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विविधा - 43

43-जनतन्त्र-नये आयाम

 जनवरी 1925 में महात्मा गांधी ने स्वराज्य की परिभापा करते हुए कहा था ‘सच्चा स्वराज्य थेड़े से लोगों के सत्ता में आ जाने से नहीं, कल्कि सत्ता का दुरुपयोग होने पर सारी जनता में उसका प्रतिकार करने की क्षमता आने से हासिल होगा। दूसरे शब्दों में, स्वराज जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता उसमें है।’ और जयप्रकाश ने कहा-‘मेरे सपनों का भारत एक ऐसा समुदाय है, जिसमें हर एक व्यक्ति, हर एक साधन निर्बल की सेवा के लिए समर्पित है। अंत्योदय। वह एक ऐसा समुदाय है, जिसमें अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं, जिसमें सत्ता को सुविधा नहीं माना जाता, बल्कि जनता द्वारा सौंपा गया भरोसा माना जाता है।’ 

 गांधी की बाणी को इस देश ने सहज मतपेटी के माध्यम से इस बार मार्च में व्यक्त कर दिया।

 राजनीति का विकास इस संसार में सदियों से चला आ रहा है और मानव समाज इस विकास की मदद से एक निश्चित जगह तक पहुंचने में समर्थ भी हुआ है लेकिन दुर्भाग्य से राजनीति के विकास का यह बिन्दु ही चरम बिन्दु मान लिया गया और आगे का रास्ता ही बन्द है, ऐसा सोचने वालों का बाहुल्य हो गया है। राजनीति स्वयं अंधी और आगे का रास्ता बन्द। ऐसी स्थिति में संसदीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के विपय में सोचना अत्यंत आवश्यक हो गया है। चुनाव आदि की राजनीति में काफी धन जन और शक्ति खर्च हो जाती है और इसी कारण लोकतंत्र का नया मार्ग ढूंढ़ पाना मुश्किल हो जाता है। 

 महाभारत के शांतिपर्व में भीप्म पितामह शरशैय्या पर लेटे लेटे महाराजा युधिप्ठिर को गणतंत्र व भारत की राजनीति के बारे में दीक्षा देते हैं। दीक्षा के प्रसंग में वे कहते हैं:-

 ‘गणों में, कुलों में तथा राजाओं में बैर की आग प्रज्वलित करने वाले वे दो ही दोप हैं-लोभ और अमर्प। पहले एक व्यक्ति लोभ का वरण करता है। तदनन्तर दूसरे के मन में अमर्प उत्पन्न होता है। ये प्रभावित व्यक्ति समुदाय, धन और जन की भारी हानि उठाकर एक दूसरे का विनाश शुरु कर देते हैं।’ 

 इसी संबंध में आगे चलकर भीप्मजी युधिप्ठिर को गणराज्य में राजा और प्रजा के संबंध तथा राजा के व्यवहार के बारे में बताते है।

 ‘गणराज्य के प्रधान अधिकारियों, मुख्य व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिये जाति और कुल में सभी एक समान हो सकते हें,परन्तु उद्योग, बुद्धि और रुप सम्प्राति में प्रजा का एक सा होना असंभव है अतः गणराज्य की प्रथा को संघबद्ध व एकता से रहना चाहिए। महाभारत कालीन गणराज्य की यह व्याख्या अर्वाचीन काल में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आज भी लाकशाही के तले वर्ण संघर्प की ही बात की जा रही है। वर्ग संघर्प अमीर तथा गरीब, साधन या साध्य का ही नहीं रह गया है। संघर्प के कारणों की तह में जाने पर लोकशाही की उदार परम्परा भी एक कारण है कुर्सी, शक्ति और चाटुकारिता मिल कर लोक ष्शाही में वर्ग संघर्प को उकसाती है और दबे हुए लोग संघर्प की ओर अग्रसर होकर लोकशाही के माध्यम से ही सत्ता को अपना नेतृत्व सोंपते हैं, लेकिन क्या लोकतंत्र के सत्ता परिवर्तन मात्र से संघर्प समाप्त हो जाता है या वर्ग और वर्ग विभंद नप्ट हो जाते हैं। नहीं, ऐसा नहीं होता है। लोकशाही के विकास के अगले कदम के लिए दुतरफा मोर्चा बनाया जाना चाहिए। सर्वप्रथम तो लोकमानस में एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आवश्यक है जो उसे यह समझा सके कि सब की भलाई में ही उसकी भलाई है। सब के उदय और उत्थान में ही उसका उदय और उत्थान है। यह यह भावना लोकमानस में आग्रत करना ही अपने आप में जनतंत्र की एक उपलब्धि होगी। क्योंकि जनतंत्र महानगरों में नहीं गांव की झोपड़ियों में पुप्पित पल्लवित हो रहा है और उदय और उत्थान भी झोपड़ि वाले मतदाता का किया जाना है। 

