MTNL की घंटी - 24 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 24

सारे दृश्य महक के ज़ेहन में तैरने लगे —
गौरव  का चुप-चाप खिंचा-खिंचा रहना, हर बार पैसों की बात से किनारा करना, बच्चों की मासूमियत को नज़रअंदाज़ करना,
और फिर एक दिन...
बस यूँ ही...
बिना कुछ कहे...
चला जाना।

महक की आँखों में सन्नाटा था, और दिल में अधूरा सवाल।

तभी ताया जी की भारी आवाज़ गूंज उठी —

"बेटा... हमारी तो कोई औलाद नहीं थी...
तुम दोनों ही तो थे, हमारी पूरी दुनिया।
तुम्हें क्या लगा... हम नहीं टूटे उस दिन?
जब गौरव  गया... जब सब छिन गया..."

उनकी आँखें भर आईं।

"हमने खुद को समेटा, सिर्फ तुम्हारे लिए... और दोनो बच्चों के लिए।
ना पैसा रहा, ना साथ... और रिश्तेदार?
वो तो पहले ही कंधा छुड़ा चुके थे।

हमने वो घर भी बेच दिया...
जिसे सालों तक संजोया था,
ताकि गौरव  के लोन की किश्तें भर सकें...
सड़क पर आ गए थे, महक... सचमुच सड़क पर!"

अब ताया जी की आवाज़ कांपने लगी थी।
उनका सब्र, जो अब तक एक दीवार की तरह खड़ा था —
टूटने को था।

वो फूट-फूट कर रोना चाहते थे...
पर रुके रहे...
क्योंकि देव के बारे में अभी बहुत कुछ बताना बाकी था।
महक के लिए जैसे ऑक्सीजन ही खत्म हो गई थी।
सांसें अटक गई थीं।
गला सूख गया... दिल की धड़कन जैसे रुक-रुककर चल रही हो।

".क्या  यह वही गौरव  था..."
जिसे उसने अपना जीवनसाथी माना था...
जिसका हर सुख-दुख बांटने की कसम खाई थी।

"मैं तो उसकी अर्धांगिनी थी..."
तो क्या इतना भी हक नहीं था,
कि एक बार बात कर लेता मुझसे...
एक बार पूछ लेता...
मरने से पहले सोच तो लेता...
क्या मैं इतनी परायी थी?
क्या नही किया था उसके लिए..बिजनेस शुरु करने के नाम पर सारे गहने दे दिये...कभी शिकायत नही की...हर कदम साथ देना चाहती थी ,पर उसने तो....

महक की आंखों से बहते आँसू थम नहीं रहे थे।

थोड़ी हिम्मत जुटा कर वह बोली—
"अगर रिटायरमेंट के पैसे भी नहीं थे,
अगर घर बेचकर लोन चुकाया...
तो रोहिणी का फ्लैट कैसे खरीदा गया?"

देव  ताया जी के कुछ कहने से पहले  ही बीच में ही बोल पड़ा—
"बस अंकल, अब आप रूम में चलिए... ठंड बढ़ रही है।"

लेकिन ताया जी ने देव की बात काट दी—
"नहीं बेटा, आज नहीं।
आज महक को सब पता चलना चाहिए।
वरना ये सच कभी सामने नहीं आएगा।"

(रूक कर गहरी सांस लेते हुए)
"महक..."
"रोहिणी का फ्लैट... वो देव ने खरीदा था।
तुम्हारी नौकरी के लिए भी देव ने ही ऊपर बात पहुंचाई थी।
और परी की स्कूल फीस...?
जब पांच महीने तक फीस नहीं गई तो स्कूल से निकालने का नोटिस आ गया था..."

देव ने फिर टोक दिया,
"बस अंकल... बहुत हो गया।
अब आप अंदर चलिए..."

