विविधा - 17 Yashvant Kothari द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

विविधा - 17

17 - हास्य व्यंग्य का बोलवाला 

 आज की स्थिति भिन्न है। हास्य व्यंग्य की सतही रचनाओं के कारण कवि सम्मेलनों की गिरावट हुई है। कवि सम्मेलनों के विकास काल में हास्य व्यंग्यकार मर्यादा का ध्यान रखते थे, इसी काल में पदमश्री गोपाल प्रसाद व्यास और पद्मश्री काका मंच पर अवतरित होकर जम गये और आज तक जमे हुए हैं। लेकिन सन् 60 के बाद वाले दौर में इन हास्य कलाकारों की ऐसी बाढ़ा आई कि सारी मर्यादाएं, सीमाएं,बह गई, रह गई केवल हास्यस्पद रस की चाहें। उन दिनों अश्लील और भेदस रचनाओं को पढ़ना मुश्किल होता था, लेकिन कवि सम्मेलनों की बाढ़ में उफन कर ये ही कवि सबसे उपर आये। हास्य व्यंग्य के इन कवियों में शैल चतुर्वेदी, ओम प्रकाश आदित्य,माणिक वर्मा, काका हाथरसी, जैमिनी हरियाणवी, अल्हड़ बीकानेरी आदि कवि प्रमुख हो गये। 

 इसी दौर में राजस्थानी कविताओं के लिए विश्वनाथ शर्मा विमलेश और कन्हैयालाल सेठिया को हमेशा याद किया गया। बाद में सुरेन्द्र शर्मा भी अपनी चार लाइनों के साथ लाइन में लग गये। रामरिख मनहर लतीफों के बल पर जम गये। 

हास्य से कुठाराघत 

 पिछले महायुद्ध के समय कवि सम्मेलन युद्धकोप में चंदा करने के लिए हुए थे। बाद में 1962, 65 व 71 की लड़ाई के दौरान भी कवि सम्मेलनों का यही प्रयोजन रहा। नगर नगर में क्रांति हो गयी, एक नया धनाढ्य वर्ग विकसित हुआ, और यहीं से छपने वाली कविता, मंच की कविता से अलग हो गयी। हिन्दी कवि सम्मेलनों का विशेप नुकसान हास्य रस के कवियों ने किया। कवि कुरूचिपूण्र और अश्लील होने लगे। कवियित्रियों को साथ लाने लगे। 

गद्य का आगमन 

 इस बीच मंच पर गद्य पाठ का दौर भी शुरू हुआ है, जो एक शुभ संकेत है। शरद जोशी ने इस दौरान मंचों से नव व्यंग्य का पाठ करके काफी सफलता पाई है। के. पी. सक्सेना ने भी गद्य पाठ में जोर अजमाइश की है। कवि-सम्मेलनों में अब गद्य पाठ भी शामिल होने लगा है। 

मूर्ख, महामूर्ख सम्मेलन 

  हर होली पर मूर्ख, महामूर्ख सम्मेलन भी होने लगे हैं, जिनमें हास्य व्यंग्य की कविताओं के अतिरिक्त चुटकलेबाजी भी खूब होती है। विशेप रुप से हास्य व्यंग्य का एक गद्य पद्य सम्मेलन बंबई में चकल्लस के नाम से आयोजित किया जा रहा है। बंबई के एक प्रकाशक विक्रेता ने इस के कैसेट बनाकर बिक्री करने का नया प्रयोग भी शुरु किया है। 

 आज के कवि-सम्मेलनों को देखकर कौन कह सकता है कि ये सरस्वती की साधना के समागम हैं। आज किसी सम्मेलन में सभी रसों का भाव नहीं है। हास्य व्यंग्य के अलावा श्रोता जीवन से जुड़ने वाली कविता चाहता है, जो उसे नहीं मिल पाती। 

 कविता शब्द ब्रहम् की कला है और नाद सौन्दर्य से ओतप्रोत, कवि का मुख उसे वाणी देता है और बस-यदि नाद सौन्दर्य है तो कविता रूचिकर होगी ही। 

 हिन्दी के विकास में कवि सम्मेलन आज भी बहुत कुछ कर सकते हैं यदि वे दलबन्दी, गुटों की राजनीति, छीना झपटी से उपर उठ जायें तो। 

आयोजन की अर्थलीला 

 कवि सम्मेलनों के लिए शहर, कस्बों में एक नवीन वर्ग में विकसित हुआ है, जो आयोजनकर्ता है। इन आयोजकों में से अधिकांश नव धनाढ्य वर्ग से आते हैं। ये वे लोग हैं जो अपनी अंगुली में साहित्य का नग भी पहनना चाहते हैं। 

