31.आभासी कैद
हाथ में पकड़े हो जो यंत्र,
क्या वह सचमुच तुम्हारा मित्र है?
या तुम्हारी ही स्वतंत्रता को निगलने का,
बनाया गया कोई सूक्ष्म चित्र है?
दौड़ते हो जिसे छूने को बार-बार,
वह बस एक रंगीन पर्दा है।
सत्य से भागने का, स्वयं को सुलाने का,
यह एक आधुनिक धंधा है।
लाइक और कमेंट्स की इस अंधी दौड़ में,
तुमने खुद का मूल्य कितना गिराया है?
जो भीतर देखना था, जो मौन जानना था,
उसे रील्स के शोर में गंवाया है।
रिश्ते अब केवल स्क्रीन पर जीवित हैं,
सामने बैठा मित्र भी अब पराया है।
तुम जीवित मनुष्य नहीं रहे अब,
मशीन ने तुमको अपना गुलाम बनाया है।
जागो! इस आभासी सम्मोहन को तोड़ो,
यह मोबाइल तुम्हारी मुक्ति का मार्ग नहीं।
बाहर निकलो इस मायावी पिंजरे से,
बिना आत्म-बोध के जीवन में कोई सार नहीं।
------------------------------
32.कागज़ का भ्रम
तुम दौड़ रहे हो जिस रेस में,
वह शिक्षा है या कोई बाज़ार है?
हाथ में थामे हो जो डिग्रियाँ,
वह ज्ञान है या अहंकार का औजार है?
अंकों की इस अंधी दौड़ में,
तुमने बोध को सूली पर चढ़ाया है।
रट-रटकर जो बने हो टॉपर,
उसने तुम्हें सचमुच क्या सिखाया है?
डिग्रियाँ तो बढ़ती गईं तुम्हारी,
पर भीतर की समझ क्यों घट गई?
जो चेतना अनंत को छू सकती थी,
वह चंद नंबरों की फाइलों में सिमट गई।
मशीन की तरह रटते हो दिन-रात,
ताकि पैकेज बड़ा और भारी मिले।
पर भीतर बैठे उस खालीपन का क्या,
जो चाहता है कि उसे थोड़ी समझदारी मिले?
तुम प्रश्न पूछना भूल चुके हो,
तुम बस उत्तरों को याद करते हो।
सत्य की खोज का साहस नहीं तुममें,
तुम बस व्यवस्था की गुलामी स्वीकार करते हो।
डिग्री बड़ी होने से इंसान बड़ा नहीं होता,
वह तो बस समाज का दिया एक ठप्पा है।
अगर खुद को न जाना, मन को न समझा,
तो तुम्हारा यह सारा ज्ञान सिर्फ एक धप्पा है।
पूछो खुद से कि यह कैसी तरक्की है,
जहाँ डिग्रियों के अंबार हैं, पर शांति नहीं।
जहाँ डिप्रेशन और एंग्जायटी का वास है,
पर जीवन में कोई सच्ची क्रांति नहीं।
कागज़ के इन कतरनों को ज्ञान मत समझो,
यह तो बस पेट भरने का एक साधन है।
सच्ची शिक्षा वह है जो तुम्हें मुक्त करे,
वरना यह पूरी व्यवस्था सिर्फ एक बंधन है।
लौटो! उस आत्म-बोध की ओर लौटो,
जहाँ अंकों का कोई मोल नहीं होता।
जो भीतर की आँखें खोल दे तुम्हारी,
उस शिक्षा का कोई तोल नहीं होता।
------------------------------
33.भ्रम का ढहना
डिग्रियों की गठरी सिर पर उठाए,
तुम दर-दर भटक रहे हो आज।
जिस समाज ने तुम्हें ऊंचे ख्वाब बेचे,
वही अब पूछ रहा है तुम्हारी औकात।
अंकों की उस अंधी दौड़ का,
यह कैसा वीरान मुकाम आया?
तुमने जिसे जीवन का सत्य समझा था,
वह कागज़ का टुकड़ा काम न आया।
रिश्तेदारों के ताने, समाज की नज़रें,
तुम्हें भीतर ही भीतर खाए जाती हैं।
तुम्हारी अपनी ही नजरों में तुम्हारी कीमत,
हर गुज़रते दिन के साथ घटती जाती हैं।
आत्मविश्वास का जो महल बनाया था,
वह दूसरों की प्रशंसा की नींव पर था।
आज जब दुनिया ने मुँह फेर लिया,
तो तुम्हारा वह भ्रम का महल ढह गया।
सुनो युवा! तुम क्यों टूट रहे हो?
क्या तुम्हारी कीमत सिर्फ एक नौकरी तय करेगी?
क्या तुम्हारी इस अनंत चेतना का मूल्य,
कोई कॉपोरेट कंपनी या सरकारी कुर्सी भरेगी?
तुमने खुद को समाज के तराजू में तौला,
यही तुम्हारी सबसे बड़ी नासमझी है।
सफलता और विफलता के जो पैमाने उन्होंने बनाए,
वह तो केवल इस बीमार तंत्र की खुदगर्ज़ी है।
बेरोजगारी केवल बाहर की एक स्थिति है,
उसे अपने अस्तित्व का संकट मत बनाओ।
इस खालीपन को, इस सन्नाटे को,
आत्म-निरीक्षण और बोध का साधन बनाओ।
टूटना है तो उस अहंकार को टूटने दो,
जो डिग्रियों और झूठी उम्मीदों से पला था।
खड़े हो जाओ अपनी पूरी चेतना के साथ,
क्योंकि तुम्हारा असली मूल्य अभी अनछुआ था।
नौकरी न मिलना तुम्हारी विफलता नहीं,
इस सड़े हुए सिस्टम का असली चेहरा है।
पहचानो खुद को, इस अवसाद को चीरो,
तुम्हारे भीतर सत्य का प्रकाश बहुत गहरा है।
------------------------
मेरे शब्दों में मिठास कम और सत्य अधिक है।
जो लोग सच सहन कर सकते हैं,
वही इन्हें समझ पाएंगे।.....
क्या आप चाहते हैं कि ‘शब्द और सत्य’ के नए भाग आते रहें?
अपनी राय जरूर बताइए…
क्योंकि अगला अध्याय आपकी प्रतिक्रिया तय करेगी....