नवंबर की हल्की ठंड... और मीठी-सी धूप में... आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही थी। तभी अंदर से फोन की आवाज़ आई... ? "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..." "कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..." कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी। ? "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।
MTNL की घंटी - 1
नवंबर की हल्की ठंड...और मीठी-सी धूप में...आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही अंदर से फोन की आवाज़ आई... "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन...""कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..."कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी। "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।"हेलो..."एक अनजानी मर्दानी आवाज़ थी।"रोंग नंबर!" – कह कर वो फोन रख कर मुड़ने ही वाली थी,तभी फिर से घंटी बजी... "ट्रिन ट्रिन..."इस बार, महक के 'हेलो' कहने से पहले ही सामने से आवाज़ आई..."फोन मत रखिएगा... आपको कैसे पता कि रोंग नंबर है?"महक थोड़ा चौंकी।"आपकी आवाज़ किसी से मैच ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 2
14 नवंबर की सुबह थी।घर में रौनक थी... चहल-पहल थी... और एक खास चमक — जैसे सच में लक्ष्मी इस घर में पधार चुकी हों।महक आज कुछ अलग ही लग रही थी —लाल रंग की चूड़ियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, लाल साड़ी और पैरों में पायल की रुनझुन।वो घर की छोटी बहू होते हुए भी आज पूरे घर पर राज कर रही थी — हर एक जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही थी।खुद कम कर रही थी, लेकिन सबको लगन से काम में लगाए हुए थी।सास मंदिर गई थीं,पापा-बेटी दोनों पटाखे और मिठाई लेने बाजार जा चुके थे,और ताई जी — ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 3
अगले कुछ दिनों तक महक ने खुद को रोज़मर्रा के कामों में उलझाए रखा।पर जितनी कोशिश करती, उतनी ही अनजानी आवाज़ की परछाईं और गहरी होती जाती।रात को, जब पूरा घर नींद में डूब जाता, महक चुपचाप ड्रॉइंग रूम में आकर टेलीफोन को निहारने लगती…मानो कोई खामोश साया उसे पुकार रहा हो।अब उसे उस “रॉन्ग नंबर” वाले इंसान से एक अजीब-सी हमदर्दी होने लगी थी।उसके मन में कई सवाल बार-बार सिर उठाते—कौन है वो?देवी प्रसाद कौन है?क्या सचमुच कोई मुसीबत में है… या ये सब मेरे मन का वहम है?या फिर… ये सब सिर्फ इत्तेफाक नहीं, कोई इशारा है?इन ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 4
प्लीज़… बस आप एक काम कर दीजिए… कान्हा के कान पर रिसीवर रख दीजिए… आप सुन रहे हैं ना?”महक चीख पड़ी थी। उसकी आवाज़ में उतावलापन भी था और ममता भी।देव कुछ पल चुप रहा… फिर गहरी साँस लेकर बोला—“ठीक है… रखता हूँ।”बहुत मुश्किल से उसने रिसीवर उठाया और काँपते हाथों से कान्हा के कान के पास ले गया।दूसरे हाथ से उसने कान्हा को अपने सीने से कसकर लगाया हुआ था… जैसे टूटते हुए पल को थाम रहा हो।महक ने बिना एक पल गँवाए गाना शुरू कर दिया—“यशोमती मैया से बोले नंदलाला…राधा क्यों गोरी… मैं क्यों काला…”उसकी आवाज़ फोन ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 5
उस रात के बाद…उस रात के बाद पहली बार देव को चैन की नींद आई।कान्हा भी बिना किसी दौरे गहरी नींद में सोया रहा।देव हर थोड़ी देर में उठकर उसे देखता—कभी उसके माथे पर हाथ फेरता,कभी सीने पर हाथ रखकर उसकी साँसें महसूस करता…और फिर खुद ही तसल्ली लेकर वापस लेट जाता।जैसे उसे डर हो—कहीं ये सुकून… बस एक सपना न हो।दूसरी तरफ… महक की रात जागते हुए बीती।देव की टूटी हुई आवाज़…उसकी सिसकियाँ…कान्हा की मासूमियत…सब उसके भीतर कहीं गहरे उतर गया था।फोन पर हुई वो बातचीत—अब सिर्फ एक घटना नहीं रही थी…वो उसकी आत्मा के किसी कोने में ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 6
