देव ने चुपचाप कार का दरवाज़ा खोला। महक का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखों में डर, दर्द और टूटी हुई उम्मीदें। उसके काँपते कदम जैसे खुद भी नहीं जान रहे थे कहाँ जा रहे हैं।
देव ने उसका हाथ थामा।
“महक... बस कुछ देर... यहां से दूर चलें,” उसकी आवाज़ में वो स्थिरता थी, जो बिखरे हुए मन को थाम ले।
महक बिना कुछ कहे कार में बैठ गई। उसके चेहरे पर गहराता दर्द देखकर देव का दिल कसक उठा। रास्ते भर महक खिड़की की ओर देखती रही — मौन, मगर भीतर तूफ़ान सा हाहाकार।
रिसॉर्ट की चहल-पहल से दूर, किसी सुनसान मोड़ पर देव ने कार रोकी।
“महक...” उसने धीरे से पुकारा।
महक ने जैसे खुद को संभालने की बहुत कोशिश की, पर दर्द फूट पड़ा।
“सब कुछ... बिखर गया देव जी..” उसकी आवाज़ रुक-रुक कर निकल रही थी।
देव ने अपना रुमाल उसकी ओर बढ़ाया, और फिर खुद ही उसके गालों से बहते आँसू पोंछ दिए।
“तुम अकेली नहीं हो...” देव ने उसके काँपते कंधों को थाम लिया, “अब नहीं...”
महक फूट-फूट कर रो पड़ी, और देव के कंधे से लग गई।
देव ने उसकी पीठ सहलाई, बिल्कुल वैसे जैसे कोई थकी हुई आत्मा को आराम देना चाहता हो।
कार की खामोशी में बस एक ही आवाज़ थी—महक के टूटते दर्द की... और देव के धैर्य की।
कार के शीशों पर हल्की सी बारिश की बूँदें गिरने लगी थीं, जैसे आसमान भी महक के दर्द में शामिल हो गया हो।
महक, जो अब भी देव के कंधे से लगी थी, लगातार सिसक रही थी। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसका सारा शरीर काँप रहा था — दर्द, अपमान और बेबसी की गहराइयों में डूबी हुई।
देव ने अपनी जैकेट उसके कंधों पर डाल दी।
महक ने धीरे से सर उठाया, उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा भीग चुका था, और होंठ काँप रहे थे।
"क्यों किया गौरव ने ऐसा मेरे साथ देव जी.? मैंने क्या बिगाड़ा था किसी का...?" उसकी आवाज़ टूटी हुई थी — जैसे एक बच्चा रात के सन्नाटे में अपनी माँ को पुकारे।
देव ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया।
आँसूओ को अपने अंगूठें से पोचा " महक तुम बहुत बहादुर हो..तुमने अपने आप को संभाला बल्कि बच्चो और ताया जी तायी जी को भी संभाला ....तुम गौरव की सोच नहीं बदल पायी
इसमे तुम्हारा कोई दोष नही....अपने आप को अकेला ना समझो मै पहले भी साथ था तुम्हारे ..हमेशा रहुगा"
महक उसकी आँखों में देखने लगी — उसमें कोई वादा नहीं था, कोई बड़ी-बड़ी बात नहीं थी — बस एक अटूट भरोसा था।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। कार के बाहर अंधेरा था, पर भीतर पहली बार महक के जीवन में थोड़ी सी रौशनी झलकने लगी थी — देव की मौजूदगी से।
बारिश अब तूफान मे बदल रही थी देव ने कार पास बने मंदिर से सटा कर लगा दी।
पहाड़ियों के बीच बसा एक
प्राचीन शिव मंदिर, समय की साक्षी बना, एकांत में खड़ा था। दीवारों पर लगे पुराने दीपक, गीली ज़मीन की सोंधी खुशबू, और मंदिर की घंटियों की धीमी-धीमी आवाज़ – जैसे सबकुछ इस पल के लिए ही रुका था।
देव ने कार रोकी।
"महक, ज़रा मेरे साथ चलो…"
महक चुपचाप उसके साथ मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। आँखों में थकान थी, लेकिन अब उनमें हल्की सी शांति भी थी।
सीढ़ियों की ओट में आकर वह दीवार से सिर टिका कर बैठ गई।
देव ने आकाश को फ़ोन किया, "तूफान के कारण हम नहीं आ पाएंगे... ताया जी को भी बता देना, महक ठीक है, मेरे साथ है।"
कुछ पल चुप्पी रही। फिर महक फूट पड़ी —
"देव जी... क्या गौरव ने मेरे साथ सही किया? आप बताइये... क्या उसे आत्महत्या करनी चाहिए थी? मुझे तो बस यही बताया गया था कि उसका एक्सीडेंट हुआ... पर ताया जी ने सच क्यों छुपाया?"
