महक और देव दोनों सुबह-सुबह रिसोर्ट लौट आए।
देव ने आते ही आदरपूर्वक ताया जी के चरण छुए।
ताया जी ने उसे सीने से लगा लिया — उस आलिंगन में आशीर्वाद और अपनापन दोनों शामिल थे।
महक थोड़ी झुकी-झुकी नज़रों के साथ आगे बढ़ी और ताया जी के पांव छू लिए।
ताया जी ने उसका सिर सहलाया, लेकिन कुछ कहा नहीं — जैसे सब कुछ समझकर भी कुछ भी कहने का समय अभी नहीं आया हो।
थोड़ी ही देर में आलोक और सुधा भी वहां पहुंच गए।
उनकी नजरें देव और महक के चेहरों पर ठहर गईं — उन दोनों के भावों में जो शांति और अपनापन था, वो बहुत कुछ कह रहा था।
सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ आलोक की ओर देखा और जैसे बिना कहे कह दिया — "हां, ये रिश्ता बनने को तैयार है।"
अब सबकी नज़रें जैसे महक और देव पर टिक गयी थीं…
मानो सब उनके दिल का फैसला उनके होंठों से सुनना चाहते हों।
क्या उनके चेहरे पर लिखी कहानी को शब्द भी स्वीकारेंगे?
चुप्पी तोड़ते हुए सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"नाश्ता तैयार है… तुम दोनों पहले खा लो।
महक, तुम्हारा आज 12 से 2 का सेमिनार है —
तुम्हारी लेखन कला के लिए बहुत जरूरी है,
उसके बाद लंच… चलो, जल्दी से तैयार हो जाओ।"
इतना कहकर वह हाल की ओर बढ़ गईं।
सेमिनार खत्म होने के बाद महक जब डाइनिंग रूम में पहुँची,
तो उसने देखा — बच्चे देव जी के आसपास बैठे हँस-हँसकर बातें कर रहे थे,
उनकी आँखों में चमक थी, जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।
ताया जी भी पास ही आलोक से किसी मज़ेदार किस्से पर ठहाका लगा रहे थे।
इस घर में इतनी सहज, बेफ़िक्र हँसी महक ने कब सुनी थी,
उसे खुद याद नहीं आया।
उसका मन जैसे हल्का हो गया।
एक अजीब-सी तसल्ली थी —
मानो इन सबकी खुशी की चाबी उसके हाथ में हो।
उसने मन ही मन ठान लिया —
अब और देर नहीं…
वो जल्दी ही ‘हाँ’ कह देगी सबको
और यह घर यूँ ही हँसी से भरा रहेगा।
लगभग सभी लेखक जा चुके थे।
रिसोर्ट में अब बस महक, बच्चे, और तैयार होते हुए ताया-तायी जी ही बचे थे।
आलोक ने अपनी गाड़ी निकलवा दी थी ताकि सब आराम से निकल सकें।
बच्चों के साथ-साथ ताया जी की नज़र भी बार-बार दरवाज़े की ओर जा रही थी…
मानो सबको किसी का इंतज़ार हो।
महक के दिल में भी वही बेचैनी थी — देव कब आएंगे?
और फिर… जैसे ही देव अंदर आए,
महक के होंठों पर अनायास मुस्कान खिल गई।
देव ने सीधा उसकी आँखों में देखते हुए कहा —
"महक, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?"
यह सुनते ही बच्चे खुशी से उछलते हुए देव के पास आ खड़े हुए।
महक ने एक नज़र बच्चों को देखा —
उनका यूँ देव के पास खड़ा होना,
मानो उनके दिल की चुप स्वीकृति थी।
महक ने हल्के से पलकें झुका लीं,
आवाज़ धीमी थी पर भाव गहरे —
"जी… हाँ, देव जी।"
बस… इतना सुनते ही दोनों बच्चों ने जोर से ताली बजाई।
परी ने खुशी से चिल्लाकर कहा —
"देव अंकल मेरे पापा बनेंगे!"
