Vividha - 10 books and stories free download online pdf in Hindi

विविधा - 10

10- शब्द-शिल्पी यशवन्त कोठारी 

 साधारण तीर की अपेक्षा जहरबुझा तीर अधिक प्रहारक होता है, क्योंकि वह दुहरी मार करता है। इसी प्रकार साहित्य में भी दुहरी मार करने वाली एक ही विधा है और वह है व्यंग्य। यही कारण है कि व्यंग्य विधा में लेखक हेतु दो विशिश्टताएं अनिवार्य हैं। इनमें से एक है विसंगतियों का स्पश्टीकरण और दूसरी है टेढ़ा प्रहार करने की क्षमता। यदि किसी रचना में इन दोनों मेंसे एक का भी अभाव है तो वह व्यंग्य विधा में नहीं रखी जा सकती है। यदि विसंगतियां युगीन सत्य को ईमानदारी के साथ प्रकट करे तो टेढ़ा प्रकार उसे वैदग्ध्यपूर्ण शैली प्रदान करता है और रचना पाठक से तादात्म्य स्ािापित कर अत्यंत प्रभावोत्पादक हो जाती है। व्यंग्य लेखन जब समसामयिक विद्रूपताओं को प्रखरता से प्रतिबिंबित करते हुए उस पर निर्ममता से तिरछा प्रहार करे तो वह निःसंदेह सार्थक हो जाता है। कथ्य की किस विकृति को वह लिये हुए है तथा उसकी ईमानदारी पर तनिक भी संदेह न हो तो वह निश्चित रूप से पाठक से तादात्म्य स्ािापित कर लेता है। पाठक को बांधे रखकर वह उसे कचोटता ही नहीं, अपितु कुछ सोचने पर भी मजबूर कर देता है। 

 उपरोक्त दृश्टिकोण को ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी में व्यंग्य विधा का लेखक अब चिंता का विशय नहीं रहा है। विशय व्यापकता, भाशा की प्रोढ़ता और शैलीगत वैशिश्टय का अभाव अब उसमें दृश्टिगतनहीं होता है। यही कारण है कि अन्य विधाओं की तरह हिन्दी में व्यंग्य भी एक सुस्थापित किया है। इस विधा में जिन अनेकानेक रचनाकारों ने अपनी अस्मिता बनायी है, उनमें एक यशस्वी हस्ताक्षर है-यशवन्त कोठारी। इस व्यंग्यकार की लेखनी से मृदु हास्य का पुट लिए व्यंग्य अनवरत रूप से निःश्रत हुआ है। इन्होंने ‘सूत्रों’ के मयध्यम से व्यंग्य का सूत्र थामा और कुछ ही वर्शों में समकालीन व्यंग्य लेखन की बुनावट में अपनी विशिश्ट डिजाइन के साथ पहिचान बनाते हुए सुस्थापित हो गये। इन सूत्रों में कुर्सीसूत्र, चमचा सूत्र, सम्पादक सूत्र, कवि सूत्र, बाढ़ सूत्र और फिल्म सूत्र जैसे चर्चित सूत्रों ने व्यंग्य विधा में शिल्प के एक नये आयाम को जन्म दिया है। 

 3 माई 1950 को नाथद्वारा राजस्थान में जन्मे श्री कोठारी की व्यंग्य रचनायें राश्टीय स्तर की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। रसायन विज्ञान में इन्होंने सनातकोत्तर उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की है लेकिन संयोग की बात है कि ये राश्टीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर में प्रवक्ता हैं और साथ ही साहित्य में सफल व्यंग्यकार के रूप में जाने जाते हैं। अपनी इस सामान्य स्थिति को श्री कोठारी ने अपने ही शब्दों में इस कलात्मकता के साथ बांधा है-....कुल मिलाकर तीनो ही जगह घुसपैठिया हूं औरइसी कारण कहीं भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन जब व्यंग्य शूद्र से क्षत्रिय हो गया तो मैं भी हो जाउंगा। मैं इंतजार में हूं। ‘लेखक उवाच, हिन्दी की आखरी किताब ’ मेरे विचार से रसायन विज्ञान, आयुर्वेद और साहित्य तीनों ही क्षेत्र में कोठारी की गहरी पैठ का कारण भी उपरोक्त कथन मंे ही ढूंढा जा सकता है। आयुर्वेद से संबंधित रसायन विज्ञान की उनकी कृतियां‘ रस शास्त्र परिचय’ और ‘पदार्थ विज्ञान परिचय तथा हिन्दी साहित्य में उनका समृद्ध व्यंग्य लेखन इस गहरी पैठ के जीवंत प्रमाण हैं। 

