MTNL की घंटी - 30 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 30

दिल्ली से देहरादून का सफ़र मानो किसी फ़िल्म का धीमा-सा खूबसूरत गीत बन गया था।
रास्ते भर परी अपने छोटे हाथों से गिटार की तारें छेड़ती रही—
कभी सुर सही लगते, कभी उलझ जाते,
लेकिन उन अधूरे सुरों में भी एक मीठा सा सुकून था।

आलोक मुस्कुराकर बोला,
"परी, यह गिटार तो देव का है… और यह मेरे बेटे प्रकाश का भी favourite था।"
थोड़ी देर ठहरकर उसने जोड़ दिया,
"वो MBBS  पढ़ाई के लिए  London  गया है, पर जल्दी ही वापिस लौट आएगा अपनी पढ़ाई पूरी करके।

सुधा ने मुस्कुराकर कहा,
"प्रकाश को देव से इतना लगाव है कि वो हमारे साथ कम, देहरादून ज़्यादा रहता है।
कहता है—देव से बातें किए बिना उसे चैन ही नहीं आता।"

गाड़ी के शीशे के बाहर पहाड़ों की लहरदार सड़कें और पेड़ों के बीच से झांकती धूप
सब मिलकर उस सफ़र को और भी यादगार बना रही थीं।
हर मोड़ पर हवा में देव की हँसी और आँगन की चाय की ख़ुशबू जैसे साथ चल रही थी ।

महक चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी—
दूर तक फैली पहाड़ों की कतारें,
और कहीं नज़र के कोने में…
देव का चेहरा जैसे बादलों के पीछे से झांकता हुआ।
हर मोड़ पर हवा में उसके शब्द, उसकी हँसी गूँजती—
"अभी तो सिर्फ तुमसे प्यार हो रहा है…"
महक ने अपनी हथेलियों में छुपाकर एक लंबी साँस ली,
मानो उस साँस के साथ देव की मौजूदगी भी कैद कर लेना चाहती हो।

दिल्ली की भीड़भाड़, हॉर्न की आवाज़ें, और घर के अंदर का शोर—
सब कुछ वही था, जैसे वो छोड़कर गई थी।
पर महक के अंदर कुछ बदल चुका था…
जैसे उसकी आधी रूह वहीं देहरादून की गलियों में, देव की देहरी पर खड़ी हो।

रात को बालकनी में खड़ी होकर उसने आसमान की तरफ देखा—
चाँद वही था, बस जगह बदल गई थी।
महक ने धीमे से फुसफुसाया,
"देव, यहाँ भी चाँद दूधिया सफ़ेद है… पर तुम्हारे बिना इसकी रोशनी फीकी लग रही है।"

नीचे सड़क पर गाड़ियाँ भाग रही थीं,
पर महक को ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर की घड़ी थम गई हो—
वो दिन वहीं रुक गया हो जब उसने फूलों की क्यारी से दौड़कर
देव को गले लगाया था।

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छुट्टियाँ ख़त्म हो चुकी थीं।
महक ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखते हुए अपने छात्रों को समझा रही थी,
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

पीऑन ने झांककर कहा,
“मैडम जी, आपसे मिलने कोई आया है।”

महक ने पलटकर पूछा,
“मुझसे? कौन आया है?”

पीऑन ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया,
“कोई मैडम हैं… नाम तो नहीं बताया।”

महक के मन में ख़याल आया—
शायद सुधा जी होंगी।
वो हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“ठीक है… पाँच मिनट में आती हूँ।”
महक ने ब्लैकबोर्ड पर आख़िरी सवाल लिखते हुए बच्चों से कहा,
"जब तक मैं आती हूँ, ये हल करना…"

चॉक से भरे हाथ को झाड़ते हुए वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
कॉरिडोर में हल्की ठंडी हवा थी,
लेकिन दिल में अजीब-सी बेचैनी उठ रही थी—
"सुधा जी होंगी… बिना बताए यहाँ क्यों आ गईं?"

