बात होली की हो और कविता, शेरो-शायरी की चर्चा न हो, यह कैसे संभव हैं ? होली का अपना अंदाज है, और कवियों ने उसे अपने रंग में ढाला है। जाने माने शायर नजीर अकबराबादी कहते हैं: जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की। और दफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की। महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की कपड़ों पर रंग के छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो। मुंह लाल, गुलाबी आंखें हों, और हाथों में पिचकारी हो, तब देख बहारें होली की। लेकिन बहादुरशाह जफर अपना अलग ही तराना गाते हैं, वे कहते हैंः क्यूं मों पे मारी रंग की पिचकारी देखो कुंवरजी दूंगी गारी। भाज सकूं मैं कैसे मोंसो भाजयों नहीं जात थाडे़, अब देखूं मैं, कैान जो दिन रात। सबको मुंह से देत है गारी, हरी सहाई आज जब मैं आज निज पहलू तो किसके होती लाज। बहुत दिनन मैं हाथ लगे हो कैसे जाने दूं आज है भगवा तोसों कान्हा फटा पकड़ के लूं। शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से खेले कौन होरी। और कबीर की फक्कड़ होली का ये रंग तो सबको लुभाता ही है:

Full Novel

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विविधा - 1

यशवंत कोठारी 1-कवियों-शायरों की होली बात होली की हो और कविता, शेरो-शायरी की चर्चा न हो, यह कैसे संभव ? होली का अपना अंदाज है, और कवियों ने उसे अपने रंग में ढाला है। जाने माने शायर नजीर अकबराबादी कहते हैं: जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की। और दफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की। महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की कपड़ों पर रंग के छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो। मुंह लाल, गुलाबी आंखें हों, और हाथों ...और पढ़े

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विविधा - 2

2-समकालीन साहित्य: सही दिशा की तलाश मूल प्रश्न है, साहित्य क्या है आजकल के साहित्य दो तरह का लेखन हैं। एक जो आसानी से पाठक के तक पहुंचता है और पाठक उसे पढ़ता भी है। दूसरा लेखन वह जो केवल अभिजात्य वर्ग के लिये लिखा जाता है। इस दूसरे साहित्य के लेखक यह मानते हैं कि अगर इनकी कोई रचना किसी सामान्य पाठक की समझ में आ गयी तो उन्होंने कुछ घटिया लिख दिया है और तत्काल वे अपना लेखन ‘सुधारने’ में लग जाते हैं। एक और प्रश्न ! क्या अखबारों का पेट भरने के लिये लिखा जाने वाला ...और पढ़े

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विविधा - 3

3-व्यंग्य -दशा और दिशा हिन्दी साहित्य मे लम्बे समय से व्यंग्य लिखा जा रहा है, मगर आज भी व्यंग्य दर्जा अछूत का ही है, इधर कुछ समय से व्यंग्य के बारे में चला आ रहा मौन टूटा है, और कुछ स्वस्थ किस्म की बहसों की २ाुरूआत हुई है। आज व्यंग्य मनोरंजन से उपर उठकर सार्थक और समर्थ हो गया है। आज व्यंग्य-लेखक को अपने नाम के साथ किसी अजीबोगरीब विशेशण की आवश्यकता नहीं रह गई है। मगर स्थिति अभी इतनी सुखद नहीं है, आज भी कई बार लगता है, व्यंग्यकार छुरी से पानी काट रहा है। आवश्यकता व्यंग्य को ...और पढ़े

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विविधा - 4

4-व्यंग्यकार यशवन्त कोठारी से साक्षात्कार ‘व्यंग्य में बहुत रिस्क है।’ इधर जिन युवा रचनाकारों ने प्रदेश से बाहर भी कलम की पहचान कराई है, उनमें यशवन्त कोठारी अग्रणी हैं। नवभारत टाइम्स, धर्मयुग, हिन्दुस्तान आदि प्रसिद्ध पत्रों में श्री कोठारी की रचनायें सम्मान के साथ छप रही हैं। 3 माई, 1950 को नाथद्वारा में जन्मे श्री कोठारी जयपुर के राश्टीय आयुर्वेद संस्थान में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक हैं। व्यंग्य में उनकी पुस्तकें, कुर्सी-सूत्र, हिन्दी की आखिरी किताब, यश का शिकंजा, राजधानी और राजनीति, अकाल और भेडिये, मास्टर का मकान, दफतर में लंच, मैं तो चला इक्कीसवीं सदी में, बाल हास्य ...और पढ़े

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विविधा - 5

5-साहित्य के शत्रु हैं सत्ता, सम्पत्ति और संस्था डॉ. प्रभाकर माचवे डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने डॉ. माचवे के लिखा है- ‘ श्री प्रभाकर मचवे हिन्दी के उन गिने चुने लेखकों में हैं, जिनकी सरसता ज्ञान की आंच से सूख नहीं गयी।’ वास्तव में डॉ. माचवे सहज-सरल हैं, गुरू गंभीर नहीं। वे एक बहुमुखी भारतीय साहित्कार हैं, केन्द्रीय साहित्य अकादमी के वे सचिव रह चुके हैं। रेडियो, भारतीय भाशा परिशद आदि से जुडे रहे हैं। संप्रति वे इंदौर से प्रकाशित हो रहे दैनिक पत्र चौथा संसार के प्रधान सम्पादक हैं उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी तथा मराठी में लगभग 80 पुस्तकें ...और पढ़े