 कोठारी के प्रथम प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘ कुर्सी सूत्र’ का काफी स्वागत हुआ है। यह कृति दो खंडों में विभक्त है। प्रथम खंड में चार एकांकी और द्वितीय खंड में पंद्रह व्यंग्य रचनायें हैं। प्रथम खंड की रचनायें राजनैतिक और शैक्षणिक विद्रूपताओं को चित्रित करती है। द्वितीय खंड में विशयों की व्यापकता के साथ व्यंग्यकार ने समाज की बहुआयामी विसंगतियों पर पैना प्रहार किया हें इस खंड में ‘क‘ कबाडी का, 79 में देश में, नव वर्श की शुभकामनाएं, कुर्सी सूत्र, एक खत आम पुलिस वाले के नाम, चुनाव ऋतु आ गई प्रिये, वर वधू विज्ञापन व विवाह और ज्योतिश के चमत्कार सशक्त रचनायें हैं। जैसा कि उपर कहा जा चुका है एक व्यंग्यकार के लिए अनिवार्य शर्त है कि उसमें सामाजिक विसंगतियों को पकडत्रने की क्षमता। वैदग्ध्यपूर्ण शैली में अभिव्यक्त करने की प्रवीणता हो। निःसन्देह श्री कोठारी इस दृश्टि से एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहिचान बनाने में सफल हुए हैं। इसी संकलन से लिये गये वैदग्ध्यपूर्ण २शैली के कुछ नमूने देखिये- ‘वैसे भी लेखक परिवार की अंतिम लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रद्दीवाला यानी कबाड़ी ही है। ‘पृश्ठ 37’ ‘जिन लोगों को डाक्टरेट प्राप्त करने का रोग है उनके लिए कबाड़ी बाजार से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं है।’ ‘पृश्ठ 039’ ‘बाल वर्श के नाम पर देश के राजनैतिक बूढ़ों के बालोचित कार्यक्रम देखकर खुशी जाहिर की गई। ‘पृश्ठ 43’ ‘ सेंसर ने फिल्मों पर अपनी केंची का प्रहार जारी रखा, परिणामस्वरूप दर्शकों को सैक्स और हिंसा से भरपूर चित्र देखने पड़े।’ ‘पृश्ठ 44’...विदेश मंत्री कभी कभी भारत का दौरा करते रहे।’ ‘पृश्ठ 67’ इस प्रकार स्पश्ट है कि विसंगतियों पर ईमानदारी के साथ तिरछा, करारा प्रहार गढ़ने की उनकी क्षमता से कोठारी के भविश्य के प्रति सहज ही असश्वस्त हुआ जा सकता है। २शैली में पैनापन लाने के लिए यह रचनाकार विभिन्न स्ािलों पर जिस पटुता से कल्पना का सहारा लेता है वह देखते ही बनता है। 

 ‘कुर्सी सूत्र’ के बाद कोठारी का व्यंग्य संकलन ‘हिन्दी की आखरी किताब’ सामने आया। इनमें व्यंग्य का तेवर और अधिक प्रखर हुआ है। ‘हिन्दी की आखरी किताब’ में लूंगरों की मौत पर, हम विकलांगी, पति पर प्रतिशोध प्रलाप और हिन्दी की आखिरी किताब कसावट लिए हुए अत्यंत प्रभावशाली रचनायें हैं। ल्यूकेमिया कहानी एक वैज्ञानिक की, अनैतिकता और बाढ़ में फंसा मैं जैसी रचनायें सिद्ध करती हैं कि कोठारी करूण रस में भी गंभीर रचनायें समान अधिकार से लिखने में सक्षम हैं। ‘हलो कौन, जी मैं टेलीफोन’ हास्य प्रधान प्रभावी रचना है। अंतिम रचना ‘हिन्दी की आखरी किताब’ में चुटीली व्यंग्यात्मक परिभाशाएं हैं। कुछ नमूने देखिए-‘पाठक वह गधा है जिस पर हर कोई लदने की कोशिश करता है, लेकिन दुलत्ती खाकर चित गिरता है। पुरस्कार-जो मुझे मिलना चाहिए था और दूसरों को मिल गया, वही पुरस्कार है। नई कविता-जो न तो नई हो और न कविता हो, उसे यार लोग नई कविता कहते हैं।’

 अपनी स्वतंत्र कृतियों के अतिरिक्त कोठारी अनेक व्यंग्य संकलनों में सहभागी रचनाकार रहे हैं। देश के प्रतिनिधि व्यंग्यकारों की रचनाओं के संकलन ‘बानगी’ ‘ सं.बालेन्दुशेखर तिवारी’ में कोठारी की रचना वी.आई.पी. का आगमन वास्तव में इनकी रचनाजन्म प्रभावोत्पादकता की बानगी प्रस्तुत करती है। इसी प्रकार कई सम्पादित हास्य व्यंग्य पुस्तकों में भी उनकी रचनायें हैं श्री कोठारी की नई कृति यश का शिकंजा ‘सत्साहित्य प्रकाशन दिल्ली-6 ’ से आई है। यह पुस्तक कोठारी के व्यंग्यकार व्यक्तित्व के कई नये आयाम हमारे सामने खोलती है। 