 इस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ ही आज के समाज में सवार्थ, व्यक्तियों, समुदायों और अधिकारों के बीच जो शीतयुद्ध चल रहा है उसे समाप्त किया जाना चाहिये। शीतयुद्ध गणतंत्र की अग्नि परीक्षा है और गणतंत्र को इस परीक्षा से उबारा जाना चाहिए। हमें राजनीति को जननीति की ओर ले जाना है न कि जननीति को राजनीति की ओर सत्ता के पक्ष के लिये तैयार की गयी राजनीति हमेशा ही स्वार्थी ओर संकीर्ण मनोवृत्तियों से भरी हुई होती है लेकिन अगर जननीति को लेकर राजनीति को गठित किया जाये तो यह अच्छी शुरुआत होगी और लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी। जनता को आधार मानकर जो नई नीति होगी वही भावी राजनीति हो जिसमें सभी का उदय शामिल हो। 

 लोकशाही का मूलभूत तत्व दण्ड को धीरे धीरे कम करना है और जिस अनुपात में दण्ड कम होगा उसी अनुपात में लोकशक्ति का विकास होना चाहिए। सरकार और सरकारी कामों के उपर जनता और जनता के कार्यो को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अन्यथा लोकशाही का आशय ही गलत हो जाता है। लोकशाही में सरकार का अधिक महत्व होना उसे राजशाही को ओर ले जाना है। 

 इस देश में जहां लोकशाही का भविप्य मतदाता के हाथ में पूर्णरुप से सुरक्ष्ति है। तानाशाही अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। मतदाता का जनमानस इतना अधिक जाग्रत हो चुका है कि उसे बरगलाया नहीं जा सकता है। ऐसी स्थिति में हमें मतदाता को कुछ अधिक मनोवैज्ञानिक ढंग से समझाना है कि वह अपनी शक्ति पहचाने और लोकशाही के उत्थान में अपना उत्थान समझे। ताकि इस देश में उत्पन्न होने वाली नई पीढ़ी रवि बाबू का गीत ओजस्वी शब्दों में गा सके- 

  ‘जहां हृदय में निर्भयता है और मस्तक

  अन्याय के सामने नहीं झुकता

  जहां शब्द सत्य की गहराई से आते हें

  जहां अनथक उद्यम पूर्णता के आलिंगन के लिए हो 

   भुजायें पसारता है। 

जहां विवके की निर्मलधारा रुढ़ियों के मरुस्थल 

 में सूख कर लुप्त नहीं हो गयी

उस स्वाधीनता के दिव्य लोक में, 

 मेरे प्रभु,

 मेरा यह देश जागे। 

    ‘चित्त जेथा भयशून्य-गीतांजलि’

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अनुशासन

कवीन्द्र रवीन्द्र ने गीतांजलि में लिखा है -

  ‘तू जहां जब उंचे सिंहासन पर बैठा था,

  मैं यहां बैठे गीत गा रहा था

  तेरे कानों तक उन गीतों की स्पप्ट सी ध्वनि पहुंची

  और तू नीचे उतर कर मेरे घर के द्वार की सीढ़ियों 

  पर खड़ा हो गया। 

  तू वरमाला हाथ में लेकर नीचे उतर आया

  और मेरे निर्जर घर के द्वार की सीढ़ियों पर 

  खड़ा हो गया।’

यह एक कवि का आत्मानुशासन था, जो कि राजा को कविवर के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर देता हे, लेकिन कहां गया वह अनुशासन ? कुछ वर्प पूर्व अनुशासन ही देश को महान बनाता है’, जैसा नारा दिया गया। नारे के साथ ही अनुशासन बनाये रखने की समस्त ोिशिशे की गई, लेकिन यह अनुशासन शायद भारतीय जनतंत्र को रास नहीं आया। परिणमस्वरुप यह अनुशासन नहीं चल पाया। अनुशासन के आदि ग्रन्थ मनुस्मृति में भारतीय मानस, राजा, प्रजा आदि के आचार-विचार, शासन, अनुशासन, आत्मानुशासन आदि की विस्तृत चर्चा की गई है। भर्तृहरि के नीतिशतक में उल्लेख करते हुए कहा गया है - 

