महक जैसे ही हॉल में दाखिल हुई, हल्की-सी हलचल हुई। कई लोगों ने उसकी ओर देखा — उसकी सादगी, उसकी मुस्कुराहट और उसके चेहरे की वो शांत चमक जैसे सबको कुछ पल ठहरने पर मजबूर कर रही थी।
हाल की हल्की रौशनी, सामने सजा हुआ मंच, और पीछे बजता धीमा संगीत — सब कुछ मानो किसी पुराने ख़्वाब जैसा लग रहा था।
महक ने मंच के किनारे खड़े हो कर गहरी साँस ली।
“स्कूल में तो जाने कितनी बार स्टेज पर बोला है… पर आज... ये घबराहट क्यों हो रही है?”
शायद इसलिए कि आज वो सिर्फ एक भाषण नहीं, अपना अस्तित्व बोलने जा रही थी।
उसका नाम पुकारा गया।
“अब मंच पर आ रही हैं — लेखिका महक शर्मा।”
तालियाँ बजीं।
महक धीरे-धीरे मंच की सीढ़ियाँ चढ़ी। माइक के पास पहुँची। कुछ पल खामोश रही — फिर उसकी नज़र सामने बैठे चेहरों पर गई। कुछ परिचित, कुछ अनजाने। लेकिन सबसे आगे पहली पंक्ति में — परी और माधव बैठे थे — आँखों में गर्व और मुस्कान।
महक ने बोलना शुरू किया — आवाज़ में धीमा कंपन था, पर शब्द सच्चे थे:
“कहते हैं लेखक वो बनता है... जो अपने दर्द को समझ कर उसे कागज़ पर उतार दे।
जैसे कोई दिल के समुंदर में डुबकी लगा कर, वहाँ से अल्फ़ाज़ के मोती निकाल कर,
माला की तरह पिरो देता है...
किसी न किसी वजह से ही कोई लेखक बनता है —
कोई अपनी कहानी कहता है, कोई दूसरों की आवाज़ बनता है...
पर हर लेखक के पीछे कोई होता है —
कोई ऐसा, जो उसके शब्दों में साँस भरता है... उसे हौसला देता है।
मेरे जीवन में वो इंसान मेरे पति गौरव थे।
वो हमेशा कहते थे — ‘महक, तुम्हारे पास वो आँखें हैं, जो दुनिया को अल्फ़ाज़ में बुन सकती हैं।’
मैं जो भी लिख पाई, जो भी कह पा रही हूँ —
वो सब उनकी वजह से है।
आज अगर वो दुनियां में होते...
तो शायद पहली पंक्ति में बैठकर सबसे ऊँची तालियाँ वही बजाते।”
कुछ पल के लिए हाल में एक सन्नाटा छा गया।
महक की आँखों में नमी थी,, अपने बच्चों के चेहरे पर आयी मुस्कान देख पा रही थी और उसके चेहरे की मुस्कान
एक ऐसी मुस्कान थी, जिसमें अधूरापन भी था और संतोष भी।
तालियाँ गूंज उठीं — दिल से, ज़ोर से, देर तक।
स्टेज से उतरने के बाद, तालियों की गूंज अब भी हाल में गूँज रही थी, पर महक का दिल भारी होता जा रहा था।
भीड़ से दूर, वह एक खाली कॉरिडोर में आकर रुक गई।
सामने एक पुरानी दीवार थी — ठंडी, खामोश।
महक ने अपना माथा उस दीवार से टिका दिया... और फिर जैसे अंदर जमा हुआ दर्द फूट पड़ा।
वो जोर-जोर से रोने लगी —
जैसे बरसों से दिल में दबे आंसू आज बाहर आने का रास्ता पा गए हों।
उसी क्षण पीछे से अचानक एक तेज़ ताली की आवाज़ आई —
ठप-ठप-ठप...
महक चौंक कर मुड़ी।
“वाह महक जी... बहुत ही शानदार स्पीच थी,”
कटाक्ष से भरी आवाज़ थी —
"इतना झूठ कैसे बोल लेती हैं आप?"
वो सामने मिस्टर गुप्ता थे।
चेहरे पर गुस्सा और आंखों में कुछ और — शायद गहराई, शायद दर्द।
महक ने गुस्से में कहा,
“आप क्यों मेरे पीछे पड़े हैं? ये मेरा व्यक्तिगत मामला है!”
गुप्ता के चेहरे पर अब सीधी चुनौती थी।
"क्या सच में गौरव आपकी इंस्पिरेशन थे?
क्या वो सच में इतना अच्छा इंसान था, जितना आपने कहा?
क्या वो वाकई जिम्मेदार पति था?"
महक की आँखों में जलन सी होने लगी।
उसकी आवाज़ काँपने लगी —
"आपको कोई हक़ नहीं मेरी ज़िंदगी में दखल देने का!