माधव भी दीदी की आवाज़ दोहराने लगा —
"देव अंकल मेरे पापा बनेंगे!"
ताया जी ने उमंग से देव को गले लगा लिया,
तायी जी ने महक को अपने आंचल में भर लिया।
सुधा ने अपने गले की चैन उतारी
और महक के गले में डालते हुए बोलीं —
"अब से तुम मेरी देवरानी हो।"
फिर सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ आलोक से कहा —
"प्रकाश को फोन लगाओ,
उसे बताओ कि उसके चाचू शादी करने वाले हैं… सुनकर कितना खुश हो जाएगा।"
देव ने सुधा के कान में कुछ फुसफुसाया और धीरे से कमरे के अंदर चला गया।
सुधा ने मुस्कुराकर धीरे से जवाब दिया, "अच्छा… देवर जी।"
कितने सालों बाद सुधा ने देव को यूँ हँसते हुए देखा था। उसकी आँखों में एक चमक थी, जैसे अब वह जीना चाहता हो — अपने लिए, सिर्फ अपने लिए।
"महक, तुम्हारी कुछ किताबें जो सेमिनार में मिली थीं, अंदर रखी हैं… ले आओ,"
सुधा ने सधी हुई आवाज़ में कहा।
महक जैसे ही कमरे में पहुँची, देव पहले से इंतज़ार कर रहा था।
उसे देखते ही देव ने उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और कसकर गले से लगा लिया।
"देव जी… ये क्या कर रहे हैं? कोई देख लेगा तो?"
महक हल्के से झटपटी, पर उसकी आवाज़ में भी एक कंपन था।
देव का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
"घबराहट हो रही है, महक… डर लग रहा है… तुम मत जाओ… यहीं रह जाओ मेरे पास। तुम्हारा जाना मैं सह नहीं पा रहा।"
महक की आँखें भीग गईं।
"थक गई हूँ मैं भी… जल्दी आ जाऊँगी आपके पास… हमेशा-हमेशा के लिए। आप एक सपना लगते हैं, और मुझे भी डर है कि कहीं ये सपना टूट न जाए।"
उसने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
देव ने उसके बंद पलकों पर अपने होंठ रख दिए।
"जब भी आँख बंद करोगी… मैं दिखूँगा।"
महक की आँखों में नमी थी, लेकिन होठों पर एक हल्की मुस्कान आ गई।
"अब जाने दीजिए… जाऊँगी तो ही लौट पाऊँगी,"
वह कहकर कमरे से बाहर निकल आई।
लेकिन कुछ कदम चलते ही ठिठक गई… और फिर दौड़कर वापस आई।
दहलीज़ पर खड़े देव को कसकर गले से लगा लिया।
"रोक लो मुझे, देव…"
उसी समय देव के फोन पर आलोक का कॉल आया —
"अंधेरा हो जाएगा, महक को भेज दो… दूर का सफ़र है।"
थोड़ी देर बाद जब महक और देव साथ बाहर आए, बच्चों के चेहरों पर चमक फैल गई।
"तुम सब दिसंबर की छुट्टियों में आना… मेरे NGO को घर भी बनाना है,"
देव ने मुस्कुराकर कहा।
देहरादून से दिल्ली तक रास्ते भर सिर्फ देव और महक की शादी की बातें होती रहीं।
ताया जी बहुत खुश थे—देव से उनका जुड़ाव बचपन से था, और महक को भी वह बेटी जैसा प्यार देते थे।
दो दिलों का मिलन हो चुका था…
अब बस उनका मिलना बाकी था।
जब खुशियाँ हद से ज्यादा मिलने लगे तो डर लगता है की कही किसी की बुरी नजर ना लग जाए?
देव और महक की खुशी को किसी की नजर ना लगे ?
....to be continued