कुत्ता भोजन देने वाले के सामने पूंछ हिलाता है, चरणों में लोटता है धरती पर गिर-गिर कर मुख और पेट दिखाता है लेकिन श्रेप्ठ हाथी अपने स्वामी की ओर गंभीरता से देखता है और सम्मान के साथ भोजन करता है। 

देश को केंचुओं वाला अनुशासन नहीं चाहिये। हमें हाथी जैसा स्वाभिमान और स्वानुशासन चाहिये। ‘कै हंसा मोती चुगै कै लंघन करि जाय।’ लेकिन बुद्धिजीवी तबके ने पिछले वर्पों में अपनी स्थिति इतनी दयनीय बना ली है कि अनुशासन के नाम पर आत्मरति और चाटुकारिता का विकास कर लिया है। नीतिशतककार फिर कहता है- 

 यथा कन्दुकपातेनोत्यतत्यार्य पतन्नपि। 

 तथा त्वतार्यः पतति भृत्पिएडपतनं यथा।। 

यानी सज्जन और गुणवान व्यक्ति तो गेंद की तरह गिर कर भी उपर उठते हैं, लेकिन पतित व्यक्ति मिट्टी के लोंदे की तरह भूमि पर गिर कर मिट्टी से चिपक जाते हैं। आज सर्वत्र चिपको- अनुशासन चल रहा है। वह लेखक सर्वोतम जो मंत्री का भापण लिखे, वह वैज्ञानिक उत्तम जो मंत्री-पुत्र को रसायन शास्त्र पढ़ाये, वह डाक्टर अच्छा जो मंत्री पत्नी का इलाज करे। ऐसी स्थिति में अनुशासन का क्या महत्व रह जाता है ? जो स्वाभिमानी, अनुशासन प्रिय हैं वे मौन भी नहीं रह सकते, क्योंकि बाबा का मौन अनुशासन और भी गुढ़ एवं रहस्यात्मक है। 

अनुशासन शब्द में अनु विर्सग है और शास धातु। राजाज्ञा कहे हुए को फोलो करना ही अनुशासन है। पुत्र पिता का कहना माने, लघुभा्रता बड़े भाई का कहना माने, अफसर मंत्रियों का कहना माने, विद्यार्थी गुरुओं का कहना मानें, पुलिस और सेना सेनापतियों की आज्ञा का पालन करे तो अनुशासन हो। लेकिन, आज तो कहीं भी अनुशासन नहीं है। राजनीति, साहित्य, कला, उद्योग, विश्वविद्यालय हर क्षेत्र अनुशासनहीन हो रहा है।

आन्दोलन, हड़ताल, घेराव, तालाबन्दियां, बन्द आदि से आम आदमी इतना बोर हो चुका है कि वह सब से दूर भागना चाहता है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि सर्वत्र अनुशासनहीनता व्याप्त हो गई है। हर व्यक्ति इसका दोप दूसरे पर मढ़ देना चाहता है। एक ही आवाज आती है, ‘हम सब अनुशासनहीन हो गये है।’ अनुशासनहीनता से देश को हानि हो रही है, लेकिन अनुशासनहीनता की जिम्मेदारी तो शासन की है। शासन की दएड व्यवस्था ही अनुशासन को बनाये रख सकती है बाबा तुलसी के शब्दों में -

  ‘भय बिनु होई न प्रीत’

तो क्या दण्ड के बिना अनुशासन सम्भव नहीं है ? लेकिन डंडे के अनुशासन को भी तो भारतीय जनता ने स्वीकार नहीं किया। डंडा व्यक्ति या समाज को डरा सकता है, धमका सकता है और डर के कारण उपरी तौर पर अनुशासन भी दिखाई दे सकता है, लेकिन यह तो अस्थायी इलाज है, इससे व्यक्ति और समाज दोनों ही पालतू हो जायेंगे और पालतू होने की क्रिया में ‘स्व’ नप्ट हो जाता है। हमें रुस जैसा अनुशासन भी पसंद नहीं आ सकता, क्योंकि वहां पर डण्डानुशासन ही एक तरीका है, आत्मानुशासन ही देश को प्रगति की ओर ले जा सकता है। 

