महक रिसेप्शन की ओर बढ़ ही रही थी कि पीछे से किसी ने सख़्त आवाज़ में पुकारा—
"महक!"
वो ठिठक गई। मुड़कर देखा तो सुधा और आलोक सामने खड़े थे।
सुधा की आँखों में गुस्सा था, और आलोक की आँखों में नाराज़गी।
"इतना बड़ा फ़ैसला अकेले कैसे ले सकती हो तुम?" सुधा की आवाज़ थरथरा रही थी।
महक ने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया।
आलोक चुपचाप खड़े रहे, पर उनकी ख़ामोशी बहुत कुछ कह रही थी।
सुधा ने इशारे से दोनों बच्चों को कमरे में भेज दिया।
बच्चे ख़ुश थे, उनके चेहरों पर एक सुकून था।
"थैंक्यू!" कहते हुए वो अंदर चले गए।
सुधा ने एक गहरी साँस ली, और महक से कहा,
"चलो, पहले एक कप चाय पीते हैं... बहुत कुछ कहना-बताना है।"
आलोक ने हामी भरी,
महक ने धीरे से अपना सामान वापस कमरे में भिजवा दिया।
तीनों एक साथ, कुछ अनकहे लफ़्ज़ों और बहुत सारे जज़्बातों के साथ, चाय की ओर बढ़ चले।
सुबह की धूप कुछ नरम सी थी। हल्की-हल्की हवा पेड़ों की पत्तियों को हौले से हिला रही थी। सुधा, आलोक और महक तीनों रिसोर्ट मे बने छोटे से गार्डन में बैठे थे।
टेबल पर गरमा-गरम अदरक वाली चाय रखी थी। कुछ देर तक सब चुप थे, बस चाय की चुस्कियों और पंछियों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।
थोड़ी देर बाद आलोक ने चुप्पी तोड़ी।
"महक तुम एक बार देव से मिल् लो "
महक की आँखों के सामने रात का देव से मिलना घूम गया पर वो चुप रही
"महक… तुम्हें एक बात बतानी थी… जो शायद जाननी तुम्हारे लिए ज़रूरी है…"
महक ने चौंक कर आलोक की तरफ देखा।
"देव... कान्हा के जाने के बाद टूट गया था। पर उसने खुद को किसी तरह संभाला... बच्चों के लिए।"
"बच्चों के लिए?" महक की आवाज़ भीग गई।
सुधा ने धीरे से जोड़ा,
"अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए…"
महक की आँखें अचानक भर आईं।
आलोक आगे बोले,
"उसने 'कान्हा' के नाम से एक संस्था बनाई… बच्चों की पढ़ाई, इलाज, और ज़रूरतों के लिए… धीरे-धीरे उस संस्था ने बहुत से बच्चों की मदद करना शुरू किया। लेकिन…"
वो रुक गया।
सुधा ने बात पूरी की,
"…पर तुम्हें कभी नहीं भुला सका महक। हर चुप्पी में, हर दान में, हर भजन में… तुम ही थी।
वो अकसर अकेले बैठकर 'यशोमती मैया से बोले नंदलाला' सुनता रहता था। आँखें मूँद कर, तुम्हारी कल्पना में डूबा रहता था।
तुम उसके साथ थी… एक एहसास बनकर।"
महक की आँखों से आँसू चुपचाप बहने लगे।
उसके हाथ की चाय की प्याली अब थमी हुई थी, लेकिन अंदर यादों का सैलाब बह रहा था।
"आपको ये सब कैसे पता?"
महक ने एक मुश्किल सवाल पूछ लिया।
आलोक मुस्कराए।
"महक… वो मेरा बचपन का दोस्त है। हर सुख-दुख हमने एक साथ बाँटे हैं।
उसका कुछ बोलना या कुछ ना बोलना… सब महसूस कर लेता हूँ मैं।"
गार्डन में अब हवा भी कुछ भारी लग रही थी। कुछ रिश्तों की खुशबू मिट्टी में मिल गई थी।
आलोक ने एक नई बात छेड़ी,
"महक, तुम जानती हो न वो संस्था… कान्हा फाउंडेशन. नाम का NGO… जिसे प्रकाश पब्लिकेशन हर साल चेक देता है?"
