MTNL की घंटी - 15 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 15

आज दीवाली की रात थी…

ना तो रंग-बिरंगी चूड़ियाँ थीं,
ना साज-श्रृंगार, ना बिंदी, ना सिन्दूर…
ना मांग में चमकता मंगलसूत्र।

बस एक पीले रंग की सादी सी साड़ी…
और उस पर एक सफेद पड़ा चेहरा,
जैसे सालों से धूप देखी ही न हो।

महक ने गौरव की तस्वीर के सामने दीपक रखा और बुदबुदाई —
"क्यों छोड़कर चले गए…?
आज तो दीवाली है, कैसे रहूँगी आपके बिना?"

"7 साल हो गए…"

"आपने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में…
बच्चों के बारे में…
हमें तो जैसे बीच भँवर में छोड़ दिया आपने।"

गौरव की तस्वीर पर सिर रखकर वो जोर-जोर से रोने लगी।

उसकी चीखती सिसकियाँ सुनकर परी और माधव भागते हुए आए और माँ से लिपट गए।
तीनों एक-दूसरे से लिपटे रो रहे थे।

तभी ताया जी और ताई जी आ गए।
ताई जी ने सबको गले से लगाया और कहा:
"महक बेटा, त्योहार पर इतना मत रो… बच्चों को संभालो।
जीवन ऐसे नहीं रुकता…"


---

दीवाली अब सिर्फ एक दिन बनकर रह गई थी —
उदासी का दिन,
जो हर साल पुराने ज़ख्मों को कुरेद कर चला जाता।

वक़्त कैसे बदल गया था…
जिस घर में दिवाली खुशियों की रोशनी ले कर आती थी उस घर मे अब उदासी की काली चददर ओड कर आती है 

गौरव का एक्सीडेंट,
उसकी अचानक मौत,
फिर सासू माँ का ग़म में बीमार पड़ना और चल बसना…

महक खुद भी नहीं रहना चाहती थी…
पर बच्चों के मासूम चेहरे देखकर…
उसे ज़िंदा रहना पड़ा।

ज़िंदा थी या बस साँसे चल रही थीं —
समझ नहीं पा रही थी। की वो जिंदा है या वी भी एक लाश है 


---

गौरव, जो ताया जी-ताई जी के लिए भी सब कुछ था —
उनका तो कोई संतान नहीं था।
लेकिन उन्होंने महक और बच्चों को अपने से बढ़कर संभाला।

महक के लिए अब कोई रंग, कोई खाना, कोई साज-सिंगार,
कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।

बस, जिंदगी जैसे जीने को कहती थी,
वो वैसे ही जी रही थी।


---


पहले बड़ा घर था...पूरे बड़े आंगन मे धूप ही घूप होती थी अब तो फ्लैट मे बस एक मुठी धूप ही आती थी वो भी खिड़की से छन कर। उसी टुकड़े को पकड़ कर  धूप में बैठी महक को ताया जी ने कहा,
"महक बेटा, तुम्हारे नाम एक पत्र आया है… 'प्रकाश पब्लिकेशन' से…"

महक सुनी-सुनाई सी आवाज़ में बोली,
"आप ही पढ़ दीजिए ताया जी…"

ताया जी ने चश्मा पहनकर पत्र पढ़ना शुरू किया 
"आदरणीय महक जी,

आपको यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आपकी लिखी पुस्तक
'MTNL की घंटी'
को बेस्टसेलर कैटेगरी में चुना गया है।

इसके लिए आपको ₹2.5 लाख की पुरस्कार राशि दी जाएगी।

पुरस्कार वितरण समारोह 25 से 28 दिसंबर तक देहरादून में आयोजित होगा।

रहने-खाने का संपूर्ण प्रबंध 'प्रकाश पब्लिकेशन' की ओर से किया जाएगा।

सादर
प्रकाश पब्लिकेशन"



पत्र सुनते ही परी और माधव खुशी से झूम उठे —
"माँ… पैसे भी मिलेंगे… घूमने भी चलेंगे!"

