MTNL की घंटी - 22 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 22

जिंदगी के कुछ पल ऐसे होते है जो सिर्फ कुछ एहसास देते है.. उन्हे महसूस किया जा सकता है महक भी कुछ देर इन पलो मे रहना चाह्ती थी पर वक़्त इजाजत नही दे रहा था।
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महक जैसे ही हाल में पहुँची, उसकी नज़र सबसे पहले ताया जी और ताई जी पर पड़ी।
वो खुशी से मुस्कराई, दिल जैसे हल्का हो गया हो।

"ताया जी! ताई जी!" वो तेज़ी से उनके पास भागी और दोनों के पैर छूकर झुक गई।
ताई जी ने उसे आशीर्वाद देते हुए गले से लगा लिया, और ताया जी की आंखें भर आईं।

"बेटी की खुशी में शामिल होने न आएं, ऐसा हो सकता है क्या?" ताया जी ने रुकती हुई आवाज़ में कहा।
"तेरी मुस्कान हमारे लिए सबसे बड़ी दुआ है।"
"ताई जी गले लगा कर बोली " तेरे लिए इतना बड़ा दिन है आना तो था हमें"

अभी वो माहौल संभल ही रहा था कि सा सामने से देव आता दिखा।
देव सीधे जाकर ताई जी के पैर छूता है,
और फिर ताया जी को देखकर मुस्कराता।

ताया जी ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
दोनों कुछ पल यूँ ही खड़े रहे – एक पुराना अपनापन, एक लंबा इंतज़ार... सब कुछ उस एक आलिंगन में सिमट गया।

महक ने एक लंबी साँस ली।
उसे अचानक एहसास हुआ —
देव और ताया जी बहुत दिनों बाद मिले हैं। पर उनके मिलने के ढंग से लगा नहीं कि वो बहुत दिन बाद मिल रहे हैं 

उसके मन में एक हलचल-सी उठी,
जैसे पुराने रिश्तों की गरमाहट फिर से लौट आई हो।
सब  जा कर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए।

_____________

मासूम बच्चे स्टेज पर आए.....
छोटे-छोटे कदमों से, रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे हुए, वे स्टेज पर ऐसे खड़े थे जैसे नन्हे-नन्हे तारे आसमान में चमकने को तैयार हों।

कार्यक्रम शुरू हुआ।
"यशोमती मैया से बोले नंदलाला..."
गाने की धुन के साथ बच्चों ने नृत्य करना शुरू किया। हर एक भाव में भोलेपन और भक्ति का रंग घुला था।

तभी अचानक...
गाना बीच में ही रुक गया। ऑडियो बंद हो गया। पूरा हाल शांत। बच्चे रुके नहीं, लेकिन असमंजस में थे।

देव ने महक की आँखों में देखा।
एक अनकही भाषा में उनसे कुछ कहा... न कोई शब्द, न आवाज़... बस एक नज़र।

महक ने उसकी आँखें पढ़ लीं।
बिना किसी हिचकिचाहट के, माइक उठाया... और वो गाने लगी:

"यशोमती मैया से बोले नंदलाला..."

उसकी आवाज़ में वो अपनापन था, जो हर दिल को छू गया। जैसे 11 साल पहले कान्हा के मन को छू गया था...

देव भी साथ देने के लिए आगे आया।
उसने सुर में सुर मिलाया। अब माइक पर केवल गाना नहीं था,
बल्कि एक जोड़ी की जुगलबंदी थी — आवाज़ों में समर्पण,
नज़रों में समझदारी, और बच्चों के चेहरों पर मुस्कान।

हॉल तालियों से गूंज उठा।
एक छोटी सी बाधा ने उस पल को यादगार बना दिया —
जहां दो दिलों ने मिलकर बच्चों की दुनिया रोशन कर दी


देव ने मुस्कुरा कर परी और माधव को इशारे से बुलाया।
परी ने पहले माँ की ओर देखा, फिर दौड़कर स्टेज पर चढ़ गई।
माधव ने छोटे-छोटे कदमों से स्टेज की सीढ़ियाँ चढ़ीं और देव का हाथ थाम लिया।

देव ने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया।
फिर माइक थाम कर कहा,
"अगर गीत रुक भी जाए तो मुस्कान नहीं रुकनी चाहिए... आज का दिन बच्चों के नाम है।"

इतने में हाल में बैठे लेखकगण के बच्चे भी एक-एक कर स्टेज पर चढ़ आए।
किसी ने तालियाँ बजाईं, किसी ने बच्चों के साथ थिरकना शुरू किया।

