MTNL की घंटी - 11 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 11

महक चुपचाप सब सुन रही थी...

तभी ताया जी की आवाज़ टूटी — भारी, थकी हुई, जैसे वर्षों का बोझ अचानक ज़ुबान पर आ गया हो...

"महक बेटा... ज़िंदगी में एक बहुत बड़ी गलती कर दी मैंने... बहुत बड़ी..."

"नहीं ताया जी, आप कोई गलती नहीं कर सकते," महक ने जल्दी से कहा, जैसे किसी टूटते हुए विश्वास को थाम लेना चाहती हो।

ताया जी की आँखें कहीं दूर अतीत में जा टिकीं।

"एक दिन मैंने सोनिया को मिलने बुलाया... बस उसे समझाने के लिए... लेकिन उसे मेरी दखलअंदाज़ी पसंद नहीं आई। बात बढ़ी... वो मुझ पर हाथ उठाने ही वाली थी, कि चिंटू ने उसका हाथ पकड़ लिया। और फिर उसे वहाँ से जाने के लिए कह दिया..."

"चिंटू बहुत गुस्से में आ गया... मुझसे कहने लगा, 'क्या जरूरत थी यह सब करने की?'
मैंने कहा — 'चिंता होती है तुम्हारी चिंटू, इसलिए बुलाया था उसे।'

पर वो तो जैसे बरस पड़ा...
'इतनी ही चिंता थी तो तब करते जब मेरे माँ-बाप मुझे छोड़कर चले गए थे। आपको विशाल अंकल का स्वभाव पता था, फिर भी आपने कुछ नहीं किया। आप चाहते तो मुझे अपने साथ रख सकते थे... पर नहीं... उस वक़्त नहीं की आपने कोई चिंता। तो अब क्यों कर रहे हो?'

और फिर उसने जो कहा... वो शब्द आज भी मेरे सीने में गूंजते हैं...

'जब मेरे माँ-बाप ने मेरी चिंता नहीं की, तो आप क्यों कर रहे हैं?
छोड़ दीजिए मुझे मेरे हाल पर...
और हाँ, आज से चिंटू मर गया... आपके लिए भी, इस दुनिया के लिए भी...
अब सिर्फ 'देव' हूं मैं... या फिर 'बड़ा बाबू'...'

कहते-कहते ताया जी की आवाज़ कांपने लगी... और फिर वो फफक पड़े।

महक स्तब्ध थी... ताया जी उसके ससुर थे, पर वो उन्हें पिता-समान मानती थी। उनका रोना उससे देखा न गया।

"चलिए ताया जी... नीचे चलिए। ठंड भी बढ़ती जा रही है," महक ने धीरे से कहा, उनके कांपते कंधों पर हाथ रखते हुए।

लेकिन ताया जी जैसे उस पल में कहीं और ही थे...

"अगर तेरी ताई जी के आगे मजबूर न होता, तो उसे अपने पास ले आता...
मुझे लगा विशाल का बिज़नेस अच्छा चल रहा है, पैसे की तंगी नहीं होगी...
चिंटू को सब मिलेगा...
पर नहीं जानता था कि मेरी सोच ही मेरा सबसे बड़ा गुनाह बन जाएगी..."

बोलते-बोलते ताया जी रोते रहे।
जैसे कोई बरसों से भरी हुई नदी हो, जिसका बाँध आज टूट गया हो।
बहुत मजबूत थे ताया जी...
पर आज... एक छोटे से बच्चे की तरह टूटकर रो रहे थे।

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महक का मन इन दिनों बड़ा बेचैन था। देव से मिलने की चाह दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी... अब सिर्फ देव ही नहीं, बल्कि चिंटू से भी मिलने की लालसा उसे अंदर ही अंदर घुलाए जा रही थी। पर वो मिलती भी कैसे? न कोई फोन नंबर, न घर का पता। हर रास्ता बंद लगता था।

ताया जी और ताई जी इन दिनों वैष्णो देवी की यात्रा पर गए हुए थे। घर में सन्नाटा था और मन में तूफान।
महक ने  हिम्मत जुटाई और देव के  पोस्ट ऑफिस जा पहुंची—जहां कभी वो अपने फर्ज को पूरी ईमानदारी से निभाया करते थे।

लेकिन वहां पहुंचकर जो खबर मिली, उसने महक के पैरों तले ज़मीन खींच दी।

“देव जी ने कुछ दिनो पहले ही समय से पहले रिटायरमेंट ले ली है।”
किसी ने बताया।

महक ने वहीं के कर्मचारियों से बहुत विनती की, हाथ जोड़कर कहा,
“कृपया मुझे उनका MTNL लैंडलाइन नंबर या पता दे दीजिए... बस एक बार मिलना है...”

पर सबने विनम्रता से मना कर दिया—“यह नियमों के विरुद्ध है।”
न कोई जानकारी, न कोई उम्मीद।

निराश महक ने अपनी पर्स से एक चिट्ठी निकाली… अपने हाथों से लिखी थी… दिल के बहुत पास से लिखी थी…

वह चाहती थी कि कोई तो उसे देव तक पहुँचा दे।

पर किसी ने भी वह चिट्ठी हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

महक की आँखें भर आईं… आवाज़ रुंध गई… मन की सारी हिम्मत जैसे दरकने लगी।
वो चुपचाप मुड़ी और भारी कदमों से बाहर निकलने लगी…

तभी उसके पीछे से एक आवाज़ आई —
“सुनिए... एक मिनट रुकिए... क्या आपने देव को पत्र देना है?”