लेकिन अब महक की दुनिया जैसे उलट चुकी थी।
वो लड़खड़ाते कदमों से ताया जी के पैरों में बैठ गई।

"आपने मेरे और मेरे बच्चों के लिए जो किया...
उसका कर्ज़ मैं जीवन भर नहीं चुका सकती।
अब आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी...आप जिससे चाहेंगे उसी से शादी कर लूंगी. अब और बोझ नही बनुगी आप पर"

ताया जी ने कांपती हुई आवाज़ में कहा—
"बेटा, मैं तुम्हारी दूसरी शादी की बात इसलिए कर रहा था...
ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए।
मैं दिल का मरीज हूँ...
ताई जी तो सालों से बच्चा होने की दवाइयां खाकर खुद को खोखला कर चुकी है।
किसी भी वक़्त हमें भगवान के घर जाना पड़ सकता है।
उसके बाद...?
परी का डॉक्टर बनने का सपना?
माधव अभी बहुत छोटा है...
उसका क्या होगा?"

महक उठी।
धीरे-धीरे वह देव की ओर बढ़ी।
आंखों में ग़ुस्सा नहीं था,
बस टूटन थी... एक घना खालीपन।

"मेरे शादी के तेरह साल...
फिर भी मेरे पति ने मुझ पर विश्वास नहीं किया..."
"मैं पत्नी कहलाने लायक नहीं थी शायद..."

"अगर जाना ही था...
तो मुझे और बच्चों को भी जहर दे जाता।"

"मैंने क्या नहीं किया गौरव  के लिए?"
"उसकी हर इच्छा, उसका मान-सम्मान, उसके परिवार की इज़्ज़त..."
"और बदले में क्या मिला?"

"उसकी मौत — और मेरी ज़िंदगी की सज़ा..."

महक बुरी तरह टूट चुकी थी।
वो खुद से ही कुछ बुदबुदा रही थी, होंठ काँप रहे थे, आंखें शून्य में टिक गई थीं।

अचानक उसने देव के कदमों में झुक कर उसके पैर पकड़ लिए।

"देव जी... आपका इतना बड़ा एहसान... मैं कैसे चुकाऊंगी?"
"मुझसे शादी कर लीजिए... अभी... इसी वक्त..."

वो रोते-रोते बोलती चली गई —
"मैं जैसी आप चाहें, वैसी रहूँगी... आपकी गुलाम बनकर..."
"आपका भी कर्ज चुका दूंगी... और अभी चुका दूंगी..."

इतना कहकर उसने अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया...

देव के चेहरे पर गुस्से और दर्द का सैलाब एक साथ दौड़ पड़ा।
वो चीख उठा —
"आलोक! अंकल-आंटी को रूम में ले जाओ... बस बहुत हो गया!"
"महक की हालत देखो... क्या बना लिया है खुद को..."

देव ने झुककर खुद ही महक का पल्लू ठीक किया।
फिर उसे बाँहों से थामकर डाइनिंग रूम से बाहर की ओर खींचते हुए ले गया।
महक अब भी सुबक रही थी...
पर उसने कोई विरोध नहीं किया।

ताया जी कांपते हाथों से आलोक का कंधा पकड़ते हुए बोले—
"बेटा... मेरी ज़िंदगी में वक़्त अब बहुत कम है...
देव से कहो... मेरी महक को मेरे जीते-जी संभाल ले..."
"कम से कम मेरी आत्मा को सुकून मिलेगा..."

आलोक ने ताया जी के हाथ अपने हाथों में थाम लिए —
"अंकल, चिंता मत कीजिए।
देव बहुत समझदार है... वो सब संभाल लेगा।
महक और देव, दोनों ही टूटे हुए हैं... पर एक-दूसरे को थाम लेंगे।
मैंने  और सुधा... हम दोनों ने ही आपको ये सुझाव दिया था।
ये वक़्त आना ही था..."

कैसे संभालेगा देव महक को?
MTNL की घंटी

...to be continued