रात का समय था। हवाओं में हल्की ठंडक घुली थी और डाइनिंग हॉल में गर्माहट थी — प्यार, रिश्तों और स्वाद से भरी।
टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन सजे थे — शाही पनीर, तंदूरी रोटी, पुलाव, गुलाब जामुन… चाऊमीन, पिज़्ज़ा और भी न जाने क्या-क्या।
परी और माधव फूले नहीं समा रहे थे।
"मम्मी! आज तो होटल वाला खाना है!" परी चहक कर बोली।
"मैं तो सबकुछ खाऊँगा!" माधव ने प्लेट उठा ली और सबको हँसा दिया।
सिर्फ एक चेहरा था जो अब तक नहीं दिखा — देव।
"अभी तक नहीं आया?" आलोक ने घड़ी की ओर देखा।
"आ जाएंगे, शायद किसी लेखक को छोड़ने गए हों," सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा।
कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला।
देव अंदर आए।
थोड़ा थके हुए, लेकिन बच्चों की मुस्कुराहट देख कर चेहरे पर ताजगी सी आ गई।
"आ गए अंकल!" माधव खुशी से चिल्लाया और दौड़ कर देव से लिपट गया।
"आपको भूख लगी है ना? चलिए, मेरे पास बैठिए।"
परी ने भी माधव का साथ दिया और अपने हीरो जैसे अंकल को अपने और माधव के बीच मे बैठा दिया।
खाना शुरू हुआ, और उसके साथ ही शुरू हुई ढेर सारी बातें।
लेखन, बचपन की शरारतें, स्कूल के किस्से, और परी के फ्यूचर प्लान्स...
और तभी… जैसे किसी ने सन्नाटे पर पत्थर मार दिया हो।
ताया जी ने पानी का घूंट लिया, गला साफ किया और गंभीर लहजे में बोले:
"अब जब सब कुछ ठीक हो गया है… बच्चों को भी देव बहुत पसंद हैं… तो क्यों न देव और महक की शादी कर दी जाए?"
सारा माहौल एकदम ठहर गया।
देव के हाथ से चम्मच गिरते-गिरते बचा। वह सकपका गया।
"मैं... वो... ताया जी... मतलब... मुझे तो पता भी नहीं था..."
महक ने धीरे से प्लेट रख दी। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था।
"आपको क्या लगता है ताया जी, इस तरह के फैसले ऐसे डाइनिंग टेबल पर लिए जाते हैं?"
उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन शब्दों में तल्ख़ी थी।
"महक बेटा, मेरा मतलब..."
"आपका मतलब मैं समझ गई," उसने बीच में ही बात काट दी।
"आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया?"
" आप तो ऐसा नही सोच सकते..जरूर किसी ने कुछ कहा है आपको" महक ने टेड़ी आंखें करके देव की ओर देखा ।
देव का रंग खुद हलका पड़ा हुआ था।
" नही...देव को इसके बारे मे कुछ नही पता ...यह मेरे मन का विचार है" ताया जी ने एकटुक उत्तर दिया।
महक अब खुलकर नाराज़ थी।
"अगर मैं और मेरे बच्चे आप लोगों पर बोझ हैं, तो साफ कह दीजिए... हम अभी चले जाएंगे।"
"महक, तुम ज़रा ज्यादा बोल रही हो... थोड़ा शांति से बात करो," ताई जी ने बीच-बचाव किया। "और बच्चों को बीच में मत लाओ।"
लेकिन महक का गुस्सा थमने वाला नहीं था। जैसे उसकी सहनशक्ति की सीमा टूट गई हो।
"आप भी ताई जी? आप भी इन सबके साथ मिल गईं?
आप तो मेरी अपनी थीं... कम से कम आप तो समझतीं कि मैं गौरव को कैसे भूल सकती हूं।
क्या इतना आसान है किसी की जगह किसी और को दे देना?"
अब ताया जी भी नाराज़ हो उठे।
"महक, गौरव की बात अभी मत छेड़ो। उसने जो किया…"
". तो ऐसा क्या किया देव जी ने?" महक की आवाज़ अब तेज़ हो चुकी थी।
"जिसकी वजह से आप अचानक बिना सोचे-समझे मेरी शादी की बात करने लगे?"
हमेशा शांत रहने वाली महक आज ताया जी की आंखों में आंखें डालकर बात कर रही थी।
देव का नाम सुनते ही माधव डर कर देव की गोद में आ गया।
देव ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
माधव को कुछ समझ नही आ रहा था की मम्मी गुस्सा क्यो कर रही है पर परी 10th क्लास मे पड़ती थी उसे कुछ कुछ समझ आ रहा था की ताया जी देव अंकल को हमारे पापा बनाना चाहते है...