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विविधा - 6

6-नाटक दर्शक की जिंदगी की लड़ाई है ! -मुद्राराक्षस मुद्राराक्षस हमेशा से ही विवादास्पद और चर्चित रहे हैं। क्षेत्र नाटकों का हो या अन्य कोई, वे हमेशा बहस में कूद पड़ते हैं धारा को अपनी ओर मोड़ लेने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने संसद का चुनाव भी लड़ा है लगभग 10 नाटकों व 20 अन्य पुस्तकें वे लिख चुके हैं। उनके साथ हुई बातचीत यहां पेश है। मुद्राराक्षस नाम कैसे पड़ा ? मेरा पहले का नाम तो सुभाशचन्द्र ही था। मद्राराक्षस उपनाम शायद 1953 के आसपास डॉ. देवराज के कारण चल पड़ा। उन दिनों में वे ‘युग-चेतना’ निकालते थे। ...और पढ़े

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विविधा - 7

7-यहां नाटक संस्कार से जुड़ा हुआ नहीं है हमीदुल्ला भारतीय नाट्य आन्दोलन में सृजन व मंचन से जुड़ा एक प्रयोगधर्मी नाम है- हमीदुल्ला, जो प्रदेश के बाहर भी जाना पहचाना है। ‘दरिन्दे’, ‘उलझी आकृतिया’, ‘ख्याल भारमली’, ‘उत्तर उर्वशी’ तथा ‘एक और युद्ध’ उनकी प्रकाशित नाट्य कृतियां है। इसके अलावा आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनके लगभग सौ नाटक अब तक प्रसारित हो चुके हैं, अनेक अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिताओं में उनके नाटक प्रशंसित, पुरस्कृत हुए हैं। अभी हाल ही में उन्हें पुरस्कृत कर सम्मानित भी किया गया है। आजकल नया क्या लिख रहे हैं ? ‘हरिओम ...और पढ़े

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विविधा - 8

8-मेरे नाटक व्यवस्था विरोधी हैं। मणि मधुकर मणि मधुकर एक नाम जो हमेशा चर्चित और विवादास्पद रहा। हर विधा लिखा। खूब लिखा। खूब पुरस्कृत हुए। 1942 में राज्स्थान में जन्में। 1995 में दिल्ली में दिवंगत हुए। इस बीच नाटक, उपन्यास, कविताएं, कहानियां जमकर लिखें छपे। 1982 में मेरी उनकी बातचीत इस प्रकार हुई- आपकी प्रिय विधा कौन -सी है ? मेरे सामने असली मुद्दा हमेशा यह रहा है कि मैं कहना क्या चाहता हूं विधा का खयाल बाद में आया है ओर जब आया है तो मैंने चाहा है कि जहां तक हो सके ‘उस’ विधा की रचनात्मक गहराइयों ...और पढ़े

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विविधा - 9

9-मैं साहित्यकार को तीसरी ऑंख मानता हू -विष्णु प्रभाकर विश्णु प्रभाकर हिन्दी के वरिश्ठ साहित्यकार हैं। पिछले पचास वर्शो निरन्तर साहित्य साधना करते हुए उन्होंने चालीस से भी अधिक पुस्तकें लिखीं। साहित्य में वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं नाटक, कहानी, एकांकी, उपन्यास, जीवनी आदि कई विधाओं में उन्होंने समान अधिकार से लेखनी चलाई। ‘आवारा मसीहा’ तो उनकी श्रेश्ठ कृति के रूप में समादृत हुई ही साथ ही उनके अनेक नाटक और एकांकी भी आकाशवाणी और रंगमंच पर काफी लोकप्रिय हुए हैं। 21 जून, 1912 को जन्में, स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी और गांधीवादी लेखकों में प्रमुख श्री प्रभाकर इन ...और पढ़े

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विविधा - 10

10- शब्द-शिल्पी यशवन्त कोठारी साधारण तीर की अपेक्षा जहरबुझा तीर अधिक प्रहारक होता है, क्योंकि वह दुहरी मार करता इसी प्रकार साहित्य में भी दुहरी मार करने वाली एक ही विधा है और वह है व्यंग्य। यही कारण है कि व्यंग्य विधा में लेखक हेतु दो विशिश्टताएं अनिवार्य हैं। इनमें से एक है विसंगतियों का स्पश्टीकरण और दूसरी है टेढ़ा प्रहार करने की क्षमता। यदि किसी रचना में इन दोनों मेंसे एक का भी अभाव है तो वह व्यंग्य विधा में नहीं रखी जा सकती है। यदि विसंगतियां युगीन सत्य को ईमानदारी के साथ प्रकट करे तो टेढ़ा प्रकार ...और पढ़े

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विविधा - 11

11-अंग्रेजी बनाम हिन्दी बहस पुरानी जरूर है, मगर घटिया नहीं। पिछले दशक में हिन्दी पत्र पत्रिकाओं की प्रसार संख्या की तुलना में ज्यादा बढ़ी हैं। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता का ग्राफ उनके समानान्तर नहीं चल पा रहा है। आजअनेक हिन्दी पत्रों में खुशवंत सिंह, जनार्दन ठाकुर, रजनी कोठारी, कुलदीप नैयर आदि के अंग्रेजी लेखों के अनुवाद एक साथ छप रहे हैं। क्या हिन्दी और प्रादेशिक भाशाओं के पत्र अपने खुशवंत सिंह या ठाकुर या रजनी कोठारी नहीं पैदा कर सकते। आज सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा कला संबंधी समाचारों के संकलन में संवाद समितियां अंग्रेजी की बाट जाहती हैं और अंग्रेजी संवाददाता ...और पढ़े

