MTNL की घंटी - 19 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 19

हाल में सब कुछ शांत था। कार्यक्रम खत्म हो चुका था।
लोग धीरे-धीरे अपनी सीटों से उठ रहे थे, बातें कर रहे थे, किताबों पर चर्चा कर रहे थे।
लेकिन महक की नज़रें कुछ और ही खोज रही थीं…

तभी दौड़ती हुई परी आई —
“मम्मा!!! आपने कितना अच्छा बोला!”
फिर पीछे से माधव भी आया,
“मम्मा सबने ताली बजाई… आप स्टार हो गई हो!”

महक उन दोनों को देखकर हल्के से मुस्कराई, लेकिन आँखों में जो चमक थी वो आँसूओं से भीगी हुई थी।

उसने दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया।
जैसे इन दो मासूम दिलों के बीच खुद को छुपा लेना चाहती हो।

बच्चों ने कुछ नहीं पूछा, सिर्फ महक के गले से लिपटे रहे।

महक के आंसू चुपचाप उनकी पीठ पर गिरते रहे...
बिना शोर किए...
बस बहते रहे...


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थोड़ी देर बाद कुछ लेखक महक के पास आए —
उनमें से एक वरिष्ठ लेखिका थीं, उन्होंने हाथ थाम कर कहा —

“महक जी… आपके शब्दों में गहराई है।
आप सिर्फ लिखती नहीं, जीती हैं हर पंक्ति को।”

एक और लेखक ने कहा —
“आपकी किताब  ' MTNL की घंटी'
कि प्रेम कहानी दिल तो क्या रूह को भी छू गयी"

महक ने सिर झुका कर धन्यवाद दिया —
पर दिल में कुछ अनकहा सा फिर भी रह गया...


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रात को डिनर के बाद, महक बच्चों को सुला कर बाहर आई।
रिसोर्ट की खामोशी पहाड़ों की रात की तरह गहरी थी।
ठंडी हवा, दूर से आती झींगुरों की आवाज़… और भीतर उठती हलचल।

महक चुपचाप चल रही थी…
अपने ही ख्यालों में डूबी।

“देव ने मिलना क्यों नहीं चाहा?
मैंने 'नहीं' क्यों कहा?
क्या मैंने सही किया?”

हर सवाल उसके कदमों के साथ और भारी होता जा रहा था।
उसका रास्ता अब पेड़ों के पास से होते हुए एक पहाड़ी किनारे की ओर चला गया…

वो ठहर कर दूर झांकने लगी।
नीचे गहरी घाटी थी — काले अंधेरे में डूबी हुई।

महक का पैर एक फिसलती चट्टान पर पड़ा…
उसके संतुलन ने जवाब दे दिया।

उसका शरीर अचानक पीछे की ओर डगमगाया —
हवा तेज़ थी… पैर नीचे की ओर खिसकने लगे।

उसका हाथ किसी झाड़ी को थामना चाह रहा था…
पर कुछ पल के लिए…
वो बस गिरने लगी।


महक का शरीर अब पूरी तरह अपना संतुलन खो चुका था।
उसके पैर चट्टान से फिसले और वो पीछे की ओर झुकने लगी।

एक झटका...
एक चीख...
और उसी पल एक मज़बूत, गर्म हाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“महक!”

वो आवाज़…
वो छुअन…

उसके गिरते शरीर को किसी ने पूरी ताकत से थाम लिया।

महक डर और झटके के साथ उठी —
उसने कुछ नहीं सोचा, बस सीधा उस सीने से लिपट गई…
जिसमें एक धड़कता हुआ सुकून था… एक पहचानी हुई गर्माहट।

वो सीना...
वही अहसास...
जो उस बुखार भरी रात को भी था...
जब किसी ने उसके माथे पर पट्टियाँ रखीं थीं,
जब किसी ने चुपचाप उसका सिर सीने से लगाकर सुला दिया था।

“देव...”
महक ने कांपती आवाज़ में कहा।

देव ने अपनी बाहें उसके इर्द-गिर्द और कस दीं।

“महक...  अगर तुम मेरे हाथ से फिसल जाती तो… मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।”

महक का चेहरा उसके सीने में छुपा था, आँसू बिना इजाज़त बह रहे थे।
उसके होंठ कुछ कहना चाहते थे, पर आवाज़ रुक गई थी।

