कभी-कभी इंसान इतना भावुक हो जाता है कि जो भावना शब्दों में नहीं ढलती, वो आँखों के रास्ते बाहर निकल जाती है...
"ताया जी... थोड़ा पानी पी लीजिए," महक ने शून्य में ताकते हुए बैठे ताया जी से कहा।
ताया जी ने चुपचाप गिलास उठाया और एक ही सांस में पानी गटक गए... मानो गले में कोई टीस अटक गई हो, जिसे निकाले बिना साँसे आगे बढ़ ही न पाएँगी।
"ताया जी... फिर क्या हुआ? क्या सोनिया से शादी हो गई थी?"
महक को थोड़ा बहुत पता तो था — देव ने कभी-कभी कुछ बातें इशारों में कही थीं — लेकिन आज वो सब कुछ साफ-साफ सुनना चाहती थी... ताया जी की जुबानी।
ताया जी की आँखों में एक पुरानी परछाईं सी चमक उठी... और फिर शब्द बहने लगे — धीमे, टूटते हुए।
"हाँ बेटा... कभी-कभी एक गलत फैसला पूरी ज़िंदगी तबाह कर देता है। वही हुआ चिंटू के साथ।
विशाल ने अपने बिज़नेस और इज़्ज़त को बचाने के लिए, ज़बरदस्ती दोनों की शादी करवा दी।
ना सोनिया खुश थी... ना देव।
सोनिया को देव जैसा सीधा-सादा इंसान कभी नहीं भाया, और देव के लिए सोनिया एक तेज़, खुदगर्ज़ और मतलबी पत्नी बन गई।
लेकिन चिंटू... उसने नियति को चुपचाप स्वीकार कर लिया। वो सोनिया को सम्मान देना चाहता था, एक अच्छा पति बनना चाहता था।
पर सोनिया ने कभी उसकी कोशिशों की कद्र नहीं की... वो उसे हर पल नीचा दिखाने के मौके ढूंढ़ती रहती।
दिन बीतते गए...
चिंटू हर रोज़ एक नई उम्मीद के साथ जीता... और एक दिन वो दौड़ता हुआ ऑफिस आया — खुशी में झूमता हुआ मेरे गले लग गया।
वो बाप बनने वाला था।
उसकी आँखों में चमक थी, होंठों पर मुस्कान। शायद पहली बार वो इतना खुश था।
लेकिन सोनिया... वो माँ नहीं बनना चाहती थी।
उसे अभी घूमना था, आज़ाद रहना था... कोई बंधन नहीं चाहिए था उसे।
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एक हफ्ते बाद चिंटू ने मुझें फोन करके लीला हॉस्पिटल पहुँचने को कहा... सामने सोनिया हॉस्पिटल के कपडे पहने खड़ी थी...विशाल भी वही आ गया उसी समय
दोनो मे किसी बात को लेकर बहस हों रही थी
अचानक ...
चिंटू, मेरे और विशाल के सामने — सोनिया के पैरों में गिर गया।
गिड़गिड़ाया... बोला, "मुझे सिर्फ बच्चा चाहिए... ना पैसा, ना नाम, ना घर... सिर्फ बच्चा रहने दो..."
हमने भी सोनिया को बहुत समझाया।
यहाँ तक कि विशाल — जो अपनी भावनाओं को कभी ज़ाहिर नहीं करता था — वो भी टूट गया।
अपनी बेटी को रोकने के लिए, उसने उसी समय अपनी सारी संपत्ति, सारा बिज़नेस होने वाले नाती या नातिन के नाम कर दिया... और चिंटू को उसका केयरटेकर बना दिया।
सोनिया गुस्से से तिलमिला गई... वहां से जाते-जाते धमकी दे गई कि अब वो सबक सिखाएगी।
पर हमें यकीन था — जो औरत पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है, वो बच्चा ज़रूर पैदा करेगी।
विशाल शर्मिंदा था... अपनी ही बेटी की सोच से डर गया था वो। माँ भी बनना नही चाहती थी।
वो माफी मांगने लगा... और चिंटू सिर्फ इतना बोल पाया —
"मुझे अकेला छोड़ दो..."