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विविधा - 12

12-ये आकाशवाणी है इक्कीसवीं शताब्दी मंे आकाशवाणी को शब्द हत्या के लिये याद किया जायेगा। शब्द की मृत्यु इस की सबसे बड़ी टेजेड़ी है और इस टेजेड़ी में आकाशवाणी ने अपना पूरा योगदान किया है। अपने प्रसारण, कार्यक्रमों तथा विराट जन समूह, तक पहुंचने की क्षमता के कारण आकाशवाणी शब्द के वर्चस्व को स्थापित कर सकती थी और कुछ वर्शों तक आकाशवाणी ने ऐसा किया भी मगर माध्यम के सरकारीकरण, लालफीताशाही और खोखले नारों के जाल में फंसकर आकाश्वाणी बेईमानी और बकवासों का ऐसा पुलिन्दा बन गई कि न निगलते बने और न ही उगलते। रेडियो हमारे जीवन की ...और पढ़े

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विविधा - 13

13 यदि प्रधानमंत्री न बनते तो साहित्यकार बनते राजनेता या चिन्तक नेहरू पर बहुत कुछ लिखा गया है साहित्यकार नेहरू के बारे में बहुत कम जानकारी है। 1937 में कलकत्ता के ‘माडर्न रिव्यू’ में चाणक्य उपनाम से उन्होंने एक रिपोर्ताज में स्वयं के बारे में लिखा था, उसे फिर से देखिए-‘एक विशाल जुलूस, उसकी कार घेर कर नाचते कूदते चिल्लाते हजारों हजार लोग। वह कार की सीट पर अपने को ठीक से संभालते हुए खड़ा होता है-सीधी लम्बी आकृति देव पुरूश जैसी-उमड़ती भीड़ से एकदम असंप्रक्त। अचानक वही एक स्पश्ट हंसी और सारा तनाव जैसे घुल गया और ...और पढ़े

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विविधा - 14

14-साहित्य की संवेदना साहित्य में जब जब भारतीता की बात उठती है तो यह कहा जाता है कि साहित्य भारतीयता तलाशना साहित्य को एक संकुचित दायरे में कैद करना है, मगर क्या स्वयं की खोज कभी संकीर्ण हो सकती है ? वास्तव में संकीर्णता की बात करना ही संकीर्ण मनोवृत्ति है। सच पूछा जाए तो ‘को अहम्’ अर्थात अपने निज की तलाश ही भारतीयता है और जब यह साहित्य के साथ मिल जाती है तो एक सम्पूर्णता पा जाती है। पश्चिमी साहित्य से आक्रांत होकर जीने के बजाए हमें अपने साहित्य, अपनी संस्कृति से उर्जा ग्रहण करनी चाहिए। वैसे ...और पढ़े

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विविधा - 15

15-समकालीन साहित्य: सही दिशा की तलाश मुल प्रश्न है, साहित्य क्या है ? आजकल के साहित्यकार दो तरह का करते हैं। एक वह जो आसानी से पाठक तक पहुंचता है ओर पाठक उसे पढ़ता भी है। दूसरा लेखक वह केवल अभिजात्य वर्ग के लिये लिखा जाता है। इस दूसरे साहित्य के लेखक यह मानते हैं कि अगर इनकी कोई रचना किसी सामान्य पाठक की समझ में आ गयी तो उन्हेांने कुछ घटिया लिख दिया है और तत्काल वे अपना लेखन ‘सुधारने ’ में लग जाते हैं। एक और प्रश्न! क्या अखबारों का पेट भरने के लिये लिखा जाने वाला ...और पढ़े

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विविधा - 16

16-गाथा कवि सम्मेलनों की पिछले दिनों एक शहर के संयोजक नुमा व्यक्ति का पत्र आया, प्रियवर! दो वर्पो बाद दे रहा हूं। पिछले वर्प हम कवि सम्मेलन नहीं कर सके। इस बार हमने एक कवियित्री सम्मेलन करना तय किया है। कृपया 8-10 कवयित्रियों के नाम पते भे जें। इनकी ष्शक्ल ठीक ठाक हो। कुछ मंच पर लटके-झटके दिखा सकें। कविता रद्दी हो तो भी चलेगी। गला और चेहरा बढ़िया होना चाहिए। पारिश्रमिक की चिन्ता न करें। स्वस्थ्य होंगे। ‘इसे कल्पना की उड़ान न समझे।’ तो मेरे प्रिय पाठकों। आज के कवि सम्मेलन कितने गिर चुके हैं। देखा आपने। सोचिए.....ष्शायद ...और पढ़े

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विविधा - 17

17 - हास्य व्यंग्य का बोलवाला आज की स्थिति भिन्न है। हास्य व्यंग्य की सतही रचनाओं के कारण कवि की गिरावट हुई है। कवि सम्मेलनों के विकास काल में हास्य व्यंग्यकार मर्यादा का ध्यान रखते थे, इसी काल में पदमश्री गोपाल प्रसाद व्यास और पद्मश्री काका मंच पर अवतरित होकर जम गये और आज तक जमे हुए हैं। लेकिन सन् 60 के बाद वाले दौर में इन हास्य कलाकारों की ऐसी बाढ़ा आई कि सारी मर्यादाएं, सीमाएं,बह गई, रह गई केवल हास्यस्पद रस की चाहें। उन दिनों अश्लील और भेदस रचनाओं को पढ़ना मुश्किल होता था, लेकिन कवि सम्मेलनों ...और पढ़े

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विविधा - 18

18-फाग का अमर कवि : ईसुरी ळोली का मौसम हो। फाग गाने का मन हो और बुन्देलखण्ड के कवि की याद न आये, यह कैसे संभव है ? जनकवि और बुन्देलखण्ड के ‘कबीर’ ईसुरी के फागों से पूरा, बुन्देलखण्ड आधीरात को खिलने वाले बेले की तरह अनुप्रेरित है। ईसुरी का पूरा नाम ईश्वरी प्रसाद था। उनका जन्म 1841 में झांसी जिले के मउरानीपुर के पास के मेढ़की गांव में हुआ। वास्तव में ईसुरी मस्तमौला और रसिक मिजाज के आदमी थे। पढ़े कम गुने ज्यादा यह वह समय था जब प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तैयारियां जोरों पर थीं तथा उन्मुक्त ...और पढ़े