वास्तव में देखा जाये तो स्वानुशासन व्यक्ति की एक अन्दरुनी व्यवस्था है, जो उसे पसंद है। संयम, विग्रह और निपेद तथा वर्जना से उपजा आत्मानुशासन ही व्यक्ति को महान बनाता है और व्यक्ति से समाज और समाज से राप्ट महान बनता है। आन्तरिक व्यवस्था के उपजने के कारण सारा व्यक्तित्व ही अनुशासित हो जाता है। जीवन के हर कार्य क्षेत्र में व्यक्ति अनुशासित रहता है। पालतू नहीं बन सकता। व्यक्ति गूलाम नहीं बनता है, अपितु गोरवान्वित होता है। अभय की ऐसी ही कल्पना जैन दर्शन में की गई है। लेकिन झगड़े के इस आधुनिक युग में किसे समय है अनुशासित होने का और हर व्यक्ति यही कहता है, ‘मैं ही क्यों ? आप क्यों नहीं।’ लेकिन आइये, जरा प्राचीन भारतीय वाड्.मय को टटोलें - 

याद करिये रामायण के वे प्रसंग जब भगवान राम विमाता के वचनों की रक्षा हेतु चौदह वर्प वन गमन कर जाते हैं। क्या आज ऐसा अनुशासन संभव है ? जब रावण मृत्यु के आगोश में होता है तो भगवान राम ल्क्ष्मण को आदेश देते हैं, ‘जोओ, महाराज रावण से राज-दीक्षा ग्रहण करो।’ है कोई ऐसा भ्राता, जो इस अनुशासन की पालना आज के अर्थप्रधान युग में करे। 

महाभारत में भी ऐसी ही अनेक युक्तियां आई हैं। बगुले को बड़ा धर्मप्राण बताया गया है, लेकिन मछलियों ने कहा, ‘हमसे पूछो कि बगुला क्या है ?’ आज सम्पूर्ण देश को बगुला संस्कृति ने अपनी लपेट में ले रखा है। शांति पर्व में मृत्यु शैय्या पर हैं। युधिप्ठिर को राजतंत्र की दीक्षा देते हुए वे कहते हैं - 

‘गणराज्य के प्रधान अधिकारियों, मुख्य व्यक्तियों को अनुशासन में रहकर प्रजा को प्रभावित करना चाहिए।’ 

‘गणराज्य की प्रथा को संघबद्ध व एकता से रहना चाहिए’, लेकिन आज भी लोकशाही क्या इस स्तर पर पहुंच पाई है। नैतिकता की कमी, राप्टीय चरित्र का अभाव और भ्रप्टाचार की चरमसीमा। कारण उपर से लगा कर नीचे तक सर्वत्र एक ऐसा तिमिर छाया है कि कहने-सुनने का असर ही समाप्त हो गया है। हर व्यक्ति अपने आपको हर तरह से स्वच्छंद समझता है, लेकिन स्वतंत्रता को ही स्वच्छंद बना लेना न्यायसंगत नहीं है। 

रुसी की आजादी के तुरन्त बाद एक वृद्धा स्वतंत्रता के नाम पर बीच सड़क पर चलने लगी। यह स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छंदता है।’ लिबर्टी इज नाट ए परसन कान्टेंट बट ए सोशल एफेयर आलसो।’ आज के समाज में सब कुछ परसनल है। पति कहता है कि शाम को पत्नी कहां पर रही, वह उसका निजी मामला है। क्या यह अनुशासन है?नहीं मेरे दोस्तो, जरा सोचो। 

वास्तव में नैतिकता ही व्यक्ति का विवके है। विवके से ही सामाजिक चेतना और अनुशासन का नियमन होता है। व्यक्तिगत और सामाजिक चेतना अलग नहीं हैं। ये दोनों एक ही व्यक्ति के मानस से उपतजी हैं। व्यक्ति की नैतिकता ही आगे जाकर राप्ट की नक्तिकता बनती है। व्यक्ति का अनुशासन और चरित्र ही राप्टीय अनुशासन और चरित्र के रुप में विकसित होते हैं। 

लेकिन इस समय सम्पूर्ण देश में स्थिति ऐसी विस्फोटक है कि अनुशासन समाप्त हो गया है। जिन्हें रक्षा का काम दिया गया, उन्होंने भागलपुर कांड कर दिया। जिन क्षेत्रों को गांधी ने अहिंसा सिखाई, वे उसी बन्दूक से देशवासियों को प्रांत से बहर भेजना चाहते हें। 

वास्तव में भौतिक समृद्धि को ही आधुनिकता, प्रगति और सामाजिक इज्जत का आधार बना लिया गया है। इस कारण हमारी वर्तमान व्यवस्था और मानदंड आयातित होते हैं तो उन पर हमारा बस नहीं होता है। पश्चिम से साहित्य, संस्कृति सब कुछ आयातित करते रहने की यह प्रवृति निन्दनीय है। 