महक स्टाफ़ रूम की ओर बढ़ी,
नज़र सामने खड़ी एक औरत पर टिक गई।

उसने पैंट-शर्ट पहन रखी थी,
कद लंबा, बॉय कट बाल, चेहरा बिल्कुल गोरा…
लेकिन उस गोरेपन में एक अजीब सी थकान और पीलापन झलक रहा था।
आँखों के नीचे हल्के गहरे पड़ गए थे,
मानो कोई पुरानी बीमारी ने शरीर को भीतर तक चूस लिया हो।

महक की भौंहें सिकुड़ गईं—
चेहरे में कुछ तो जाना-पहचाना था,
पर वो जैसे यादों की धुंध में छुपा हुआ था।

ये… कौन हो सकती है?

महक ने हल्की, लेकिन काँपती हुई आवाज़ में पूछा—
“आप… कौन? मैंने पहचाना नहीं।”

वो औरत कुछ पल खामोश रही, फिर बिना पलक झपकाए बोली—
“सोनिया… देव की पत्नी।”

महक के कानों में जैसे किसी ने बम फोड़ दिया हो।
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई…
आँखों के आगे धुंध छा गई…
दिल की धड़कन बेकाबू हो गई…

उसे लगा, जैसे पूरा कमरा घूमने लगा हो।
कुर्सी का सहारा न लिया होता तो शायद वो वहीं गिर पड़ती।
ये सच सुनना उसके लिए वैसा ही था
जैसे भूकंप अचानक सब कुछ तोड़कर चला जाए
और पीछे सिर्फ खंडहर छोड़ दे।

हमेशा की तरह, अपनी आदत के मुताबिक, सोनिया ने बिना किसी भूमिका या औपचारिकता के सीधा मुद्दे पर आकर कहा—

“मुझे ब्लड कैंसर है… और शायद मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं बचा। मैं अपना आख़िरी समय देव के साथ बिताना चाहती हूँ। लेकिन…” वह एक पल रुकी, होंठ भींचे, “देव ने मुझसे मिलना तो दूर… बात करने तक से इंकार कर दिया है।”

उसकी आँखों में न आँसू थे, न कोई शर्म—बस एक ठंडी, हिसाबी नज़रों की परत।
“तुम… कुछ कर सकती हो?” उसने लगभग आदेश देने वाले अंदाज़ में कहा, जैसे महक के  लिए वो कोई ज़िम्मेदारी हो।

महक का दिल भारी हो गया।
एक तरफ देव की नाराज़गी इस औरत के लिये और अतीत के ज़ख्म…
दूसरी तरफ यह औरत, जो मौत के मुहाने पर खड़ी थी।
वो समझ नहीं पा रही थी, ये हमदर्दी का मामला है या फिर सोनिया की पुरानी चालाकी का कोई नया रूप।
महक ने गहरी सांस लेकर, खुद को संभालते हुए पूछा,
“मैं… मैं क्या कर सकती हूँ?”

सोनिया ने ठंडे स्वर में कहा,
“तुम देव से बात करो। बस इतना ही चाहिए मुझे।”

महक के सीने में हल्की सिहरन दौड़ गई, फिर भी उसने धीमे से कहा,
“देव जी… ने तो साफ मना कर दिया तो..?"

सोनिया हल्के से मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान थकी हुई और खोखली थी,
“वो तुम्हें सुनेंगे… क्योंकि वो तुमसे प्यार करता है।”

ये सुनकर महक का दिल जैसे एक पल को थम गया।
सोनिया के शब्दों में न तो जलन थी, न कोई तीखा व्यंग्य—बस एक अजीब-सी स्वीकारोक्ति,
जो महक को और उलझा रही थी।

महक ने साफ़ शब्दों में कहा,
“नहीं… मैं देव जी से तुम्हारी बात नहीं करूंगी।”

उसकी आंखों में अब एक अजीब-सी दृढ़ता थी।
शायद ज़िंदगी में पहली बार वो थोड़ा मतलबी बन रही थी—
अपने लिए नहीं… बल्कि उन मासूम बच्चों के लिए,
जिन्हें उसने इतने सालों बाद खिलखिलाते और बेफिक्र देखा था।
अपने ताया जी ताई जी के लिए जो बूढ़ी आँखों से जाने कितने सपने देख रही थी।