महक पलटी नहीं, बस ठिठक गई। आँखें अभी भी नम थीं।

“जी…” बस इतना ही कह सकी। सामने खड़े इंसान का चेहरा तक साफ़ नहीं देख पाई।

“लाइये, मुझे दे दीजिए। मैं देव के घर जा रहा हूँ। दे दूँगा उन्हें।”
उसने कहा।

महक ने बिना कुछ पूछे, बिना कोई नाम जाने, चुपचाप लिफाफा उसकी ओर बढ़ा दिया… और तेज़ कदमों से वहाँ से चली गई।

वो आदमी—जो देव का बचपन का दोस्त आलोक था—उसे जाते हुए देखता रहा। बहुत देर तक, बहुत कुछ सोचता रहा...

महक को अब इस बात से फर्क नहीं पड़ रहा था कि चिट्ठी कौन ले जा रहा है। बस एक उम्मीद थी… एक अंतिम आस थी… कि वह चिट्ठी देव तक पहुँच जाए।

और उस चिट्ठी में बस एक ही पंक्ति थी —

"देव जी... आप एक आखिरी फोन कर लेना मुझे..."

क्या वो फोन आएगा?
या वो चिट्ठी भी भीग जाएगी उस इंतज़ार की बारिश में?

यह सवाल महक के साथ-साथ शायद हर उस दिल का है जिसने कभी किसी अपने से सिर्फ एक आखिरी बात कहना चाही हो...खास करके MTNL लैंडलाइन के जमाने मे
                   
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सर्दी की वो सुबह कुछ अलग थी।
ताया जी और ताई जी वैष्णो देवी की यात्रा से लौटे दो दिन हो चुके थे।
थकावट अब भी उनके चेहरे पर थी, पर घर का माहौल शांत था।
महक रसोई में बैठी थी — सर्दी के इस आखिरी मौसम का गाजर का हलवा बना रही थी, पूरे घर के लिए।

तभी, जैसे किसी तूफान ने दरवाजे को खटखटाया हो —
ताया जी अचानक सीढ़ियों से तेज़ी से नीचे उतरे।

"महक बेटा... जल्दी से स्कूटर बाहर निकाल दे... मेरे हाथ-पांव काँप रहे हैं..."
उनकी आवाज़ कांप रही थी, चेहरा भय से भरा हुआ।

महक ने घबरा कर चाभियाँ पकड़ी और पूछा,
"क्या हुआ ताया जी? इतने घबराए हुए क्यों हैं? कहाँ जाना है आपको?"

ताया जी ने बमुश्किल कहा,
"चिंटू के घर... कान्हा मर गया..."
आवाज़ में एक गहरा दर्द और डर था।

महक के हाथ से चाभियाँ लगभग गिर गईं।
"क्या...? क्या हुआ कान्हा को?" उसकी आवाज़ भी टूटने लगी।

"दस दिन तक जब चिंटू अस्पताल में भर्ती था... पीछे से कान्हा कुछ नहीं खाता था..."
ताया जी की आँखें नम हो उठीं।
"बस दरवाज़े की ओर देखता रहता... जैसे पापा की राह देख रहा हो... या  फोन कि ओर देखता रहता जैसे किसी के फोन की  इंतजार कर रहा हों......."

इतना कहकर ताया जी तेज़ी से बाहर चले गए।

महक वहीं रसोई के दरवाज़े पर खड़ी रह गई।
जैसे किसी ने उसकी साँस रोक दी हो।

वो कुछ समझ नहीं पा रही थी...
आँखों से आँसू चुपचाप गिरने लगे… और कदम खुद-ब-खुद उसे मंदिर की ओर ले गए।

मंदिर की चौखट पर बैठी महक की आँखें बंद थीं और दिल भारी...

"हे भगवान..."
उसने फूट-फूट कर मन ही मन प्रार्थना की।
"इतना भी निर्दयी मत बनो... देव जी को इतनी सजा मत दो..."

उसकी आँखों में उनके जीवन की तस्वीरें तैरने लगीं —
माँ-बाप का जाना...
प्यार का खोना...
पत्नी का तिरस्कार…
फिर कान्हा… उस मासूम बेटे का मिलना… पर बीमारी के साथ…

"फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की…
तूने दिया जो भी… चुपचाप स्वीकार किया।
यहाँ तक कि बेटे का नाम भी 'कान्हा' रखा… तेरे नाम पर…
और अब तूने उसे भी छीन लिया…"

महक का गला भर आया —
"हे भगवान… उनको थोड़ा तो सुकून दे…
थोडा तो रहम कर उस पर.…..
उनका बेटा ..उनके जीने की वजह तो मत छीनता उनसे......
क्या उन्होंने हर रिश्ता, हर प्यार, हर उम्मीद खो देने का अपराध किया है?"
रोते रोते घबराहट सी होने लगी तो ऑंखे मुंद ली पर उसके दिल में एक सवाल उमड़ने लगा —
"क्यों इतना जुड़ाव है मुझे उनसे?"
"क्यों उनका दर्द मेरा हो जाता है?"
"क्यों बस एक बार उनसे बात करने की इच्छा अंदर तक जलाती है?"

वो सोचती रही… खुद से उलझती रही…
और तभी —

"महक! हलवा जल गया पूरा… और तू यहाँ बैठी है मंदिर की चौखट पर!"
सास की आवाज़ कड़कती हुई आई।

महक जैसे नींद से जागी… पर उठते ही उसका सिर घूम गया और वो बेहोश होकर वहीं गिर पड़ी।

...to be continued 
MTNL की घंटी