ताया जी भी बेहद खुश थे।

लेकिन महक का चेहरा…
एकदम शांत… और खाली।

वो धीमे से बस इतना बोली:
"नहीं… कोई नहीं जाएगा…"


---

गौरव के जाने के बाद  महक के उदास मन में जितना भी दर्द था,
वो सब उसने कागज़ पर उड़ेल दिया था।

उसकी कहानियाँ —
उसकी टूटी भावनाओं की तस्वीरें थीं।

वो जानती थी, किसी का जाना सब कुछ ले जाता है —
पर शब्द कभी नहीं मरते।

शब्दों ने ही उसे जिंदा रखा था।
अब वक्त था —
उन शब्दों को नई पहचान देने का।


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क्या महक बच्चों की खुशी के लिए देहरादून जाएगी?
क्या वो अपने दर्द से ऊपर उठकर एक नई दीवाली देखेगी?

या फिर
खिड़की से छनती धूप ही उसकी सारी दुनिया बनी रहेगी…


रात के खाने की टेबल पर परी और माधव ने जैसे ही खाना खत्म किया, दोनों एक साथ बोल पड़े,
“मम्मा, हम कभी घूमने नहीं गए... हमें भी कहीं ले चलो ना…please"
उनकी मासूम आँखों में एक भोली सी चमक थी, जो महक के दिल में कहीं गहरे उतर गई।

लेकिन महक चुप रही... पूरी तरह चुप।
बिना कोई जवाब दिए, उसने बच्चों को धीरे-धीरे खाना खिलाया, माथा सहलाया, और सुला दिया।
पर उनके मासूम चेहरों पर छाई उदासी, अब महक के मन पर छा गई थी।

पहले वो यूँ ही छत पर जा बैठती थी, जब दिल बोझिल होता था…
पर अब वो भी कहाँ मुमकिन था — फ्लैट की दीवारें उसकी उदासी को और गाढ़ा कर देती थीं।
इसलिए वो चुपचाप नीचे सोसायटी के छोटे से पार्क में चली गई —
जहाँ एक टूटी-सी बेंच थी, और उसके ऊपर खामोश सा आसमान।

महक ने सिर उठा कर देखा…
ना चाँद था, ना तारे — बस एक हल्की सी चमकती रेखा थी,
जैसे किसी ने आसमान पर भी आँसू पोछ दिए हों।

वो अब अकेली थी — बिल्कुल अकेली ।
आँखें नम तो थीं, पर आँसू अब भीगते नहीं थे।
शायद दुख भी अब थक गया था…
या खुशी अब कभी लौट कर नहीं आने वाली थी।
जो भी आती — कोई न कोई वजह जरूर साथ लाती उदासी की।

इतने में ताया जी धीमे क़दमों से आकर पास बैठ गए।

“बेटा, तुम जाना क्यों नहीं चाहती?”
उनकी आवाज़ में सवाल कम, अपनापन ज़्यादा था।

महक ने कुछ कहने की कोशिश की…
पर शब्द जैसे गले में फँस कर रह गए।
क्या बताती? कौन सी वजह बताती?

ताया जी ने उसका काँधा हल्के से छुआ,
“तुम्हारी ये खामोशी चुभने लगी है अब, महक…
परी और माधव ने क्या माँगा? सिर्फ़ एक मुस्कुराता सा सफ़र…
अगर गौरव ज़िंदा होता, तो आज उनका बचपन कुछ और होता…
मैं नहीं कहता कि तुमने कोई कमी छोड़ी है,
लेकिन भगवान ने शायद एक मौका भेजा है…
उसे ठुकराओ मत।”

वो थोड़ी देर रुके, फिर गहरी साँस लेकर बोले —
“इस बहाने तुम भी थोड़ा घूम आओ बेटा…
यूँ सब कुछ छोड़ कर दुनिया से नाता मत तोड़ो।”

महक की आँखें फिर भर आईं…
पर इस बार वो आँसू सिर्फ़ दुख के नहीं थे —
कहीं भीतर एक हल्का सा दरवाज़ा खुला था…
शायद उम्मीद ने धीरे से दस्तक दी थी।

महक ने आँसुओं से भरी आँखें ताया जी की ओर उठाईं — जैसे कुछ कहना चाहती हो, पर शब्द गले में अटक से गए हों।

"ताया जी…" वो बस इतना ही कह पाई, फिर सिर झुका लिया।

ताया जी ने उसके सिर पर हाथ रखा, “बेटा, गौरव के जाने के बाद तुमने खुद को बच्चों के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया, ये तुम्हारा बलिदान है, तुम्हारी ताक़त है—but don't let it become your punishment."

महक खुद को देहरादून जाने के लिए मना पायेगी?
यह जिंदगी का कोई इशारा है?
MTNL की घंटी