...कहते हुए वो ज़मीन पर धड़ाम से बैठ गया।
मैं उस बच्चे ( देव) के दुःख की कल्पना भी नही कर पा रहा था उस समय उसकी हालत देखी नही जा रही थी जिस ने बचपन मे ही माँ बाप को खो दिया...फिर अपनी महोब्बत और आज उसे अपने बच्चे को बचाने के लिये गिरगिड़ाना पड़ा था... पैरों में गिरना पड़ा था,वो भी अपनी ही पत्नी के..
पर एक उम्मीद थी... कि विशाल के इस फैसले से, सोनिया कम से कम बच्चे को जन्म तो देगी।
पर मुझे क्या पता था...
कि एक और बड़ा तूफ़ान चिंटू की ज़िंदगी की ओर बढ़ रहा है...
आख़िरकार वो दिन आ ही गया...
जिस दिन का चिंटू को बरसों से इंतज़ार था...
जिसके लिए उसने हर अपमान, हर तिरस्कार, हर अकेलापन सह लिया था…
उसका अंश… उसकी औलाद… उसका ‘कान्हा’…
दुनिया में आ चुका था।
डॉक्टर ने बाहर आकर बताया —
"बधाई हो... बेटा हुआ है..."
चिंटू की आँखों में आंसू भर आए...
उसका चेहरा किसी बच्चे जैसा हो गया था, मासूम और डर से भरा हुआ।
उसने नाम भी सोच रखा था — ‘कान्हा’।
बस जैसे अब उसकी अधूरी ज़िंदगी पूरी हो गई थी।
लेकिन...
खुशियाँ जैसे उसके हाथ में आते ही रेत की तरह फिसल गईं।
डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा —
"बच्चा क्लोनिक सीज़र से ग्रसित है... दौरे पड़ते हैं। इसका कारण प्रेगनेंसी के शुरुआती महीनों में हुई दवाइयों की गड़बड़ी है..."
चिंटू सब समझ गया...
सोनिया ने जो गोलियाँ खाई थीं —
बच्चे को न मार सकीं, लेकिन उसे बीमारी दे गईं।
चिंटू ने कुछ नहीं कहा...
वो सीधा वार्ड में गया... उस नन्हे से शरीर को गोद में उठाया...
कान्हा उसके सीने से लगा... और वो आँसू बहाता रहा...
उसी पल, वो वहां से बिना किसी से कुछ कहे निकल गया।
अब उसके लिए कान्हा ही पूरी दुनिया था।
उसने सभी रिश्तों से रिश्ता तोड़ लिया...
विशाल से, सोनिया से, सब से।
बस एक छोटी सी दुनिया रह गई —
घर और पोस्ट ऑफिस...
कभी-कभी ताया जी से पोस्ट ऑफिस में दो शब्द बोल लेता,
वरना सारा दिन अपनी कुर्सी पर बैठा छत को घूरता रहता...
उसकी आँखों में कोई जीवन नहीं था,
बस एक गहराई थी — और उसमें दबा एक नासूर।
महक चुपचाप सब सुन रही थी...
तभी ताया जी की आवाज़ टूटी — भारी, थकी हुई...
"महक बेटा... ज़िंदगी में एक बहुत बड़ी गलती कर दी मैंने... बहुत बड़ी..."
फिर वो चुप हो गए...
जैसे उस गलती का बोझ आज भी उनकी आत्मा पर पत्थर की तरह रखा हो...
जैसे अब तक वो माफ़ी नहीं पा सके हों — खुद से भी, भगवान से भी।
ताया जी समझदार इंसान थे उनसे कोई भी गलती कैसे हों सकती है?
ऐसी क्या गलती कर दी होगी ताया जी ने जिसका दुःख आज तक उन्हे है
महक के मन मे प्रश्नों का तूफान सा आ गया।
क्या महक इन प्रश्नों से निकल पाएगी?
या उसे उतर मिल जाएगा?
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