देव ने हलके से उसके बालों को सहलाते हुए कहा —

“उस रात मैं ही था... तुम्हारे कमरे में।
तुम्हारी हालत देखी नहीं गई मुझसे।
गौरव को खोने के बाद भी तुम टूटी नहीं थी,
पर उस अकेलेपन ने तुम्हें खामोश कर दिया था।

मैं जानता था...
तुम्हें अभी भी जवाब चाहिए।
और शायद मुझे भी।”

महक ने धीरे से खुद को देव की बाँहों से अलग किया।
उसकी आँखों में अब आंसू कम और सवाल ज़्यादा थे।

“तो इतने सालों तक... आप कहाँ थे?
एक चिट्ठी, एक कॉल, कुछ भी क्यों नहीं?”
महक की आवाज़ टूटी, पर उसमें शिकायत नहीं — बस अधूरापन था।
मुझें ना करते , अपने अंकल को ही कर लेते
कितने अकेले है वो
कितनी जिम्मेदारी आ गयी उनके सर पर"

देव ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में थामा।
“मैं डरता था…
दिल्ली शहर मे मैने माँ पापा खोये..अपना प्यार खोया...सब सह लेता पर अपनी ज़िंदगी. ..अपना कान्हा भी खो दिया....
वहां आ कर तुमसे मिल कर तुम्हे भी खो देता,"


महक की आँखें भर आईं।

“और आज?”
उसने पूछा।

देव मुस्कराया, उसकी पलकों को अपने अंगूठे से सहलाते हुए बोला:

“ तुम ने  ‘नहीं’ क्यो कहा…
तुम्हे क्यों लगा मै चुपचाप लौट जाउगा
मै तुम्हे पा नही सकता महक...
पर खोने से भी डरता हूँ "

और वो फिर से उसे अपनी बाहों में भर लेता है —
एक लंबा आलिंगन...
जिसमें 11 साल की दूरियाँ,
हज़ारों अधूरे शब्द,
और एक अनकहा प्रेम
सब समा जाते है हैं…

महक बाहों की गिरफ्त से निकल कर अंधेरे को चीरती हुई वापिस रूम की तरफ मुड़ जाती हैहै"                           __________
अगली सुबह. ...
सुबह का सूरज हल्के बादलों से झाँक रहा था।
पहाड़ों की हवा अब भी ठंडी थी, लेकिन महक के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी — जैसे कोई भारी बोझ रात की हवा में उतर गया हो।

कमरे के भीतर बच्चों की उदासी गूँज रही थी। परी अपने खिलौने समेट रही थी, और माधव माँ के ट्रॉली बैग की चेन बंद कर रहा था।

महक अलमारी के आखिरी खाने से अपनी डायरी निकालती है, उसे एक नज़र देखती है, फिर बैग में रख देती है।
वो ज़्यादा कुछ नहीं कहती, बस हर चीज़ को एक आदत भरे तरीके से समेट रही है…
जैसे कई बार समेटा है अपने आपको।

सब कुछ पैक कर लेने के बाद उसने कमरे की चाभी उठाई और बच्चों को लेकर रिसेप्शन की ओर चल पड़ी।
बच्चे भी बेमन से माँ के पीछे पीछे चल् रहे थे 


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रिसेप्शन पर

महक ने चुपचाप चाभी काउंटर पर रख दी।
रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुरा कर पूछा,
“मैम, कोई दिक्कत तो नहीं हुई? पर अभी आपकी बुकिंग दो दिन की और है और प्रोग्राम भी आप जा क्यों रही है"

महक ने धीमे स्वर में कहा,
“नहीं… सब कुछ बहुत अच्छा था। धन्यवाद। कुछ जरूरी काम है मुझें जाना है


रजिस्टर पर हस्ताक्षर करके, वो बच्चों के साथ बाहर की ओर बढ़ने ही वाली थी,
तभी रिसेप्शनिस्ट ने रिसॉर्ट फोन उठाकर कॉल मिलाई:

"मैम, महक शर्मा जी ने अभी चेकआउट किया है… जी हाँ… अभी-अभी।"

दूसरी तरफ से आवाज़:
"रुको…उन्हे रोको  हम आ रहे हैं।"


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कुछ ही देर बाद —

सुधा और आलोक हड़बड़ाते हुए रिसेप्शन की ओर आते हैं।
क्या महक रुकेगी?
उसके अचानक जाने की वजह क्या है ?
MTNL की घंटी