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विविधा - 19

19-फिल्में बनाम रंगमंच एम. के. रैना कहते हैं- ‘रंगमंच से फिल्मों में अपनी इच्छा से कोई नहीं आता। ओम भी भीगी पलकों से फिल्मों में आये थे और कारन्त से आज भी नाटकों का मोह नहीं छूटा। पर जहां पैसा नहीं हो, सुविधाएं नहीं हों, वहां आदमी कब तक रंगकर्म में जुटा रह सकता है।’ फिल्म संसार और रंगमंचीय दुनिया में आज भी यही कशमकश जारी है। एक तरफ कला, आत्मसन्तुप्टि और ज्ञान है तो दूसरी ओर पैसा, ग्लैमर, सुविधाएं और स्टार बनने के अवसर हैं। आज फिल्मी दुनिया में सर्वाधिक चर्चित वे ही नाम है जो कल तक ...और पढ़े

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विविधा - 20

20-फिल्मों में हास्य को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जाता ? इस तनाव युक्त आधुनिक जीवन में मनोरंजन और का महत्व अधिक है। एक अजीब समय आया है, हर व्यक्ति भाग दौड़, तनाव में जी रहा है। इससे बचने हेतु सामान्य आदमी फिल्मों की ओर दौड़ता है और फिल्मों में हास, परिहास और व्यंग्य ढुंढता है। आईये, देखें कि फिल्मों में हास्य का स्तर कैसा है और किन लोगों ने फिल्मी हास्य के चेहरे का संवारा है या बिगाड़ा है। जिन लोगों ने चार्ली चेपलिन की या अन्य विदेशी हास्य फिल्में देखी हैं वे अवश्य ही इनके हास्य के ...और पढ़े

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विविधा - 21

21-दास्तान फिल्मी गीतों की ‘बैइ जा, बैठ गई......’ ‘खड़ी हो जा, खड़ी हो गई.....’ ‘जीजाजी जीजाजी......’ के पहले से, देर रात तक किसी भी रेडियो स्टेशन से आप ऐसे फूहड़ और घ्टिया फिल्मी गीत सुन सकते हैं। कई बार रेडियो बन्द कर देना पड़ता है, लेकिन रेडियो बन्द कर देने से ही समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। ये सस्ते फिल्ती गीत हमारे राप्टीय चरित्र और नई पीढ़ी के लिए जहर साबित हो रहे हैं। गीतो की यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति लगभग 20 वर्प पूर्व शुरु हुई, जब फिल्मी गुट ने सभी मानदण्ड ताक पर रखा ...और पढ़े

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विविधा - 22

22-श्रद्धया दीयते तत् श्राद्धम् हमारे समाज की मान्यता है कि पितृ पक्ष में ही पूर्वजों की आत्माएं धरती पर अवतरित होती हैं। घर-परिवार के सदस्य इस समय ही उन मृतात्माओं की शांति के लिए पिंडदान तथा तर्पण करते हैं। पिंडदान और तर्पण हमारी संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण बिन्दू है। विश्वास है कि पिंडदान और तर्पण से ही आत्मा को मुक्ति मिलती है। ‘श्रद्धया दीयते तत् श्राद्धम्’ सितम्बर के प्रारंभ में ही आश्विन मास का कृप्ण पक्ष आता है जिसे पितरों का पखवाड़ा कहते हैं। इस मास की अमावस्या का सर्वाधिक महत्व है। पूर्वमास की पूर्णिमा से आश्विन की ...और पढ़े

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विविधा - 23

23-पर्यावरण और भारतीयता भारतीयता सम्पूर्ण रुप से हम सभी को रक्षित करती है। उसमें प्रारम्भ से ही र्प्यावरण को मुखर स्थान दिया है। हमारी संस्कृति में वृक्ष, पेड़-पौधों, जड़ी बूटियों को देवता माना गया है। पवित्र और देवतुल्य वृक्षों की एक लम्बी परम्परा भारतीयता के साथ गुंथी हुई है। भारतीयता किसी व्यक्ति विशेप से नहीं प्रकृति, र्प्यावरण सांस्कृतिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत में जुड़ी हुई है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारतीयता के रक्षकों, पोपकों ने वृक्षों को पूजने की, उन्हें आदर देने की एक ऐसी परम्परा विकसित की जो भारतीयता में रच बस गयी। घुल मिल गयी। वृक्षों के ...और पढ़े

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विविधा - 24

24-नटराज के लिए पूरा संसार नाट्यशाला है ! हमारी संस्कृति में मोक्ष जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। के लिए शिवरात्रि का ही व्रत पुराण में वर्णित है। वास्तव में यह व्रत देवाधिदेव महादेव की महान् शक्ति का प्रतीक माना गया है। शिव के विभिन्न स्वरुप देश में हैं। शत रुद्र संहिता में शिव की अप्टमूर्तियों के निम्न नाम दिए गए हैं। शर्व, भव, भीम, पशुपति, ईशन, महादेव व रूद्र भगवान शिव को अर्धनारीश्वर तथा भैरव माना गया है। इसी संहिता में शिव के अन्य कतिपय प्रमुख अवतारों का भी वर्णन है। जो इस प्रकार हैं-श्रभ अवतार, गृहपति ...और पढ़े