 आजकल एक कवि सम्मेलन का खर्च 20-30 हजार से लगाकर 50-60 हजार तक का होता है। पांच राप्टीय स्तर के कवियों तथा 5 स्थानीय कवियों का पारिश्रमिक, तीन तारा होटलों का खर्च, ष्शराब आदि का व्यय कम से कम 15-20 हजार आता है। 

  इसके आयोजक चाहे टिकट लगाए या चन्दा करें या स्मारिका छपाये, इतना धन इकट्ठा करना अनिवार्य है। इस एकत्रित धन में से 60-70 प्रतिशत उसी सम्मेलन में व्यय हो जाता है, ष्शेप से साल भर अपनी संस्था, अपनी पत्रिका आदि निकाली जाती है या फिर अपनी अटारी पर एक मंजिलऔर चढ़ा ली जाती है। कई बार कवियों को पहले से तय राशि के बजाय केवल आश्वायन मिलते हैं लेकिन कवि भी सतर्क हो गये हैं, अतः ऐसा कम होता है। 

 नव धनाढ्य वर्ग के आयोजक अध्यक्ष,मुख्य अतिथि,संरक्षक, स्वागतकर्ता जैसे पदों पर अपने धनाढ्य मित्रों को रख्कर चन्दा प्राप्त करते है। 

 दूसरी ओर कवि सम्मेलनों का संयोजक संचालन हेतु भी कवि विशेपज्ञ के रुप में मिलते है। ये कवि अपने साथ पूरी बारात लेकर चलते है, आप केवल बजट बतादें, कवियों को निमंत्रण से लगाकर बाकी की सब व्यवस्था ये संचालक कवि कर देंगे। हां, कवयित्रियों के लिए आपको विशेप रुप से लिखना होगा। 

सामान्य राप्टीय स्तर के कवि का पारिश्रमिक 2500 से 10,000 रू. तक है। अधिकांश कवि प्रथम श्रेणी या हवाई जहाज का किराया, तीन सितारा होटलों में आवास तथा खाना-पीना ‘या पीना-खाना’ लेते हैं। बम्बई का चकल्लस, मध्य प्रदेश का टेपा सम्मेलन, जयपुर का मूर्ख सममेलन व गीत चांदनी आदि प्रमुख आयोजन हैं, जिनका बजट ज्यादा रहता है। 

हूटिंग जिंदाबाद 

 कवि- सम्मेलनों का सबसे दिलचस्प पहलू है ‘हूटिंग’ का कार्यक्रम। कई बार पूरी कविता से जितना आनन्द, रस प्राप्त नहीं होता उससे ज्यादा आनन्द हूटिंग से आ जाता है। कई लोग कवि-सम्मेलनों में मात्र हूटिंग करने के लिए ही जाते हैं। ऐसे ही हूटिंग विशेपज्ञ हैं श्री झपकलाल। ये महिला कवियों के मामले में एक्सपर्ट हैं, करना कुछ नहीं पड़ता, ज्योंही कवयित्री कविता ष्शुरू करती है, वे कहते हैं-‘किस कवि की है यह कविता’ या’ अमुक कवि की है और बेचारी कवयित्री टायं-टायं फिस्स। लेकिन मंचीय कवियों की मान्यता है कि हूटिंग सड़े अण्डों, टमाटरों और जूतों-चप्पलों से तो बेहतर है। 

 कई अनुभवी हूटर अपने साथ माइक भी लाते हैं। वास्तव में ये अधिकांशतया असफल स्थानीय कवि होते है। 

 ऐसे लोग मूंगफली कुतरते हुए घात में रहते हैं। ज्योंही कवि कविता ष्शुरू करता है, हूटर उसे किसी न किसी लोकगीत से जोड़कर और ज्यादा जोर से गाना ष्शुरू कर देते है। बस कवि की सिट्टी पिट्टी गुम ! 

 ज्यादा हूटर विश्वविद्यालयों में पाये जाते हैं। समानान्तर आयेजक हूटर्स को जानबूझकर कवि-सम्मेलन में भेजते हैं ताकि कुछ लोगों को उखाड़ सके। इसके विपरीत कई कवि अपने साथी चमचों को श्रोताओं में फैलाकर वाह ! वाह !! कराते हैं या ‘अमुक कविता सुनाओ’ का नारा लगवाते हैं।

कुल मिलाकर हूटिंग एक मान्यता-प्राप्त कार्यक्रम है, जो कवि सम्मेलनों में चलता रहता है।  

0 0 0