उसके दिल में सवाल गूंज रहा था—
“कोई कैसे अचानक आकर… उनकी ये नन्ही-सी दुनिया, उनकी हंसी, उनकी शांति छीन सकता है?”
महक ने नज़रें फेर लीं, ताकि उसके चेहरे पर लिखा फैसला कोई पढ़ न सके।

कुछ फैसले इंसान के हाथ में नहीं होते…

रात को देव का फोन आया।
“महक, मैं इसी चबूतरे पर बैठा हूं… जहाँ उस दिन तुम मेरे साथ बैठी थी। लगता है तुम आस-पास ही हो।”

“जी…” महक ने धीमे स्वर में जवाब दिया।

“तुम्हारी आवाज़ में आज उदासी क्यों है?”
“नहीं… बस आपसे मिलने का मन है।”

“कल आ जाओ, मैं गाड़ी और ड्राइवर भेज दूँगा।”
“ठीक है।”
“बच्चों को भी ले आना।”
“नहीं… अकेली आऊँगी।”

“ठीक है… पर सफ़ेद साड़ी पहनकर आना, गुलाबी फूलों वाली… बहुत अच्छी लगती  है तुम पर।”

महक ने सोचा—इतनी बातें कैसे आ रही हैं इस चुपचाप रहने वाले देव जी के दिल से?
देव ने खुद ही जवाब दे दिया—
“लेखिका जी…  आप   ज़िंदगी में आ रही है, खुश हूं… बहुत खुश।”

महक ने धीमे से कहा—
“बस… खुशी को नज़र लग जाती है।”

देव आसमान की ओर देखते हुए बोला—
“आज भी चाँद कितना खूबसूरत है, महक।”
“देव जी… हर पूर्णिमा की रात को चाँद देखना… मैं भी देखा करूंगी।”
“नहीं… मैं सिर्फ तुम्हें देखूंगा।”

देव की हल्की हंसी ने महक के चेहरे पर मुस्कान ला दी…
पर उस रात महक नहीं सोई।
एक मुश्किल फैसला… जो कल उसे लेना था।

देव भी उस रात नहीं सो पाया था…
बस एक ही ख्याल, एक ही इंतज़ार—अपनी महक का।

सुबह होते ही उसने फूलों की क्यारी वाले रास्ते पर गुलाबी पंखुड़ियाँ बिखेर दीं… जैसे हर कदम महक के लिए स्वागत का संदेश हो।
वो आज अलग ही खुश था… बेहद खुश।

दोपहर को NGO के बाहर गाड़ी आकर रुकी।
देव हमेशा की तरह दहलीज़ पर खड़ा था, नज़रें बस उसी का इंतज़ार कर रही थीं।

महक काली साड़ी में थी , बाल खुले थे…   जैसे काले घने बादलो मे से उदास चांद  मासूमियत से अपने महबूब को देख रहा हो।
उसके हर धीमे कदम के साथ देव का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
महक  देव के पास आकर रुक गयी ,उसका हाथ पकड़ कर अपने गाल से चिपका लिया और अपनी आंखे बंद कर ली जैसे वो इस स्पर्श को पूरी जिंदगी समेंट कर रखना चाहती हो ।
देव को कुछ समझ नही आ रहा था उसके चेहरे का रंग उड़ने लगा ...
महक ने देव की हथेली को चूम लिया फिर उसका हाथ अपने गाल से हटा दिया।
देव की घबराहट बढ़ रही थी की अचानक गाडी का दरवाजा खुला और  सोनिया को देखा जो सफेद साड़ी  पहने थी गुलाबी फूलो वाली।
दुनिया मे जितने  भी गुस्से के भाव है सब देव के चेहरे पर आ गये...
वो भाव सोनिया के लिए नही ,महक के लिए थे।
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देव की सोनिया को लेकर क्या प्रतिकिर्या होगी?
देव और   महक की ज़िंदगी क्या मोड लेगी सोनिया के आ जाने के बाद?
.......to be continued