थोड़ी देर की खामोशी के बाद ताया जी बोले, “कल रविवार है…मैं टिकट बुक करवा देता हूँ---देहरादून की"
महक ने एक गहरी साँस ली…शायद पहली बार वर्षों बाद उसने अपने दिल की दीवार को थोड़ा ढीला पड़ते महसूस किया।
“अगर मैं चली गई… और यादें भी साथ आ गईं तो?” महक ने बहुत धीमे से कहा।
“तो उन्हें भी हवा, बादल, पहाड़ दिखाओ…शायद वो भी हल्की हो जाएँ,” ताया जी मुस्कुराए।
बेंच पर बैठी महक ने पहली बार आसमान की ओर देखा और उसे वो चमकती हुई सी लाइन नहीं, मुस्कुराता हुआ आसमान नजर आया ।
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रात भर करवटों में बीती।
नींद तो महक की आंखों से कब की रूठ चुकी थी… लेकिन उस रात ताया जी की बातें जैसे भीतर कहीं टकरा रही थीं।
सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की से झांकी,
महक ने धीरे से आँखें खोलीं…
बच्चे अब भी गहरी नींद में थे।
उनके बीच लेटे हुए उसने पहली बार गौर से देखा…
परी ने अपनी छोटी-सी हथेली में उसकी उंगलियाँ कस कर थामी हुई थीं।
माधव का मासूम चेहरा तकिए पर फैला था…
जैसे वो किसी खूबसूरत सपने में हो।
महक का दिल भर आया…
इन बच्चों ने क्या माँगा था — बस थोड़ा सा वक्त, थोड़ा सा साथ।
वो धीरे से उठी, रसोई में जाकर दूध गर्म किया, नाश्ता बनाया, और पहली बार अपने बालों में एक छोटी-सी क्लिप लगा ली।
आईने में खुद को देखा तो जैसे खुद से ही सवाल किया —
“तू कब तक यूँ टूटी हुई रहेगी महक?”
दोपहर तक ताया जी के फोन पर एक मैसेज आया
“आप् टिकट्स बुक करवा दीजिए… देह्ररादुन की ..आप दोनों अपनी भी करवा लीजिए..आप भी कही नही गये"
तबियत ठीक नही होने की वजह से उन्होंने सिर्फ 3 टिकट ही बुक करवाए।
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तीन दिन बाद…
ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकते हुए महक की आँखें बादलों के बीच खोई थीं,
पर उसके दिल में एक ही नाम बार-बार गूंज रहा था — ‘देव’।
देहरादून ना जाने का जो कारण था,
वो कोई सफर का डर नहीं था…
ना बच्चों की जिद…
बल्कि बस वही एक अनकही याद — देव।
उसके लिए हमदर्दी थी,
पर अब कहीं ना कहीं नाराज़गी भी पनपने लगी थी।
गौरव के जाने के बाद… एक बार तो पूछ सकते थे,
एक बार तसल्ली दे देते —
मुझे नहीं, तो अपने अंकल को ही…
जिनके लिए गौरव सिर्फ भतीजा नहीं, बेटे से भी बढ़कर था।
चिंटू बनकर नहीं, तो कम से कम बड़े बाबू बनकर ही बात कर लेते…
क्या वो इतने सख्तदिल हो सकते हैं?
महक की आँखों के कोने भीगने लगे…
“पता नहीं… वो भी अब इस दुनिया में हैं या नहीं…”
यह ख्याल भीतर तक काँप गया…
उसने जल्दी से अपना चेहरा मोड़ लिया।
उसी पल दो छोटी आवाज़ों ने उसे वर्तमान में खींच लिया —
“मम्मा! चिप्स और कोल्ड ड्रिंक ले दो ना!”
परी और माधव ने एक साथ कहा।
महक ने मुस्कुरा कर आँसू पोंछ लिए,
“हाँ हाँ, ले लो बेटा…”
अगर वो अपने ख्यालों में ही खोई रहती,
तो शायद सोचें भी उड़तीं — देहरादून के उन बादलों की तरह, जो ऊँचे भी थे और बहुत दूर तक फैले हुए।
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जब स्टेशन पहुँचा…
ट्रेन के रुकते ही परी की आंखों में चमत्कार जैसा कुछ कौंध गया —
“मम्मा! इतने सारे पहाड़!! देखो! बादल भी तो साथ-साथ चल रहे हैं!”