आप होते कौन हैं मुझे जज करने वाले?"
मिस्टर गुप्ता ने एक पल के लिए चुप होकर उसकी आँखों में देखा —
फिर धीमे लेकिन गहरे शब्दों में बोले:
"सबके सामने आप झूठ बोल सकती हैं…
पर एक इंसान के सामने आप कभी नहीं बोल पाएंगी — देव के सामने।"
महक का चेहरा फक हो गया।
उसके होंठ थरथराने लगे।
"आप... आप देव जी को कैसे जानते हैं?" उसकी आवाज़ जैसे टूट रही थी
गुप्ता ने एक लंबी साँस लेकर जैसे बीते वर्षों का बोझ उतारने की कोशिश की और कहा —
"मैं आलोक गुप्ता हूँ... देव का बचपन का दोस्त।
उसकी कहानियाँ, उसके टूटे हुए सपने... और आप —
सब जानता हूँ, महक..."
महक के चेहरे पर एक लहर सी दौड़ गई।
अचानक... उसकी आँखों के सामने पोस्ट ऑफिस वाला वो धुंधला चेहरा घूम गया —
जो कुछ दिन पहले एक चिट्ठी देते हुए उसके दरवाज़े पर खड़ा था।
उस दिन उसकी आँखों में आँसू थे… और शायद इसलिए, वो चेहरा ठीक से देख नहीं पाई थी।
अब उसे समझ आ रहा था —
वो बेचैनी...
वो अजीब सी घुटन, जो MTNL की हर घंटी के साथ महसूस होती थी...
वो सब कुछ उसी एक इंसान से जुड़ा था।
उसने एक ही सांस में सवालों की बौछार कर दी —
“कैसे हैं देव जी?
कहाँ रहते हैं?
क्या करते हैं?
अकेले हैं या... शादी कर ली उन्होंने?”
आंखों से चुपचाप आँसुओं के कतरे बहते रहे…
गले में एक भारीपन था, पर फिर भी एक सवाल दबी आवाज़ में निकल ही गया —
“क्या... क्या मैं उन्हें याद हूँ?”
गुप्ता का चेहरा गंभीर था — लेकिन नर्म।
"हाँ, महक…
उसे तुम एक दिन भी नहीं भूली…
क्योंकि उसने तुम्हारे एक सवाल का जवाब देना था।
शायद... इसी वजह से वो अब भी जिंदा है।
महक… मिलना चाहोगी देव से?"
गुप्ता का ये प्रश्न एक साधारण सवाल नहीं था।
महक के लिए ये ऐसा था मानो वक़्त ने उसकी रूह को किसी चौराहे पर खड़ा कर दिया हो।
11 साल पहले की वो आखिरी कॉल,
वो टूटी हुई आवाज़…
और उसके बाद आई एक लंबी चुप्पी।
महक अब तक पूरी तरह बदल चुकी थी —
और देव... अगर मिलना ही होता,
तो क्या इतने सालों में वो एक बार नहीं आता?
क्या देहरादून आकर, बिना इजाज़त मांगे, वो उसके सामने खड़ा नहीं हो सकता था?
क्या वो सच में मिलना चाहता था?
या बस जवाब अधूरा छोड़ कर, उसे उसी सवाल में उलझा छोड़ देना चाहता था?
महक के पाँव अब जैसे जंजीरों में बंध गए थे…उसे लगा की अब चलना भी मुश्किल हों जाएगा फिर भी भारी कदमो से वो कोरिडोर की ओर मुड़ गई —
बच्चे हाल में उसका इंतज़ार कर रहे होंगे।
"जवाब नहीं दिया महक..."
गुप्ता की आवाज़ पीछे से आई —
"मिलना चाहोगी देव से?"
ये भी ऐसा सवाल था... जिसका उत्तर केवल "हाँ" या "ना" हो सकता था।
पर महक जानती थी —
वो देव नहीं है,
जो किसी सवाल को यूँ अधूरा छोड़ दे...
उसने बिना पीछे देखे बस एक शब्द कहा —
"नहीं।"
और धीरे-धीरे वापस हाल की ओर बढ़ गई।
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वक़्त की चाल को आज तक कोई समझ नहीं पाया...
वो सीधा नहीं चलता —
हमेशा टेढ़ा ही चलता है।
देव जानता था कि महक देहरादून आई है।
तो क्या उसे मिलने के लिए इज़ाज़त की ज़रूरत थी?
शायद नहीं।
पर फिर भी...
कभी-कभी इंसान सबसे ज़रूरी चीज़ के लिए भी सबसे ज़्यादा डरता है — माफ़ी मांगने से, सच बोलने से, या फिर सिर्फ सामने आ जाने से।
....to be continued