1 जनवरी 2002…
सर्दी की वह सुबह…
जब पूरा शहर नए साल की उमंग और खुशियों में डूबा था।
घर का फोन बार-बार बज रहा था।
रिश्तेदार, दोस्त, जान-पहचान वाले… सभी अपनी शुभकामनाएँ भेज रहे थे।
लेकिन महक…
हर बार जब फोन की घंटी बजती… उसकी धड़कनें तेज़ हो जातीं।
उसे सिर्फ एक ही नाम की उम्मीद होती…
"देव…"
हर बार जब फोन उठाती… और दूसरी तरफ से किसी और की आवाज़ सुनती…
तो उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी उतर आती।
सच तो यह था…
इस नए साल में उसे सिर्फ एक ही तोहफा चाहिए था—
देव की आवाज़।
पिछले कुछ हफ्तों से उसके दिल में एक अजीब-सी खाली जगह बन गई थी।
सब कुछ था उसके पास—सुखी गृहस्थी, एक प्यारी सी बेटी, और पति…
लेकिन फिर भी…
एक अधूरापन…
जो दिन-रात उसे भीतर ही भीतर खा रहा था।
जो फोन कभी उसे परेशान करता था…
अब वही उसकी उम्मीद का सहारा बन गया था।
अब तो घंटी बजते ही वह खुद दौड़कर फोन उठाने लगी थी।
लेकिन… देव का फोन अब तक नहीं आया था।
महक का मन हर वक्त सवालों के जाल में उलझा रहता—
"क्या देव ने खाना खाया होगा?"
"क्या वो ऑफिस गए होंगे?"
"सोनिया और देव के रिश्ते कैसे होंगे?"
यह सोचते ही वह खुद को झिड़क देती—
"बस महक… बहुत हो गया।
इन सवालों से बाहर निकल… वरना खुद को खो देगी।"
उसने खुद से फैसला किया—
"इसका एक ही इलाज है… कुछ दिन इस MTNL फोन से दूर रहना।"
शाम को हिम्मत जुटाकर उसने गौरव से कहा—
"गौरव… मैं कुछ दिन परी के साथ मायके चली जाऊँ?
दस जनवरी से स्कूल खुल रहे हैं… चार-पाँच दिन में लौट आऊँगी।"
गौरव हमेशा की तरह शरारती मुस्कान के साथ बोला—
"ठीक है… छोड़ दूँगा तुम्हें।
लेकिन… जाने की इजाज़त का टैक्स लगेगा…रात को"
महक मुस्कुराकर शर्मा गई—
"आप भी ना…"
पूरा दिन पैकिंग में बीत गया…
कपड़े… परी की किताबें… जरूरी सामान…
लेकिन हर थोड़ी देर में उसकी नजर फोन पर टिक जाती—
"शायद… अभी… इसी वक्त… देव का फोन आ जाए…"
पर नहीं…
शाम ढल गई… रात उतर आई…
रात को…
थकावट आँखों में थी…
लेकिन नींद उससे कोसों दूर।
गौरव गहरी नींद में थे…
महक ने करवट बदली… आँखें बंद कीं…
लेकिन मन…
फिर उसी ओर भटक गया—
"देव… और सोनिया…"
"क्या अब उनका रिश्ता बदल गया होगा?"
"क्या सोनिया देव को समझ पाती होगी?"
उसका मन फिर उसी उलझन, उसी दर्द और उसी अधूरी चाहत में फँसता चला गया।
रात के दो बज चुके थे…
अचानक उसे अपनी गर्दन पर गर्म साँसों का अहसास हुआ…
गौरव उसके करीब थे…
उस पल में वह खुद को रोक नहीं पाई…
गहरी नींद में भी देव के ख्याल उस पर भारी थे
उसने खुद को देव के एहसास में बहने दिया…
और तभी…
"बहुत प्यारी हो… बहुत अच्छी हो तुम, महक… आई लव यू…"
गौरव उसके कान में फुसफुसाया।
महक के होंठ अनजाने में बुदबुदा उठे—
"आई लव यू… देव…"
अगले ही पल…
जैसे वह किसी गहरे गड्ढे से बाहर आ गिरी हो।
सांसें तेज़… माथा पसीने से भीगा हुआ…
ठंड में भी वह पसीने से तर-बतर थी।
वह बिना कुछ सोचे बाथरूम की ओर भागी…
ठंडे पानी की बूँदें उसके शरीर से टकराने लगीं…
लेकिन उसे ठंड का अहसास नहीं था।
बस एक ही सवाल—
"क्यों… देव मेरी सोच में इतना गहराई तक उतर गया है?"
"क्यों उसने अपने शरीर पर देव का स्पर्श महसूस किया "
वह खुद को रगड़-रगड़ कर धोने लगी…
जैसे उन एहसासों को अपने अस्तित्व से मिटाना चाहती हो।
"महक… इतनी सर्दी में क्या कर रही हो? पागल हो गई हो क्या?"
गौरव की चिंतित आवाज़ दरवाजे के बाहर से आई।
महक ने दरवाज़ा खोला…
और सीधे उनके सीने से लग गई।
गौरव ने उसे बाँहों में भर लिया—
"बस पगली… इतना प्यार है तो मायके जाने की ज़िद क्यों?"
महक ने आँखें बंद कर लीं…
उस पल उसने खुद से एक वादा किया—
"अब और नहीं… अब इस नाम को अपने ज़ेहन से निकालना ही होगा…"
कुछ दिन बाद… मायके से लौटने पर
महक तय तारीख से पहले ही वापस आ गई।
दरवाज़े पर सास ने हैरानी से पूछा—
"अरे… इतनी जल्दी?"
महक मुस्कुराई—
"परी का मन नहीं लग रहा था…"
घर का माहौल कुछ अलग था…
ताया जी उत्साहित थे—
"आज मेरे ऑफिस के बड़े बाबू घर आ रहे हैं…"
महक ने हँसते हुए कहा—
"तो आज उनकी ऐसी खातिरदारी करूँगी कि प्रमोशन पक्का!"
ताया जी हँस पड़े—
"ऐसे प्रमोशन नहीं मिलते, बहू…
लेकिन… उनका और मेरा एक पुराना रिश्ता है…"
महक किचन की ओर बढ़ गई…
पकोड़े… गाजर का हलवा…
लेकिन दिल में एक अजीब-सी हलचल थी—
"कौन हैं ये बड़े बाबू…?"
क्या महक सच में देव के ख्यालों से बाहर निकल पाएगी?
या किस्मत उसे फिर उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगी…?
और ये "बड़े बाबू"…
क्या सिर्फ मेहमान हैं…
या कोई अधूरी कहानी वापस लौट रही है…?
To be continued…