1 जनवरी 2002…सर्दी की वह सुबह…जब पूरा शहर नए साल की उमंग और खुशियों में डूबा था।घर का फोन बज रहा था।रिश्तेदार, दोस्त, जान-पहचान वाले… सभी अपनी शुभकामनाएँ भेज रहे थे।लेकिन महक…हर बार जब फोन की घंटी बजती… उसकी धड़कनें तेज़ हो जातीं।उसे सिर्फ एक ही नाम की उम्मीद होती…"देव…"हर बार जब फोन उठाती… और दूसरी तरफ से किसी और की आवाज़ सुनती…तो उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी उतर आती।सच तो यह था…इस नए साल में उसे सिर्फ एक ही तोहफा चाहिए था—देव की आवाज़।पिछले कुछ हफ्तों से उसके दिल में एक अजीब-सी खाली जगह बन ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 7
शाम के चार बज चुके थे...महक मुँह-हाथ धोकर आँगन में बैठी थी...धीरे-धीरे ढलती धूप की सुनहरी किरणें आँगन के कोने में सिमटने लगी थीं...महक की उंगलियाँ बार-बार उन्हीं किरणों को छूने की कोशिश कर रही थीं...जैसे कोई मासूम सा सपना हथेलियों में समेट लेना चाहती हो...तभी बाहर सड़क पर एक सफेद मारुति कार आकर रुकी...महक ने दरवाजे की ओट से झाँककर देखा...एक भारी-भरकम आदमी... हाथ में फाइलें थामे...सीधा दरवाजे की घंटी पर उँगली रख दी...महक का दिल जोर से धड़कने लगा..."क्या बड़े बाबू आ गए?" उसने खुद से सवाल किया...और जल्दी से दौड़कर अंदर चली गई...दरवाजा उसकी सास ने ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 8
ताया जी आ गए कप टूटने की आवाज सुन कर.."महक , चिंटू कही लगी तो नहीं""नहीं ताया जी ..ठीक "महक ने धीरे से कहा"अच्छा मैं भी चलता हूं अब देर हो रही है बस आपसे मिलने का मन था फाइल्स कल ड्राइवर ले जाएगा .अपना ध्यान रखिए"कह कर देव मुड़ने लगा तो ताया जी ने उसे कस कर गले लगा लिया।उसने हल्की नजर महक पर डाली ..उसके उड़े रंग को देखा और बिना एक क्षण रुके चला गया।महक…अब भी दरवाज़े के पास…जैसे जमीन में गड़ी खड़ी थी…चेहरा एकदम सफेद…हाथ काँप रहे थे…और दिल… जैसे किसी तूफ़ान में फँस गया ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 9
दस दिन की बेचैनी, दुआओं, और देखभाल के बाद…आज देव जी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल रही थी।महक के में एक अजीब-सी राहत थी — जैसे कोई अपना ठीक हो गया हो।पिछले कई दिनों से वह हर दिन सूप, दलिया या खिचड़ी बनाकर अस्पताल भिजवा रही थी।हर बर्तन में वो सिर्फ स्वाद नहीं, अपना मन, अपनी परवाह भी परोस देती थी।उसे खुद भी नहीं पता था ये सब क्यों कर रही है… बस अच्छा लगता था।देव जी के लिए कुछ करना, जैसे उसकी आत्मा को तसल्ली देता। ----------------उस रात नींद ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 10
कभी-कभी इंसान इतना भावुक हो जाता है कि जो भावना शब्दों में नहीं ढलती, वो आँखों के रास्ते बाहर जाती है..."ताया जी... थोड़ा पानी पी लीजिए," महक ने शून्य में ताकते हुए बैठे ताया जी से कहा।ताया जी ने चुपचाप गिलास उठाया और एक ही सांस में पानी गटक गए... मानो गले में कोई टीस अटक गई हो, जिसे निकाले बिना साँसे आगे बढ़ ही न पाएँगी।"ताया जी... फिर क्या हुआ? क्या सोनिया से शादी हो गई थी?"महक को थोड़ा बहुत पता तो था — देव ने कभी-कभी कुछ बातें इशारों में कही थीं — लेकिन आज वो सब ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 11