माधव बस चारों ओर देख रहा था —
हर नज़ारा जैसे उसकी नन्ही-सी आँखों में हमेशा के लिए बस रहा हो।
महक ने गहरी सांस ली…
वो हवा सर्द थी, पर राहत से भरी…
यह गौरव के बिना उसकी पहली यात्रा थी…
पर बच्चों के साथ पहली मुस्कान भी।
प्लेटफॉर्म पर एक युवक आगे बढ़ा,
“मैडम, ‘प्रकाश पब्लिकेशन’ से आया हूँ। देहरादून में आपका स्वागत है। आइए, मैं आपको होटल तक छोड़ देता हूँ।
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रिसोर्ट में…
वो एक सुंदर, शांत और हरे-भरे पहाड़ों से घिरा आलीशान रिसोर्ट था।
मैनेजर ने मुस्कुराते हुए चाबी दी और कहा —
“आप लोग रेस्ट कर लीजिए, शाम को हमारे ऑनर आपसे मिलने आएँगे।”
कमरे में दाखिल होते ही परी और माधव ख़ुशी से उछल पड़े —
“मम्मा! देखो कितना बड़ा बिस्तर! और बाहर झूले भी हैं!”
महक खामोशी से बच्चों को देख रही थी…
उनकी मुस्कराहट उसके दिल की गांठें धीरे-धीरे खोल रही थी।
शायद… आने का फैसला सही था।
शायद देव से जवाब माँगने की जरूरत नहीं रह गई थी…क्योकि देव की जगह उसके दिल मे अब नही थी।
अब सवालों के ऊपर बच्चों की हँसी हावी होने लगी थी।
महक बच्चों को खिला कर उन्हें कमरे में आराम करने को कहती है।
खुद थोड़ी घबराई, थोड़ी उत्साहित सी लॉबी की ओर चलती है…
जहाँ रिसेप्शन से फोन आया था —
“मैडम, प्रकाश पब्लिकेशन की ओनर आपसे मिलने आई हैं।”
महक ने जैसे ही लॉबी में कदम रखा,
सामने एक सादगी से भरी पर तेजस्वी महिला खड़ी थीं —
सफेद सिल्क की साड़ी, हल्की सी मुस्कान,
और आँखों में वही चमक जो किसी कलाकार को तुरंत समझ जाती है।
“महक?”
महिला ने मुस्कराते हुए पूछा।
“जी… नमस्ते…” महक ने थोड़ा झिझकते हुए हाथ जोड़ दिए।
“मैं सुधा गुप्ता…”
महक की आँखें हैरानी और ख़ुशी से चमक उठीं —
“आप! आप… मेरी सबसे फेवरेट लेखिका! आपकी ‘नीले दिन’, ‘चुप्पियों की जुबान’, और… और ‘बिना बोले कहा सब कुछ’— मैंने हर किताब पढ़ी है… ऐसा लगता हैं जैसे हर लफ्ज़ दर्द मे डूबो कर लिखा है ”
सुधा जी हल्के से मुस्कुरा दीं —
“और मैंने भी तुम्हारे लिखे वो शब्द पढ़े हैं… जिनमें सच्चाई है, भावनाएँ हैं, और सबसे बड़ी बात — गहराई है।इसलिए तुम्हे बेस्ट राइटर का पुरुस्कार मिल रहा है"
" अभी बच्चो को घूमना है तो कही ले जाओ ..बाह्र्र् गाडी खड़ी है..शाम 7 बजे डिनर है हॉल नंबर पांच मे । सभी लेखक और बहुत से लोग होंगे...फिर मिलते है शाम को ..बाय" कह कर सुधा चली गयी।
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महक को सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा था...पर दिल मे एक हलकी सी घबराहट भी थी..रह रह कर सिर्फ एक ही ख्याल आ रहा था ' देव जी'
हर जगह उनके होने का अहसास कर रही थी..हर आहट पर लगता था की वो आ गये है ..हर चेहरे को गौर से देखने की कोशिश करती की कही देव जी तो नही...समझ नही पा रही ऐसा क्यों हों रहा है...ना 11 साल पहले समझ पाई थी ना अब
देहरादून मे कही देव से मुलाकात हों पायेगी?
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