MTNL की घंटी - 17 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 17

महक हाल से बाहर आ गई थी। भीतर की भीड़, शोर और हवा में फैली हुई परफ्यूम की मिली-जुली महक उसे घुटन जैसी लग रही थी। बाहर निकलते ही हल्की-हल्की बूंदें उसके चेहरे को छू गईं। हवा में ठंडक थी, और उसके शरीर में एक हल्का सा बुखार पहले से ही दस्तक दे चुका था, पर बारिश में भीगने का आकर्षण उसे अंदर खींच रहा था।

वह यूँ ही खड़ी थी, जैसे किसी अनजानी सोच में डूबी हो, तभी एक गंभीर और नरम आवाज़ पास से आई—

"महक जी?"

वो चौंकी, मुड़ कर देखा — एक सौम्य, सधे हुए चेहरे वाले व्यक्ति उसके पास खड़े थे।

"मैं सुधा का पति हूँ... । आप इस तरह भीगेंगी तो कल की सुबह स्टेज पर कैसे जाएँगी? आप अपने कमरे में जा कर आराम कर लीजिए। कल सभी लेखकों का इंट्रोडक्शन है — मंच पर। मै दवा भिजवा देता हूं आप आराम कीजिए "

महक ने धीरे से सिर हिलाया और कमरे की ओर बढ़ गई। दरवाज़ा बंद कर दवा खा कर जैसे ही वह बिस्तर पर लेटी, उसके शरीर ने जैसे साथ छोड़ दिया। तेज़ बुखार ने उसे अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। आँखें भारी होने लगीं, और नींद से पहले एक धुंधली सी सोच आई — काश कोई होता जो अभी मेरे पास बैठता...

फिर एक धुंधलका।
फिर सन्नाटा।

कुछ देर बाद किसी ने उसके बालों को बहुत हल्के से सहलाया। वो नींद और बेहोशी की बीच की अवस्था में थी। किसी ने माथे पर गीली पट्टियाँ रखीं। वह धीमी आवाज़ में बुदबुदाई — “पानी…”

अगले ही पल किसी ने बहुत नरमी से उसे उठाया, उसके होठों से ग्लास लगा कर पानी पिलाया। उसे यह सब सपना लग रहा था।

जब उसने थककर सिर वापस तकिये पर टिकाया, वो अजनबी इंसान ने उसे अपने सीने से लगा लिया … महक को धड़कनों में  कुछ महसूस हो रहा था ...जैसे उसका नाम गुनगुना रही हो...
जैसे MTNL फोन की घंटी बज रही हो..
महक ने अनजाने में सुकून मिला … और वहीं सिर रख कर सो गई।

सुबह तेज़ धूप की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। महक की आँखें खुलीं तो उसने महसूस किया — बुखार अब कम था। पर... वह इंसान?
कमरे में कोई नहीं था।
न गीले कपड़े, न ग्लास, न आवाज़।

महक की आंखें खुलीं तो शरीर हल्का महसूस हो रहा था। बुखार उतर गया था, पर मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात की बातें उसे पूरी तरह याद नहीं थीं, बस टुकड़ों में कुछ एहसास — किसी का हाथ, किसी की उंगलियों की नमी, माथे पर ठंडी पट्टी, और किसी की छाती पर टिका हुआ उसका सिर...सबसे बढ़कर इक जाना पहचाना स्पर्श

मन में सबसे पहले एक शक उठा — कहीं वो सुधा के पति तो नहीं थे?
आख़िर वही तो जानते थे कि वह कमरे में आराम करने आई है। पर ये सोचते ही उसने झटके से खुद को झिड़क दिया।

नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है... सुधा बहुत आत्मीय और सुलझी महिला है... और उनका परिवार भी... नहीं महक, तुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए।

उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।

“महक जी?”
सुधा की आवाज़ थी।

महक ने दरवाज़ा खोला तो सुधा के साथ उसके दोनों बच्चे भी थे — हाथ में फूल और एक चॉकलेट बॉक्स।

“कैसी हो अब?” सुधा ने स्नेह से पूछा।
महक मुस्कुरा दी, “अब ठीक हूँ... बस रात को थोड़ा बुखार था।”

सुधा ने हाथ पकड़ कर उसे बैठाया, फिर मुस्कुराते हुए बोली ,"हां बताया था मेरे पति ने की तुम्हारी तबियत खराब है अच्छा हुआ आराम कर लिया। आज शाम 5 बजे का इंट्रोडक्शन प्रोग्राम है। सब लेखक मंच पर अपने बारे में और अपनी किताबों के बारे में बताएँगे। तुम भी तैयार रहना।”

महक ने हल्के से सिर हिलाया, पर मन में अब भी रात की परछाइयाँ घूम रही थीं।

अगर वो गुप्ता जी नहीं थे, तो कौन था?

पर इस बार वह अपने सवालों को मन के किसी कोने में धकेल कर उठी, आईने के सामने आई, और चेहरे पर पानी के छींटे मारे।

जो भी था… शुक्रिया तो कह नहीं सकी,
उसने मन ही मन कहा,
पर शायद वो फिर कहीं न कहीं मिल ही जाएगा… अगर मिलना लिखा होगा तो।

महक को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे चंद्रमा वक़्त से पहले धरती पर उतर आया हो।

सफ़ेद रंग की हल्की-सी झिलमिलाती साड़ी, जिस पर गुलाबी फूलों की महीन कढ़ाई थी, उसकी सादगी में एक अद्भुत आकर्षण घोल रही थी। बालों का सधा हुआ जुड़ा — किसी शांत नदी की तरह संयमित — जिसमें परी ने गुलाब का एक नाज़ुक फूल खोंस दिया था। हल्की गुलाबी लिपस्टिक, आँखों में काजल की हल्की रेखा, और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान।

माधव, उसका बेटा, कुछ पल उसे देखता ही रह गया… फिर चुपचाप बॉक्स से सफ़ेद मोतियों की माला निकाल कर उसकी ओर बढ़ा —
“माँ, ये पहन लो... इससे तुम और भी सुंदर लगोगी।”

महक ने जब माला पहनी, तो सच में ऐसा लग रहा था जैसे पूर्णिमा का चाँद अपने पूरे शबाब पर हो।

महक आज भीतर से भी बेहद खुश थी। इतने सालों बाद अपनी पहचान, अपनी किताब और अपनी कलम के साथ मंच पर जाना — ये सपना कभी सपना ही था... अब साकार हो रहा था।

पर इस खुशी के साथ दिल की धड़कनों में हल्की सी घबराहट भी थी।
इतने सारे लेखक... इतने दर्शक... स्टेज पर जाना... सबके सामने बोलना... मैं कर पाऊँगी?

उसने खुद को आईने में देखा और खुद से ही कहा,
"डर मत महक... तू वही है जिसने अपने दर्द को शब्दों में ढाला है... आज तुझे बस वही शब्द कहने हैं... अपने दिल से।"

परी ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,
“मम्मा, आप सबसे सुंदर हो... और आप सबसे अच्छा बोलोगी भी। मैं वहीं सामने बैठूंगी, और तालियाँ सबसे पहले मैं बजाऊंगी।”

महक मुस्कुराई… अब डर कुछ कम लग रहा था।

स्टेज की ओर बढ़ते हुए उसके मन में अब सिर्फ एक ही सवाल था —
क्या आज वहाँ वो चेहरा भी दिखेगा... जो कल रात मेरे साथ था? वो सच मे कोई. था या भ्रम?

....to be continued