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विविधा - 25

25-मारुति -चरित्र भगवान राम के अनन्य भक्त वीर हनुमान को भारतीय पौराणिक चरित्रों में उत्तम पद प्राप्त है हनुमान को रुद्र का अवतार माना गया है। हनुमान जी के रोम रोम में राम बसा है। सुन्दर काण्ड में मारुति चरित्र का अदभुत वर्णन है। हनुमान जी का जन्म मॉं अन्जना की कोख से हुआ है। उनके पिता केसरी है। वाल्मिकी रामायण किसकिन्धा काण्ड के अनुसार एक बार मां अन्जना ने अद्भुत श्रृंगार किया।पीली साड़ी में उनकी शोभा अपरम्पार थी। वे पहाड़ पर चढ़कर प्रकृति को नीहार रही थी, उसी समय उनके मन में एक सुयोग्य पुत्र प्राप्ति की इच्छा ...और पढ़े

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विविधा - 26

26-मध्ययुगीन तहजीब का प्रतीक-हुक्का सामन्तवादी विरासत हुक्का अब बीते दिनों की बात रह गयी है। तम्बाकू का रूप बीड़ी, हो गया है, लेकिन हुक्का महज तम्बाकू पीने का उपकरण नहीं था,एक पूरी जिन्दगी होता था हुक्का हजूर। हूक्का तहजीव, परम्परा और संस्कृति का प्रतिक हुआ करता था। एक कहावत प्रसिद्ध है कि सजा देने के लिए हुक्का पानी बन्द। आज भी किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी सजा हूक्कापानी बन्द ही है। वास्तव में हुक्के, हुक्कमरानों, राजों, महाराजों, अमीर उमरावों, रंगीन रानियों बादशाहों की बैठकों और जनानी ड्योढ़ियों से जुड़े रहे हैं। लेकिन साहब वो हुक्का ही क्या जो गरीब ...और पढ़े

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विविधा - 27

27-मानव हाथों से बने देवी-देवता सफेद और काले हल्के पीले और गुलाबी, रंगीन और सादे, पारदर्शी या इन्द्रधनुषी, अनगिनत में कलात्मक मूर्तियां पत्थरों की। जयपुर मूर्ति उद्योग विश्व-विख्यात हैं। हजारों लाखों की संख्या में ये मूर्तियां प्रतिवर्ष देश विदेश के हजारों मंदिरों में प्रतिष्ठित होकर श्रद्धा से पूजी जाती है। इनकी अर्चना की जाती है। मन्नतें मानी जाती है। मूर्ति बनाने के आरंभ से ही मनुष्य के मुख्यतः दो उद्देश्य रहे है। एक तो किसी स्मृति को या अतीत को जीवित बनाये रखना, दूसरे अमूर्त को मूर्त रूप देकर व्यक्त कर अपना भाव प्रकट करना। यदि पूरे संसार की ...और पढ़े

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विविधा - 28

28-भारत के हस्त-शिल्प प्राचीन काल से ही भारत वर्प में जन समुदाय, अपने मनोरंजन, आजीविका तथा लोक हित हेतु प्रकार की लोक कलाओं तथा हस्त-शिल्पों को अपने में समाये हुए है। एकता की डोर में बंधी ये कलाएं तथा हस्त-शिल्प हमारे जन-जीवन में बहुत गहरे तक बैठी हुई हैं, और समय के अदुपयोग तथा रोजगार का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुइ्र है। ये हमारी ांज्ञकृति, परम्परा, जन जीवन की एक महत्वपूर्ण इकाई के रुप में जीवित है। कभी कदा आधुनिक वैज्ञानिक तथा औद्योगिक उन्नति के कारण ऐसा लग सकता है कि हस्त-शिल्प समाप्त हो रहे हैं, मगर शीघ्र ही ...और पढ़े

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विविधा - 29

29-कठपुतलियों का संसार कठपुतलियों को देश और विदेश में लोकप्रियता और प्रसिद्धि दिलाने हेतु स्व. देवीलाल सामर ने बहुत किया। उदयपुर का भारतीय लोककला मण्डल परम्परागत और नवीन कठपुतलियों तथा उनके समाजशास्त्रीय अध्ययन पर काफी काम कर रहा है। पुतलियां चाहे पुरातन हों अथवा नवीन, सैद्धान्तिक दृप्टि से एक ही नियमों में बंधी हैं, और किन्हीं वास्तविक प्राणियों की नकल नहीं हो सकती। न्यूनतम अंग भंगिमाओं से अधिकतम भंगिमाओं का भ्रम उत्पन्न करना पारंपरिक एवं आधुनिक पुतलियों का परम धर्म है। पुतली सिद्धान्त की दृप्टि से पुरातन पुतलियां जितनी आधुनिक है।, उतनी आधुनिक पुतलियां नहीं। चित्रकला की तरह भारतीय ...और पढ़े

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विविधा - 30

30-राजस्थान की चित्रकला रंगीले राजस्थान के कई रंग हैं। कहीं मरुस्थली बालू पसरी हंइ्र है तो कहीं अरावली की श्रृंखलाएं अपना सिर उचा किये हुए खड़ी हुई हैं। राजस्थान में शौर्य और बलिदान ही नहीं साहित्य और संगीत की भी अजस्त्र धारा बहती रही है। संगीत और साहित्य के साथ साथ चित्र-कथाओं ने मनुप्य की चिन्तन शैली को बेहद प्रभावित किया है। आज हम चित्रकला के कमल वन में राजस्थानी चित्र कला का नयनाभिराम, मनमोहक तथा अनूठा संगम देखेंगे। राजस्थान की चित्रकला राजस्थान में चित्रकला का प्रारंभ लगभग चार शताब्दी पहले हुआ। मुगलकाल में चित्रकला उन्नत हुइ्र, लेकिन ...और पढ़े