परी ने देव का हाथ कस कर पकड़ लिया जैसे वो अपनी मौन स्वीकृति देना चाहती हो।
महक का गुस्सा बढ़ता देख कर और बच्चो को सहमता देख कर , देव ने तुरंत सुधा को इशारा किया —
"बच्चों को अंदर ले जाओ।"
वह नहीं चाहता था कि बच्चे ये सब सुनें। माहौल गर्म हो चला था।
"बताइए ताया जी, क्या किया है देव जी ने?" महक फिर चीख पड़ी।
"या ये खुद ही बोले कि उन्होंने मुझ पर दया खाकर कहा हो — ‘बेचारी है, शादी कर लेता हूं।’"
वो अब कांप रही थी, गुस्से से, आहत होकर।
"बस महक!" अब तक शांत रहने वाले आलोक भी उठ खड़े हुए।
"देव के बारे में अब एक शब्द और नहीं।
तुम ज़रूरत से ज्यादा बोल चुकी हो।
ये हमारी और अंकल की राय थी। देव को इसकी कोई खबर नहीं थी।"
देव अब भी चुप था।
उसकी चुप्पी… जैसे किसी समंदर की सतह पर फैली हुई खामोशी — जिसमें तूफान आने से पहले की गहराई और डर दोनों छुपे थे। या
जैसे एक कशती हो जो हवा के थपेड़ो से डगमगा रही हो।
तभी ताया जी ने धीरे से उठते हुए कहा,
“महक, अगर आज मैं चुप रहा, तो शायद सबकुछ टूट जाएगा। अब तुम्हें सच्चाई जाननी ही होगी… पूरी सच्चाई…”
सबकी नजरें अब ताया जी पर थीं।
"गौरव ने... बहुत गलतियां कीं बेटा।"
उनकी आवाज भारी हो गई थी।
"शुरुआत उस दिन हुई, जब उसने नौकरी छोड़ कर बिज़नेस करने का मन बनाया और उस के लिए तुम्हारे गहने बेच दिए।"
". तुमने हिम्मत दिखाई थी इसलिए हमने कुछ भी नहीं कहा… सोचा नई शुरुवात करनी चाहता है … मदद करनी चाहिए।
पर तुम्हे नही पता जब बिजनेस ठीक से चला ना पाया तो उसे फिर घाटा हुआ,काम बंद करने की जगह बैंक से लोन लिया।
महक ने चौंक कर देखा....फिर आंखे बंद कर ली उसने समझाने की भी कोशिश की थी गौरव को पर नही मानता था...जिद्दी था
ताया जी ने बोलना जारी रखा" गौरव
लोन भी नहीं चुका पाया तो… मेरे रिटायरमेंट के पैसों की मांग की… "
अब महक एक दम सकते मे आ गयी ' आपके रिटायरमेंट के पैसे??? तो क्या आप ने दे दिये?"
"हां, मैंने भी दे दिए।" ताया जी की आवाज भारी हो गयी।
"पर मुझे यह बात किसी ने क्यो नही बताई..." महक की आवाज कांपने लगी
" तुम्हे नहीं बताया क्योकि माधव अभी छोटा था ..गौरव ने वादा किया था की वो पैसे लौटा देगा ..तुम्हे भी ना बताऊ"
"आपको गौरव का स्वाभाव पता था...तब भी आपने पैसे दे दिये" महक ने पूछा
" बेटा...तुम लोगो के इलावा और कौन था हमारा...उस वक़्त पैसा बढ़कर नहीं था तुम दोनो से...सोचा था दो बार घाटा खा चुका है अब संभाल कर बिजनेस करेगा..सब ठीक हो जायेगा"ताया जी बोले
"फिर. ..क्या पैसे वापिस किये थे गौरव ने?"
महक ने पूछा
" नही , कैसे करता ....उसने सारा पैसा मैच के सट्टों में झोंक दिया।"
सन्नाटा।
महक की सांसें अटक गईं।
"सब हार गया… और जब कोई रास्ता नहीं बचा…
तो बिना सोचे-समझे आत्महत्या कर ली। ना तुम्हारे बारे मे ,ना बच्चो के बारे मे , ना. ही अपनी माँ के बारे मे सोचा....यहाँ तक की आत्महत्या करने के कारण उसे पालिसी के पैसे भी नही मिले" ताया जी कहते कहते कुर्सी पर गिरने लगे आलोक ने उन्हे थाम लिया।
महक के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई।
वो लड़खड़ाते हुए कुर्सी पर बैठ गई।
उसकी आंखों में अब गुस्सा नहीं था… बस खामोश सवाल थे।
महक का सिर नीचे झुक गया।
सारे सवाल, सारा गुस्सा, सारी तल्ख़ी… जैसे अब बेमानी लग रही थी।
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महक के दिल पर क्या बीत रही होगी जब उसे गौरव की पूरी सच्चाई पता चली?
कैसा होगा उसका बर्ताव अब देव और सबके साथ?
MTNL की घंटी
.....to be continued