कहते-कहते महक रोने लगी।
देव उसके पास बैठते हुए बोला,
"महक... कुछ बातें वक़्त की नजाकत को देखकर ही कही जाती हैं। उस वक़्त तुम्हारे हालात नहीं थे... हम कुछ भी कह पाते।"
महक की टूटी हुई आवाज़ उभरी,
"तो आपको सब पता था... सब कुछ?"
देव ने सिर्फ इतना कहा,
"क्या फ़र्क पड़ता है... बस तुम और बच्चे ठीक हो।"
ठंड बढ़ती जा रही थी। महक कांपने लगी थी।
देव ने मंदिर के पास सूखे पत्ते और टहनियाँ इकट्ठा करके आग जला दी।
महक को उसके पास बैठाया।
आग पर हाथ सेकते हुए देव ने धीमे से पूछा,
"महक... क्या तुम मेरे साथ अपना जीवन बिताना चाहोगी?"
महक ने उसकी आँखों में देखा, फिर नजरें झुका लीं,
"आप तरस खाकर पूछ रहे हैं... या ताया जी की बात का मान रखने के लिए?"
देव की आवाज़ में सच्चाई थी,
"नहीं... मैं भी अपने अकेलेपन से डर गया हूँ। एक घर हो, एक परिवार हो... कोई हो जो सुने।
लेकिन मैं तुम्हारे हर फैसले का मान रखूंगा। तुम सोच समझकर जवाब देना।"
महक ने अपने दोनों घुटनों पर सिर रख लिया,
"देव जी... मैं बहुत टूट चुकी हूँ इस समय।"
देव ने नज़दीक आकर कहा,
"दो अधूरे लोग ही मिलकर पूरे होते हैं।"
उसने महक का सिर अपने कांधे से लगा लिया।
ठंड और हवा से आग भी मंद पड़ने लगी थी। महक बुरी तरह कांप रही थी — उसे इतनी ठंड की आदत नहीं थी।
कार के पास पानी भर गया था। निकलना अब मुश्किल था।
शायद भगवान ने भी चाहा कि ये रात मंदिर में ही गुज़रे... ताकि दो अधूरे लोग... आज एक हो सकें।
अचानक बिजली कौंधी। महक डर गई और देव के सीने से लिपट गई।
उसे देव के दिल की धड़कन... ठीक वैसी ही लगी जैसे MTNL की घंटी — जिसे सुनकर कभी उसकी धड़कनें बढ़ जाया करती थीं।
मंदिर की घंटियाँ भी अब धीमे-धीमे बजने लगी थीं... जैसे ईश्वर भी इस मिलन की स्वीकृति दे रहे हों।
देव ने ठंड और डर से कांपती महक को कस कर पकड़ लिया।
"महक, तुमने 11 साल पहले एक सवाल पूछा था... जिसका जवाब मैं तब नहीं दे पाया।
क्या आज दे दूं?"
महक की आंखों में हल्की मुस्कान उभरी।
"नहीं... जवाब अब शादी के बाद दीजिएगा, देव जी।"
देव ने उसे गले से लगा लिया —
जैसे कह रहा हो, "अब तुम मुझसे कभी दूर मत जाना... वरना मैं मर जाऊंगा..."
महक के गालों पर आँसू थे... पर इस बार, वो आँसू थे — खुशी के।
.....to be continued