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विविधा - 31

31-भारत के प्राचीन खेल भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने हमेशा से ही व्यायाम, खेलकूद, कसरत आदि को पूरा महत्व है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद में व्याम तथा खेलों के अलावा योगाभ्यास पर भी बल दिया गया है। वास्तव में प्राचीन भारत में कई ऐसे खेल प्रचलित थे, जिनसे मानव का बौद्धिक एवं शारीरिक विकास होता था। लेकिन देखते देखते हमारे ये खेल पश्चिम की चकाचौंध में नप्ट हो गये। व्दों, उपनिपदों तथा पुराणों में इन खेलों का विशद वर्णन किया गया है। राजप्रासादों में राजकुमार तथा गुरुकुलों में सामान्य बालक इन खेलों से अपने शरीर का ...और पढ़े

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विविधा - 32

32--पतंगोत्सव की परम्परा पतंग उड़ाने की परम्परा भारत में तथा विदेशों में काफी प्राचीन है। मानव शुरु से ही में उड़ते परिन्दों को देख देख स्वयं भी उड़ने की कल्पना करता था, पतंग बाजी इसी कल्पना को साकार करने की परम्परा है। दुनिया भर के देशों में पतंग बाजी की परम्परा विद्यमान है। ग्रीक इतिहासकारों के अनुसार पतंगबाजी 2500 वर्प पुरानी है। चीन में पतंग बाजी का इतिहास दो हजार साल पुराना माना गया है। चीन के सेनापति हानसीन ने कई रंगों की पतंग बनाई और उन्हें उड़ाकर अपने सैनिकों को संदेश दिये। विश्व के इतिहासकार पतंगों का जन्म ...और पढ़े

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विविधा - 33

33 - राम तेरे कितने नाम राम के चरित्र ने हजारों वर्पों से लेखकों, कवियों, कलाकारों, बुद्धिजीतियों को आकर्पित है, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें राम के चरित्र या रामायण की चर्चा न होती हो। राम कथा स्वयं में सम्पूर्ण काव्य है, सम्पूर्ण कथा है और सम्पूण नाटक है। इस सम्पूर्णता के कारण ही राम कथा को हरिकथा की तरह ही अनन्ता माना गया है। फादरकामिल बुल्के ने सुदूर देश से आकर राम कथा का गंभीर अध्ययन, अनुशीलन किया और परिणामस्वरुप राम कथा जैसा वृहद ग्रन्थ आकारित हुआ। रामकथा के सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य को यदि देखा जाये तो ...और पढ़े

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34-बिन बचपन सब सून ! वाल्ट ह्विटमैन की प्रसिद्ध कविता ‘एक था बच्चा’ के निम्न अंश हमारे देश के पर बहुत सटीक लगते हैं..... तुम जो कोई भी हो. मुझे डर है कि. तुम स्वप्न में चल रहे हो वे तथाकथित यथार्थ. तुम्हारे हाथ-पांव के नीचे से फिसल जायेंगे। अभी भी तुम्हारे चेहरे. तुम्हारी. खुशियों. भापा. मकान. व्यवसाय. व्यवहार. वेदनाएं. वेशभूपा. गुनाह. धुंधबन कर उड़ते जा रहे हैं. तुम्हारी सच्ची आत्मा. तुम्हारी सच्ची काया. मेरे सामने प्रकट हो रही है. तुम्हारी सारी दुनियादारी से अलग हो गया है. रोजगार. धन्धा. दुकान. नियम. विज्ञान. काम-धाम. कपड़े. मकान. दवादारु. खरीदना. बेचना. ...और पढ़े

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विविधा - 35

35-बच्चों की छुट्टियों का सदुपयोग करें शीघ्र ही बच्चों की गर्मी की छुट्टियां शुरु होने वाली हैं। इन लंबी में मध्यम वर्गीय परिवार के लोग न तो लम्बे समय के लिए पर्यटन पर जा सकते हैं, और नही रिश्तेदारों के यहां लम्बी छुट्टियां व्यतीत कर सकते हैं। ऐसे में बच्चे इधर-उधर फिरते रहते हैं। आलस्य से घर पर पड़े रहते हैं ओर सामान्य कार्यो से भी उनका जी उलट जाता है। कुछ बच्चे सिनेमा, टीवी, वीडियो, ताश तथा अन्य खेलों में स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं तो कुछ पास-पड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर केवल गप्पे मारते रहते ...और पढ़े

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विविधा - 36

36-चित्रकथाओं ‘कामिक्स’ के शिकंजे में फंसे बच्चे गर्मियां क्या आती हैं, घरों में बच्चे स्कूल और परीक्षाओं से निपट बिल्कुल खाली हो जाते है। खाली बच्चे दिन भर क्या करें, तो आजकल बच्चे, किशोर और यहां तक कि युवा और बुजुर्ग तक खाली समय में कामिक्स पढ़ते हें। चित्र कथाओं का आनन्द लेते हैं और समय गुजारने के लिए शुरु किया गया यह पढ़ना धीरे धीरे एक आदत, एक नशा सा बन जाता है। आजकल हर गली मोहल्ले में बच्चे को कामिक्स किराये पर देने के लिए एक आध दुकान, अवश्य खुल गई है। जो बच्चे नवीन कामिक्स नहीं ...और पढ़े

