शब्द और सत्य - भाग 9 Shivraj Bhokare द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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शब्द और सत्य - भाग 9


25.खुद को मत बेचो

सजी हुई इन बाज़ारों में,
तुम अपनी कीमत मत लगवाना,
रिश्तों के, रिवाजों के नाम पर,
तुम खुद को गिरवी मत रख जाना।

तुम देह नहीं, तुम चेतना हो,
पर तुम्हें 'सुंदरता' में बाँध दिया,
एक रंग, एक रूप, एक जेवर देकर,
तुम्हें वस्तु की तरह छाँट दिया।

किसी की 'इज्ज़त' का भार लिए,
किसी की 'पसंद' का श्रृंगार लिए,
तुम कब तक सड़कों पर चलोगी,
एक पराया, झूठा संसार लिए?

मत बेचो अपनी बुद्धिमत्ता को,
कि कोई तुम्हें 'घरेलू' कहे,
मत मारो अपनी उस आवाज़ को,
कि कोई तुम्हें बस 'कोमल' कहे।

प्यार के नाम पर जो मांगता है समर्पण,
वो अक्सर बस तुम्हारा शिकार करता है,
जो तुम्हारी चेतना को न जगा सके,
वो बस तुम्हें अपनी गुलामी में भरता है।

उठो! और तोड़ो इन झूठे दर्पणों को,
जहाँ तुम बस एक 'उपयोग' की चीज़ हो,
अपनी स्वाधीनता की कीमत पहचानो,
तुम स्वयं में ही एक गहरा बीज हो।

जो बिक गई सुविधा के लालच में,
वो शांति कभी न पाएगी,
जो खड़ी रही अपने सत्य के साथ,
वही असल में 'स्त्री' कहलाएगी।
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26.रील्स का बाज़ार और बिकती चेतना

'ओ वूमेनिया' के शोर पर,
तुम किसका मनोरंजन करती हो?
चंद लाइक्स और कुछ सिक्कों के लिए,
तुम क्यों देह का प्रदर्शन करती हो?

जिसे तुम 'आजादी' कहती हो,
वो बस एक नया बाज़ार है,
तुम्हारे ठुमकों पर जो बज रही तालियाँ,
वो तुम्हारी बुद्धि पर प्रहार है।

कैमरे के सामने थिरकती हुई,
तुम बस एक 'कंटेंट' बन गई,
चेतना का शिखर होना था तुम्हें,
पर तुम बस एक 'इवेंट' बन गई।

वो जो स्क्रीन के उस पार बैठे हैं,
वो तुम्हें देख रहे, या तुम्हारी नुमाइश को?
क्या तुमने इतना सस्ता कर लिया है,
अपनी रूह की हर एक ख्वाहिश को?

मुक्ति नाचने में नहीं है दोस्त,
मुक्ति तो सजग हो जाने में है,
क्या रखा है इस झूठी वाह-वाही,
और खुद को तमाशा बनाने में है?

पैसे तो बाज़ार की धूल हैं,
पर गरिमा बेची नहीं जाती,
जो रूह लाइक्स की गुलाम हो गई,
वो कभी मुक्त नहीं हो पाती।

बंद करो ये स्क्रीन का सर्कस,
भीतर की गहराई को पहचानो,
तुम वस्तु नहीं कि कोई 'रेट' लगाए,
तुम सत्य हो, ये बात अब जानो।
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27.असली आत्मनिर्भरता

तुम आत्मनिर्भर हो, पर क्या तुम मुक्त हो?
या बस एक पिंजरे से दूसरे में गई हो?
पहले पिता का हाथ था, अब दफ़्तर की तनख्वाह है,
पर क्या तुम अपनी ही मान्यताओं की गुलाम नहीं रही हो?

आदर्श स्त्री वह नहीं जिसे दुनिया ने पूजा,
आदर्श वह है जिसने खुद के 'झूठ' को है फूंका।
जिसे न तो प्रशंसा चाहिए, न ही किसी का सहारा,
जिसका अपना बोध ही बना है उसका किनारा।

वह नहीं सजती ताकि कोई उसे 'देखे',
वह तो स्वयं को देखती है, निष्पक्ष, बिना लेखे।
वह 'पतिव्रता' या 'समाज-वृता' होने से पहले,
'सत्य-व्रता' होने का साहस मन में पाले।

आर्थिक आज़ादी तो बस एक छोटा पड़ाव है,
असली आज़ादी तो मन के बंधनों का अभाव है।
जो न किसी की बेटी, न पत्नी, न मां बनकर अटकी,
वही चेतना है श्रेष्ठ, जो सत्य की राह पर पलटी।

आदर्श होना है तो 'मनुष्य' होकर दिखाओ,
स्त्री होने के सारे लेबल्स को आग लगाओ।
जहाँ कोई लिंग नहीं, कोई भेद नहीं रहता,
वही है वो स्थान, जहाँ शांति का झरना बहता

न किसी से ऊपर, न किसी के नीचे,
वह चलती है ज्ञान के प्रकाश को खींचे।
आत्मनिर्भर वही, जो अपनी लड़ाई खुद लड़ती है,
वह भीड़ के पीछे नहीं, सत्य के साथ खड़ी होती है।
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मेरी कविताएँ मधुर भ्रम नहीं, कड़वे सत्य का दर्पण हैं। वे Acharya Prashant की स्पष्टता से प्रेरित हैं—चुभ सकती हैं, पर झूठा सुकून नहीं देतीं। अगर आप सच सुनने का साहस रखते हैं, तो मेरे शब्दों के साथ जुड़े रहिए।....