार टकराया । जिसे देखते ही थानेदार गुर्राया- क्यों बे,चोर भाग ...

संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि - 8
by Manoj kumar shukla
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संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि (8) पुरुषोत्तम हमारे देश का आम -आदमी साठ वर्ष बाद सठियाने लगता है, तभी तो बेचारों को सरकारी आफिसों से रिटायर्ड कर दिया जाता ...

खुद के सहारे बनो तुम
by Ajay Amitabh Suman
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(१)   मौजो से भिड़े हो पतवारें बनो तुम   मौजो से भिड़े  हो ,पतवारें बनो तुम,खुद हीं अब खुद के,सहारे बनो तुम। किनारों पे चलना है ,आसां बहुत ...

प्रकृति नटी का उद्दीपन
by Neerja Dewedy
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     प्रकृति नटी का उद्दीपन.        -------------------------------             १.  ऋतुराज नवरंग भर जाये. २.  किसलय वसना प्रकृति सुन्दरी. ३.  भागीरथी के तट पर सुप्रभात. ४.  भागीरथी के तट पर ...

संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि - 7
by Manoj kumar shukla
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संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि (7) जेलों की सलाखों में..... जेलों की सलाखों में, अब वो दम कहाँ । खा- म - खा उलझ रहे, क्यों कोतवाल से । ...

संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि - 6
by Manoj kumar shukla
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संवेदनाओं के स्वरः एक दृष्टि (6) सबसे कठिन बुढ़ापा..... जीवन जीना कठिन कहें तो, सबसे कठिन बुढ़ापा । हाथ पैर कब लगें काँपनें, कब छा जाये कुहासा । मात-पिता, ...

चंद पंक्तियॉं मातृभारती के लिए
by Manjeet Singh Gauhar
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ओ मेरे प्यारे भाग्य , तूने सच में मुझे बहुत कुछ दिया है । मेरी सभी परेशानियों और समस्याओ का हल भी तूने ही किया है ।।लेकिन अब आ गया ...