स्टेज पर बच्चों का मेला सा लग गया।
कोई कृष्ण बना, कोई राधा, कोई गोपाला...
बिना संगीत के भी हर चेहरा मुस्कान से चमक रहा था।

महक ने आँखों में आँसू और होंठों पर मुस्कान लिए देव को देखा।
देव ने सिर झुका कर जैसे कहा — "बस यही तो चाहिए था…"

पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
हंसी, गीत, बच्चों की मासूम शरारतें —
हर पल को कैमरों ने नहीं, दिलों ने कैद कर लिया।

यह दिन बन गया एक यादगार पल,
जहाँ तकनीकी गड़बड़ी ने नहीं, दिलों के तालमेल ने कार्यक्रम को सफल बनाया।।

आज का दिन आलोक और सुधा के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था।
सालों की मेहनत, समर्पण और लेखनी की साधना जैसे रंग ला रही थी। सभागार खचाखच भरा हुआ था, और मंच पर जगमगाती रोशनी के बीच आलोक ने मुस्कुराते हुए माइक थामा।

"अब मैं बुलाना चाहूंगा हमारे आज के विशिष्ट अतिथि… जिनकी मौजूदगी से ये शाम और भी खास बन गई है — "श्री देव जी फाउंडर ऑफ कान्हा फाउंडेशन,"

तालियों की गूंज के बीच देव मंच की ओर बढ़े। चेहरे पर वही शांत गरिमा, आंखों में गहराई, और चाल में आत्मविश्वास।

देव ने मंच पर आते ही एक-एक करके सभी लेखकों को सम्मानित करना शुरू किया — न केवल शब्दों से, बल्कि प्रोत्साहन राशि के रूप में चेक भेंट कर।

महक भी मंच पर आई। उसने हाथ जोड़ कर देव का धन्यवाद किया और जब चेक लिया, तो सीधे जाकर वो चेक अपने ताया जी की हथेली पर रख दिया।

"ये सिर्फ मेरा नहीं, आपकी दी हुई सीख का फल है, ताया जी," उसकी आवाज भीगी हुई थी।

ताया जी की आंखों के कोने भीग चुके थे। उन्होंने कांपते हाथों से महक का सिर सहलाया।
ये पल सिर्फ सम्मान का नहीं, रिश्तों की गर्माहट और संघर्ष की जीत का था।

परी ने खुशी से माँ को गले लगा  लिया महक की आँखों मे आँसू आ गये..माधव को कुछ समझ नही आया तो देव को बुला लाया और कहने लगा " अंकल आप अपना चेक वापिस ले लो...मेरी मम्मी को रो रही है जब से आपने चेक दिया है"
" महक... अब अगर रोयी तो मै चेक वापिस ले लूँगा" देव के बदले आलोक ने जवाब दिया
सब हंसने लगे...महक भी मुस्कुरा पड़ी
"आज रात का डिनर आप सबको हमारे साथ करना है कुछ पुरानी कुछ नयी बातें हों जाएगी" आलोक ने ताया जी को कहा 
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कार्यक्रम अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर अब धीरे-धीरे शांत हो रहा था।
स्टेज की रोशनी मंद पड़ चुकी थी, कुर्सियाँ अब खाली होने लगी थीं, और सभागार में फैली हलचल अब एक सुकून भरी थकान में बदल चुकी थी।

कुछ लेखक मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को गले लगाते अपने-अपने कमरों की ओर लौट चले।
कुछ ने सीधे घर की राह पकड़ ली — शायद अपने अनुभवों को समेटते हुए, या फिर अगली किताब की पहली पंक्तियाँ मन ही मन बुनते हुए।

आलोक और सुधा मंच के पास खड़े रह गए — थोड़ी देर और उस माहौल को महसूस करने के लिए।

देव चुपचाप एक किनारे खड़े, हल्की मुस्कान के साथ सबको जाते देख रहे थे।
महक, अब भी कुछ सोचती हुई, उसी जगह खड़ी थी जहाँ उसने ताया जी को चेक दिया था।

कल दोपहर ठीक 12 बजे का सेमिनार अंतिम कार्यक्रम था — एक घंटे का छोटा-सा सत्र,
जहाँ "आधुनिक लेखन में भावनाओं की भूमिका" पर चर्चा होनी थी।

और उसके बाद... विदा।
कुछ मिलन अधूरे रह जाएंगे,
कुछ रिश्ते वहीं से शुरू होंगे… जहाँ कहानियाँ खत्म होती हैं।
MTNL की घंटी
....to be continued