महक चुपचाप सब सुन रही थी...तभी ताया जी की आवाज़ टूटी — भारी, थकी हुई, जैसे वर्षों का बोझ ज़ुबान पर आ गया हो..."महक बेटा... ज़िंदगी में एक बहुत बड़ी गलती कर दी मैंने... बहुत बड़ी...""नहीं ताया जी, आप कोई गलती नहीं कर सकते," महक ने जल्दी से कहा, जैसे किसी टूटते हुए विश्वास को थाम लेना चाहती हो।ताया जी की आँखें कहीं दूर अतीत में जा टिकीं।"एक दिन मैंने सोनिया को मिलने बुलाया... बस उसे समझाने के लिए... लेकिन उसे मेरी दखलअंदाज़ी पसंद नहीं आई। बात बढ़ी... वो मुझ पर हाथ उठाने ही वाली थी, कि चिंटू ने ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 12
जब आँख खुली… तो अस्पताल का सफेद कमरा था…ताई जी और सास दोनों उसके पास बैठे थे।चेहरे पर चिंता थी… और कुछ उम्मीद भी।और तभी डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा —"बधाई हो… महक… तुम माँ बनने वाली हो!",सास खुशी खुशी बोली..."मंदिर की चौखट पर बैठी थी ना तुम ..तो खुद भगवान आने वाले है हमारे घर...कृष्ण भगवान आने वाले है"महक की आँखों से आँसू बह निकले…पर इस बार वो आँसू सिर्फ दुःख के नहीं थे…ये प्रार्थना मे किये गये प्रश्नो का उतर् था...…उतर था......" कान्हा" ---------------मार्च का आखिरी हफ्ता था...सर्दियाँ विदा ले ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 13
दो मिनट बाद बहुत संयमीत लहजे मे बोले देव "आलोक ने मुझें तुम्हारा लिखा पत्र दिया था..तुम्हे फोन करने हिम्मत जुटा रहा था की कान्हा की तबियत ज्यादा बिगड़ गयी और मुझें छोड़ कर चला गया...अब मेरी जिंदगी जीने का कोई मकसद नही था..पर तुम्हारे पत्र पर लिखी बात ने कुछ होने नही दिया मुझें ..तुम्हारी वजह से मेरे और मेरे कान्हा के चेहरे पर मुस्कुराहट आयी थी...इसलिए तुम्हे फोन किये बिना नही जा सकता था अपने बेटे के पास.. अब तो कोई जीने की वजह भी नही बची...थोड़े काम निपटाने थे...निपटा रहा हू..उसके बाद बेटे के पास जाऊंगा...मेरा ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 14
11 साल बाद ....सुबह के सात बज चुके थे।महक ने धीरे से करवट ली और बिस्तर से उठकर जैसे खिड़की खोली, एक ठंडी हवा का झोंका उसके गालों को चूम गया।धूप की एक मासूम सी किरण उसके चेहरे पर आकर ठहर गई —मानो कह रही हो, "मैं तुझसे प्यार करती हूँ..."महक ने अपनी दोनों हथेलियों से चेहरे को हल्के-हल्के रगड़ा, पर जिद्दी धूप वहीं बनी रही...शायद उसे सच में महक से प्यार हो गया था...प्यार होता भी क्यों न?36 की उम्र में भी महक किसी गुड़िया सी लगती थी —मासूम, सुंदर और हर जिम्मेदारी को मुस्कान से संभालने वाली।11 ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 15
आज दीवाली की रात थी…ना तो रंग-बिरंगी चूड़ियाँ थीं,ना साज-श्रृंगार, ना बिंदी, ना सिन्दूर…ना मांग में चमकता मंगलसूत्र।बस एक रंग की सादी सी साड़ी…और उस पर एक सफेद पड़ा चेहरा,जैसे सालों से धूप देखी ही न हो।महक ने गौरव की तस्वीर के सामने दीपक रखा और बुदबुदाई —"क्यों छोड़कर चले गए…?आज तो दीवाली है, कैसे रहूँगी आपके बिना?""7 साल हो गए…""आपने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में…बच्चों के बारे में…हमें तो जैसे बीच भँवर में छोड़ दिया आपने।"गौरव की तस्वीर पर सिर रखकर वो जोर-जोर से रोने लगी।उसकी चीखती सिसकियाँ सुनकर परी और माधव भागते हुए आए ...और पढ़े
MTNL की घंटी - 16
थोड़ी देर की खामोशी के बाद ताया जी बोले, “कल रविवार है…मैं टिकट बुक करवा देता हूँ---देहरादून की"महक ने गहरी साँस ली…शायद पहली बार वर्षों बाद उसने अपने दिल की दीवार को थोड़ा ढीला पड़ते महसूस किया।“अगर मैं चली गई… और यादें भी साथ आ गईं तो?” महक ने बहुत धीमे से कहा।“तो उन्हें भी हवा, बादल, पहाड़ दिखाओ…शायद वो भी हल्की हो जाएँ,” ताया जी मुस्कुराए।बेंच पर बैठी महक ने पहली बार आसमान की ओर देखा और उसे वो चमकती हुई सी लाइन नहीं, मुस्कुराता हुआ आसमान नजर आया । ...और पढ़े