 इस पुस्तक में प्रथम रचना ‘यश का श्किंजा’ एक लघु व्यंग्य उपन्यास है जो देश में व्याप्त राजनीतिक भ्रश्टाचार का जीवन्त दस्तावेज है। काल्पनिकता के सहारे श्री कोठारी ने राजनीतिक भ्रश्टाचार पर कई प्रहार किए हें। 

 इसके अलावा पुस्तक में 21 अन्य व्यंग्य रचनाएं हैं जिसमें आवश्यकता है कुलपति की, भूमिका लेखक एक नया राजगार, साहित्य से शहसवार तथा वार्शिक प्रतिवेदन जैसी सश्सक्त रचनाएं हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोठारी व्यंग्यकार के रूप में राश्टीय स्तर पर जाने लगे हैं। 

 यश का शिकंजा के बाद यशवन्त कोठारी की कविता पुस्तक ‘अकाल और भेड़िये’ आई, जिसमें समकालीन जीवन से जुड़ी कविताएं थी, इन कविताओं का व्यापक स्वागत हुआ तथा साहित्य अकादमी ने इस संकलन पर तीन हजार रूपयों का अनुदान दिया। अगले वर्श ही यशवन्त कोठारी की नई व्यंग्य पुस्तक राजधानी और राजनीति आई जिसमें 45 व्यंग्य रचनाएं संकहलत हैं इन व्यंग्य रचनाओं में समाज में व्याप्त असंगतियों, विदूपताओं, तथा मध्यम वर्गीय मानसिकता को उकेरने वाले महत्वपूर्ण व्यंग्य हैं। इस पुस्तक के तुरन्त बाद यशवन्त कोठारी की बाल साहित्य की नेहरू जी की कहानी व नकहरू के विनाद नामक पुस्तकें आईं। 

 1996 में मास्टर का मकान नामक व्यंग्य पुस्तक के छपते ही व्यंग्य साहित्य की दुनिया में एक धमाका सा हुआ। इस पुस्तक में भी 45 व्यंग्य हैं और सभी एक से बढ़कर एक । मास्टर का मकान पर साहित्य अकादमी 5000 रूपये की सहायता दी। तथा मास्टर का मकान पर साहित्य अकादमी ने ग्यारह हजार रूपये का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार दिया। इसके अलावा यशवन्त कोठारी की भारत में स्वास्थ्य पत्रकारिता, बाल हास्य कहानियां, सर्प हमारे मित्र, खानपान, कब्ज से कैसे बचें, नशों से कैसे बचें, ज्ञाप-विज्ञान,महाराणा प्रताप प्ररक प्रसंग, ‘ठ’ से ठहाका, बोने व अन्य नाटक, फीचर आलेख संग्रह, चमचा सूत्र, वसन्त सेना ‘उपन्यास’ आदि पुस्तकें प्रकाशित हैं। 

 वे कई राश्टीय-अन्तर्राश्टिय सेमिनारों में भाग ले चुके हैं। वे नई गुदगुदी मासिक के मानद सहायक सम्पादक वर्शों तक रहे हैं। वे जर्नल ऑु आयुर्वेद के प्रबन्ध सम्पादक भी हैं तथा रसायन विज्ञान के एसोशिएट प्रोफेसर हैं श्री कोठारी को कई सम्मान-पुरस्कार मिल चुके हैं। वे जीवन के प्रति एक स्वस्थदृश्टिकोण रखते हैं। 

 व्यंग्य लेखन की सार्थकता के बारे में कोठारी का स्वस्थ दृश्टिकोण है जो उन्होंने एक साक्षात्कार में व्यक्त किया है। इनका कहना है, ‘व्यंग्य की सार्थकता इसी में है कि वह समाज के अन्दर की विसंगतियों पर चोट कर, मुखोटों को बेनकाब करे और लोगों को साचने के लिए मजबूर करे। व्यंग्य युधार की ओर प्रेरित करें।’ कोठारी का उपरोक्त दृश्टिकोण इनकी रचनाओं में बखूबी प्रतिबिंबित होता रहता है। 

 कथ्य में विसंगतियों की पकड़, शैली में विदग्धता,ध्वन्यात्मक तीखापन, प्रतीकात्मक प्रयोग, कल्पना का उपयोग, परिप्रेक्ष्यानुसार शब्द चयन में सटीकता, आदि विशिश्टताएं जो एक सफल व्यंग्यकार के लिए अनिवार्यताएं हैं, वे श्री कोठारी में निःसन्देह परिलक्षित होती है। अतः इनमें बैठा रचनाकार भविश्य के अनेकानेक पड़ावों को सहजता से पार करता हुआ व्यंग्य विधा के शिखर को निश्चित ही स्पर्श करेगा-इस बात से सहज ही आश्वस्त हुआ जा सकता है। 

      -स्व. महेशचन्द्र पुरोहित 

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