राजनेता, अफसरशाह, नैकरशाह, सभी इस देश को कामधेनु समझते हैं। जब तक सत्ता में हैं उसे दुहते रहें। कल पता नहीं क्या हो ? जनता यदि रोटी, कपड़ा और मकान की मांग हेतु आंदोलन करती है तो यह राजनेताओं के प्रति द्रोह है। अरे मरे देश के मकान मालिकों, आपका जो वनज बीयर की कृपा से निरन्तर बढ़ रहा है, उसे भी तो कुछ कम करो। 

महाराणा प्रताप स्वयं घास की रोटी खाते थे और उनके लिए आदिवासी, मीणा जी जान से लड़ते थे, लेकिन इन आधुनिक राजाओं के लिए क्या कोई गाडोलिया लुहार बनेगा ? नहीं, आचरण ही ऐसा है कि व्यक्ति सामने भले हाथ जोड़ ले, तिरछा होकर घृणा से अवश्य मुस्कारा देगा। 

लगे हाथ शिक्षा जगत पर भी एक नजर डाल दें। आज अध्यापक इस कोशिश में है कि छात्र को एक्सप्लाइट करके एक प्रमोशन झटक लूं। छात्र जानता है कि स्कालरशिप, फ्रीशिप और अन्य लाभ गुरुजी दिला सकते हैं। 

अथर्व-वेद में शिक्षक छात्र को जगाते हुए संदेश देता है- 

 ‘हे अमृत पृत्रो! उठो, तिमिर नप्ट हो रहा है,

 ज्ञान का मधु स्त्रावित हो रहा है। इसका पान करो।’

लेकिन आधुनिक द्रोणाचार्य एकलव्य को क्या देता है ? यदि एकलव्य द्रोणाचार्य को अंगूठा दिखा देता है तो कुछ भी गलत नहीं है। कहां है वह अर्जुन का अनुशासन, जो केवल चिड़िया की आंख को देखता है। जाने दीजिये। 

आज गुरु चाहते हैं कि राजनीति के चक्रव्यूह को आधुनिक अभिमन्यु भेद कर उनके लिए कुछ ले आये और गर्भस्थ अभिमन्यु को कोई चक्रव्युह भेदन का अनुशासन नहीं सिखाना चाहता। यदि अभिमन्यु संस्कारविहीन हो गये हैं तो अभिमन्युओं के साथ साथ पूरा समाज दोपी है। धर्म के नाम पर प्रति वर्प हजारों जानें जाती हैं। क्या धर्म ऐसा अनुशासन सिखाता है ? नहीं, राजनीति धर्म को विकृत स्वरुप में प्रस्तुत कर रही है। 

मेरी गलती आत्मा की आवाज है और तुम्हारी आत्मा की आवाज अनुशासनहीनता। कब तक ऐसा चलता रहेगा। और जब तक ऐसा चलेगा हम कैसे इस समाज को अपना समाज समझेंगे ?

एक कार्यालय का उदाहरण लीजिये। एक अफसर और चन्द मातहत। अफसर का कार्य दस्तखत करना। कार्य अच्छा हुआ तो अफसर को शाबासी और प्रमोशन। यदि कोई गलती हो तो बेचारा क्लर्क मारा गया। जब तक ऐसी व्यवस्था कायम है, अधीनस्थ कर्मचारी कभी भी कार्यलय को अपना नहीं समझ सकेंगे। 

अनुशासनप्रिय सभी हैं, लेकिन कोई भी स्वयं में अनुशासित होना नहीं चाहता। मैं तो ठीक हूं तुम अनुशासित हो जाओं। ’अरे भाई तुम भी अनुशासन में हो जाओ।’ 

‘यह कैसे हो सकता है।’ 

जब तक यह कैसे हो सकता है ? जीवित है, कुछ नहीं हो सकता है। 

जब तक अनुशासन, आचरण और व्यवहार में मौलिक परिवर्तन नहीं आ पाते अनुशासन की मृग-मरीचिका बना ही रहेगी। 

जर्मन कवि हरमन हैंस कहता है- 

 ‘...तन कर खड़े हो जाने और जूझ पड़ने को दृढ़ता, 

हृदय की गहरी, बहुत गहरी पर्तों में छिप्पा हुआ विद्रोह, 

और फिर मेरी यह आस्था, 

आज इस तरह मुझे बेचैन बना रही है- 

वह एक दिन,

एक ज्योति में रुपान्तिरित होकर रहेगी......

 

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