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विविधा - 37

37-दस जमा दो के बाद क्या करें ? सर्व प्रथम मैं आपको बधाई देता हूं कि आपने दस जमा की परीक्षा में सफलता प्राप्त की है। अब आप अपने जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं और विज्ञान, शिक्षा, तकनोलोजी, चिकित्सा, कम्प्यूटर, कृपि, गृहविज्ञान, मौसम विज्ञान, वास्तुशिल्प, इंजीनियरिंग, कला व वाणिज्य वर्ग के सैकड़ों क्षेत्र में प्रवेश के हकदार बन गये हैं। यही समय है जब आप अपने व्यक्तित्व, अपनी क्षमताओं तथा अपनी योग्यताओं के आधार पर एक सुखी समृद्ध और संतोपप्रद भविप्य के लिए योजना बना कर काम कर सकते हैं। इस वक्त लिया गया निर्णय आगे जाकर ...और पढ़े

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विविधा - 38

38-बच्चे और अपराध की दुनिया यदि आंकड़े प्रमाण है तो पिछले दो तीन दशकों में बाल अपराधियों और युवा में हिंसा और अपराध करने की प्रवृत्ति में बहुत वृद्धि हुई है। 16 वर्प से कम आयु के लगभग 1500 बच्चे जेल में बंद है। बड़े शहरो में युवाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही है। इन अपराधियों में अपराधिक प्रवृत्ति का विकास होने का एक प्रमुख कारण हमारी दूपित शिक्षा पद्धति है। दस जमा दो हो या इससे पूर्व की पद्धति, सभी में अपराधों की रोकथाम या शिक्षार्थी को अपराधों की ओर जाने से रोकने ...और पढ़े

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विविधा - 39

39-कैसा हो बच्चों का साहित्य ? पिछले कुछ वर्पो में हिन्दी व भारतीय भापाओं में प्रचुर मात्रा में बाल का प्रकाशन हुआ है। अंग्रेजी के साहित्य से तुलना करने पर हिन्दी व भारतीय भापाओं का साहित्य अभी श्ी काफी पीछे है, मगर संख्यात्मक दृप्टि से काफी साहित्य छपकर आया है। सरकारी थोक खरीद, कमीशन बाजी तथा नये प्रकाशकों के कारण साहित्य में संख्यात्मक सुधार हुआ है, मगर गुणात्मक ह्रास हुआ है। पाठ्य क्रम की पुस्तकों पर तो विचार विमर्श तथा जांच परख है, मगर अन्य जो खरीद योग्य साहित्य छप कर आ रहा है उसकी स्थिति ज्यादा सुखद नहीं ...और पढ़े

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विविधा - 40

40-पर्यटन एकलिंग जी का मंदिर झाीलों, फव्वारों और अरावली की श्रृंखलाओं वाले उदयपुर से उत्तर में राप्टीय राजमार्ग 8 22 किलोमीटर दूर एक अत्यन्त रमणीय, सुन्दर और मनमोहक स्थान अवस्थित है। जी हां, मेरा मतलब एकलिंगजी या कैलाशपुरी से ही है। प्राचीन मेवाड़ राज्य के स्वामी भगवान एकलिंग ही है। मवाड़ के महाराणा एकलिंग के दीवान का कार्य करते हुए राज-काज संभालते थे। लगभग 1200 वर्प पूर्व जब बप्पा रावल ने मेवाड़ राज्य की स्थापना की, तो उन्होंने एकलिंग जी को अपना आराध्यदेव बनाया तथा मेवाड़ राज्य उन्हें समर्पित कर दिया। तभी से मेवाड़ राज्य के स्वामी एकलिंगजी है। ...और पढ़े

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विविधा - 41

41-आदिवासी असंतोप: कारण-निवारण आदिवासी-चार अक्षरों का एक छोटा सा नाम, लेकिन सामाजिक व्यवहार के रुप में अनेक समुदाय, जातियां किस्मों में बंटा संसार। और इस संसार की अपनी समस्याएं, अपना परिवेश, अपने रीतिरिवाज। सामान्यतः शांत और सरल, लेकिन विद्रोह का नगाड़ा बजते ही पूरा समूह सम्पूर्ण प्रगतिशील शहररियों के लिए एक ऐसी चुनौती, जिसे सह पाना लगभग असंभव। एक चिंगारी जो कभी भी आग बनकर सबको लपेटने की क्षमता रखती है। आदिवासियों के उपयुक्त संबंधों, रंगबिरंगी पोशाकों, संगीत, नृत्य और संस्कृति के बारे में हमारी अपनी कल्पनाएं हैं। हम उन्हें पिछड़ा, असभ्य, गंदा और गैर-आधुनिक न जाने क्या-क्या कहते ...और पढ़े

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विविधा - 42

42-पुलिस, प्रेस, पब्लिक और पार्टियों का रिश्ता पिछले कुछ वर्पों में शांति व्यवस्था और कानून के मामलों को लेकर बहस हुई है। अक्सर कहीं पर घटी घ्टना को लेकर पुलिस, प्रेस, जनता और पार्टियां एक दूसरे पर दोपारोपण करती हैं। कहीं पुलिस को दोपी बताया जाता है, कहीं पुलिस प्रेस को जिम्मेदार ठहराती है तो अक्सर जनता और राजनैतिक पार्टियां अपने स्वार्थों के कारण प्रशासन और पुलिस पर बरसती रहती है। इस नाजुक रिश्ते पर बहस तो काफी होती है, मगर कोई ठोस नतीजे नहीं आते हैं, और ये चारों एक दूसरे की टांगें खींचते रहते हैं। अपराधों की ...और पढ़े