महक ने चुपचाप सिर हिलाया।
"वही NGO… देव की है। उसने ही शुरू की थी —'.कान्हा ' के नाम पर।"
महक के भीतर कुछ टूट गया, और कुछ जुड़ भी गया।
". आज शाम को NGO के बच्चों का स्टेज पर परफॉर्मेंस है… उसके बाद लेखकों को सम्मानित किया जाएगा… और चेक बांटे जाएंगे।"
सुधा ने नर्मी से कहा।
आलोक ने धीरे से जोड़ा,
"…और चीफ गेस्ट… देव है।
शाम का प्रोग्राम उनकी ,NGO की टीम आर्गेनाईज कर रही है
महक का चेहरा सफेद पड़ गया।
शब्द गले में अटक गए।
उसका मन भागना चाहता था… लेकिन किस्मत उसे बार-बार वहीं ला खड़ा करती थी।
कुछ देर की चुप्पी के बाद महक ने एक सधा, लेकिन टूटा हुआ सवाल पूछा:
"सुधा जी… आलोक जी… जो आज इनाम की राशि मुझे मिलने वाली है… क्या ये भी देव जी की सिफारिश पर है?"
सुधा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं महक, बिल्कुल नहीं। प्रकाश पब्लिकेशन किसी की सिफारिश नहीं मानता।
यह अवार्ड तुम्हें इसलिए मिल रहा है क्योंकि तुमने मोस्ट सेलिंग बुक लिखी है।
ये तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी कल्पना, तुम्हारी कलम का फल है… तुम्हारी खुद की अचीवमेंट है किसी की कृपा नहीं।"
महक की आँखों में एक आत्मविश्वास की नमी चमक उठी।
पर आलोक कुछ और कहना चाहते थे,
" एक बात और है जो तुम्हें जाननी चाहिए… देव और तुम्हारे बारे में—"
सुधा उठ खड़ी हुई, मुस्कराई,
"गुप्ता जी, चलिए… बहुत देर हो रही है। शाम का कार्यक्रम भी देखना है।
और बातें… वो तो ख़त्म ही नहीं होंगी।"
फिर हँसते हुए कहा,
"महक… गुप्ता जी तो देव की चंद्रमुखी हैं… कहीं तुम्हें पारो ना बना दें!"
सब हँस पड़े — आलोक भी, महक भी।
हँसी में जैसे बरसों का बोझ हल्का हो गया।
सुधा ने महक के कंधे पर हाथ रखा और स्नेह से कहा,
"महक, जल्दी जाओ… बच्चों को तैयार करो, उन्हें लंच कराओ। और खुद भी तैयार हो जाओ।
आज तुम्हारा दिन है। आज सब भूलकर सिर्फ अपने लिए जीकर देखो।
आज तुम्हें पुरस्कार मिलेगा, सर्टिफिकेट मिलेगा… और सबसे बड़ी बात — तुम्हारी पहचान मिलेगी।"
महक की आँखों में एक चमक आ गई…
ऐसा लगा जैसे किसी ओनर ने नहीं, किसी बड़ी बहन ने उसको समझाया हों
"महक… तुम सच में बहुत प्यारी हो।"
सुधा जाते-जाते कह गई।
"क्या मैं आपको दीदी कह सकती हूँ?"
महक ने धीमे से पूछा।
जवाब देने से पहले ही आलोक बीच में बोल पड़े,
"नहीं, नहीं… बिल्कुल नहीं! मुझे सिर्फ सुधा बोलो… सिर्फ सुधा!"
तीनों ज़ोर से हँसने लगे।
फिर आलोक ने महक के सिर पर हाथ रखा और कहा,
"और महक… तुम आज से मुझे ‘मिस्टर गुप्ता’ या ‘आलोक सर’ नहीं… भइया कहोगी।"
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कभी-कभी जिंदगी हमें वो रिश्ते दे देती है,
जिन्हें हम खोज नहीं रहे होते… पर जिनकी हमें सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
जैसे महक को मिला…
एक दीदी…
एक भइया…
और शायद…
एक अधूरी मोहब्बत की मुकम्मल तस्वीर… देव।
MTNL की घंटी
.....to be continued