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विविधा - 43

43-जनतन्त्र-नये आयाम जनवरी 1925 में महात्मा गांधी ने स्वराज्य की परिभापा करते हुए कहा था ‘सच्चा स्वराज्य थेड़े से के सत्ता में आ जाने से नहीं, कल्कि सत्ता का दुरुपयोग होने पर सारी जनता में उसका प्रतिकार करने की क्षमता आने से हासिल होगा। दूसरे शब्दों में, स्वराज जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता उसमें है।’ और जयप्रकाश ने कहा-‘मेरे सपनों का भारत एक ऐसा समुदाय है, जिसमें हर एक व्यक्ति, हर एक साधन निर्बल की सेवा के लिए समर्पित है। ...और पढ़े

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विविधा - 44

44-नशों से कैसे बचे नशीली दवाओं का नशा:- मादक चीजों में आजकल नशीली दवाओं का नशा सभी प्रकार के में बढ़ता चला जा रहा है। नशीली दवाओं की बढ़ती लत पूरी पीढ़ी को समाप्त कर रही है। यह स्थिति आने वाली पीढ़ी के सामाजिक और वैयक्तिक स्वास्थ्य के लिए बडी गंभीर चुनौती है। नई पीढी नशीली दवाओं की ओर बढी तेजी से आकर्षित हो रही है। एक पूरी पीढी नशे के गर्त में डूब रही है। आइये, इसकी पडताल करें। मादक द्रव्यों का प्रयोग एवं नशे की बढ़ती लत आजकल गंभीर चिन्ता का विषय है। आज की यह स्थिति ...और पढ़े

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विविधा - 45

45-वैकल्पिक चिकित्सा में उच्च शिक्षा हमारे देश में अंग्रेजी चिककित्सा शिक्षा का विकास बड़ी तेजी से हुआ है । भी एलोपेथी चिकित्सा शिक्षा सर्वोपरि है लेकिन धीरे धीरे एलोपेथी चिकित्सा की कमियां उजागर होने लगी और लोगों का ध्यान वैकल्पिक चिकित्सा की ओर जाने लगा । सरकारी प्रयासो के कारण वैल्पिक चिकित्सा के साथ साथ वैकल्पिक शिक्षा का भी प्रसार होने लगा । आयुर्वेद, होम्योपैथी, युनानी, प्राकृतिक, सिद्धा, योग, व अन्य देशी चिकित्सा पद्धतियों का विकास होने लगा । आजादी के बाद सरकार ने भी इस शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तर पर तथा केन्द्रीय स्तर पर ...और पढ़े

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विविधा - 46

46-आधुनिक हिन्दी साहित्य में महाराणा प्रताप प्रातः स्मरणीय महाराण प्रताप के विपय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, कुछ लिखा जा रहा है। हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों ने, राजनेताओं ने तथा अनेकों विशिप्ट व्यक्तित्वों ने प्रताप के लिये शाब्दिक श्रद्धा सुमन चुने हैं। प्रख्यात गांधीवादी कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी ने निम्न ष्शब्दों में प्रताप का ‘आव्हान’ किया है-- माणिक, मणिमय, सिंहासन को, कंकड़ पत्थर के कोनों पर। सोने चांदी के पात्रों को पत्तों के पीले दोनों पर। वैभव से विहल महलों को कांटों की कटु ...और पढ़े

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विविधा - 47 - अंतिम भाग

47-साँप: हमारे मित्र साँप का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में डर और एक लिजलिजा अहसास आ जाता आदमी साँपों से डरता है और उन्हें हानिकारक समझता है; लेकिन वास्तविक स्थिति ऐसी नही हैं । साँप हमारे बहुत अच्छे मित्र हैं । उनके द्वारा प्रकृति में कई प्रकार के अच्छे कार्य होते हैं । वे पर्यावरण को शुद्ध करते हैं । खेतों और जंगलों में चूहों को खाकर किसानों की मदद करते हैं । पूरे संसार में ढाई हजार तरह के साँप पाए जाते हैं । इनमें से दो सौ सोलह प्राकर के साँप भारत में पाए जाते ...और पढ़े

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पर्यावरण और भारतीयता

पर्यावरण और भारतीयता यशवंत कोठारी भारतीयता सम्पूर्ण रुप से हम सभी को रक्षित करती है। उसमें प्रारम्भ ही र्प्यावरण को अत्यन्त मुखर स्थान दिया है। हमारी संस्कृति में वृक्ष, पेड़-पौधों, जड़ी बूटियों को देवता माना गया है। पवित्र और देवतुल्य वृक्षों की एक लम्बी परम्परा भारतीयता के साथ गुंथी हुई है। भारतीयता किसी व्यक्ति विशेप से नहीं प्रकृति, र्प्यावरण सांस्कृतिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत में जुड़ी हुई है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारतीयता के रक्षकों, पोपकों ने वृक्षों को पूजने की, उन्हें आदर देने की एक ऐसी परम्परा विकसित की जो भारतीयता में रच बस गयी। घुल ...और पढ़े

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कंप्यूटर साक्षात्कार

कम्प्यूटर साक्षात्कार  यशवन्त कोठारी सम्पूर्ण राष्ट्र दो धाराआंे मंे बंट गया है। मुख्य धारा के पास है, दूसरी धारा कम्प्यूटर प्राप्त करने की कोशिश कर रही है। दोनांे धाराआंे का लक्ष्य कम्प्यूटर है। वे भारत को कम्प्यूटर-प्रधान देश बनाने जा रहे हैं। मुख्य धारा उनके साथ है वे धारा के साथ बह रहे हैं, देश मंे कम्प्यूटरांे की बाढ़ आ रही है। आजादी के चालीस वर्षों के बाद सिद्ध यह हुआ कि कम्प्यूटर हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है। देश मंे सब फूलमालाएं, पान लेकर कम्प्यूटर का इन्तजार कर रहे हैं। प्रगति की मंजिल अब कम्प्यूटर सिद्ध ...और पढ़े

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