दिल्ली की सर्दी में कमरे की गरमाहट और गाजर के हलवे की खुशबू जैसे किसी को बचपन की मीठी यादों में ले जाए।
महक ने एप्रन उतारते हुए जल्दी-जल्दी हाथ धोए और दरवाज़े की ओर भागी।
नीचे से ताया जी की आवाज आई —
"महक, देखो तुमसे मिलने कौन आया है!"
महक की धड़कन अनजाने से उत्साह में तेज़ हो गई।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने आलोक और सुधा जी खड़े थे।
सर्द हवा में भी सुधा जी की आँखों में अपनापन और गर्मजोशी थी।
महक को देखते ही उन्होंने उसे कसकर गले से लगा लिया,
मानो बरसों का कोई इंतज़ार आज पूरा हो गया हो। महक कोई इंसान नही उनके भाई जैसे देवर की खुशियों का खजाना हो।
महक की आँखें भी भीग आईं,
पर होठों पर एक हल्की, सुकूनभरी मुस्कान तैर गई।
महक जल्दी से चाय और गरमागरम पकोड़े लेकर आ गई।
सुधा ने कप उठाकर एक घूंट लिया और मुस्कुराते हुए बोली,
"महक, तुम और बच्चे हमारे साथ देहरादून चलो। वहां का मौसम भी अच्छा है, बच्चे भी देव से घुल-मिल जाएंगे… और तुम भी देव के NGO को घर बना देना ।"
महक ने चुपचाप उनकी बात सुनी, जैसे मन ही मन कुछ सोच रही हो, और बच्चों की ओर देख कर हल्का सा मुस्कुरा दी।
ताया जी और तायी जी ने भी मुस्कुराकर जाने की इजाज़त दे दी।
बच्चों की खुशी तो जैसे आसमान छू रही थी — उछलते-कूदते वे अपने-अपने छोटे-छोटे बैग पैक करने लगे।
महक ने भी जल्दी-जल्दी ज़रूरी सामान समेटा, और कुछ ही घंटों में सब गाड़ी में सवार हो गए।
गाड़ी शहर की भीड़ से निकलकर देहरादून की हरी-भरी वादियों की ओर बढ़ रही थी…
ठंडी हवा, पहाड़ों की खुशबू और आसमान में तैरते बादल — सब जैसे कह रहे हों,
"आओ… तुम्हारा इंतज़ार यहीं था, खुशियों के इस नए सफ़र में।"
आलोक ने गाड़ी देव के NGO के बाहर आकर रोकी।
गेट से अंदर जाने तक का रास्ता जैसे किसी सपने की गलियों से होकर गुजर रहा हो — दोनों तरफ गुलाब के फूलों की सजी-संवरी क्यारियां, जो हवा के हल्के झोंकों में लहराकर मानो महक के आने का स्वागत कर रही थीं।
पूरा वातावरण गुलाबों की ख़ुशबू से सराबोर था, और उस खुशबू में एक अजीब सी मिठास घुली हुई थी।
बच्चे हँसते-खिलखिलाते देव की ओर भाग गए, और देव ने झुककर उन्हें बाँहों में भर लिया।
महक धीमे-धीमे, संकोच भरे कदमों से आगे बढ़ रही थी।
उसकी आँखों में हल्की नमी के साथ एक गहरी चमक थी — जैसे किसी ने उसके दिल के बंद दरवाज़े पर धीरे से दस्तक दी हो।
धीमे से, लगभग फुसफुसाते हुए महक ने कहा,
"कैसे हो देव जी…?
तुम्हारे बिना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता।"
देव ने उसकी बात सुनकर बस हल्की सी मुस्कान दी, जैसे शब्दों की बजाय आँखों से जवाब देना चाहता हो।
तभी पीछे से आलोक और सुधा की हँसी और कदमों की आहट आई।
दोनों पास आकर बोले,
"अरे, आप लोग तो यहीं रुक गए, अंदर चलो… सब इंतज़ार कर रहे हैं।"
महक ने नज़र झुका ली, और देव ने बच्चों का हाथ थामे सबको अंदर की ओर बढ़ा दिया।
सारा दिन हँसी-मज़ाक, खाने-पीने और ढेरों बातों में यूँ ही कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
माधव और परी तो जैसे देव के नए छोटे साथी बन गए थे — कभी गार्डन में दौड़ते, कभी ऑफिस के अंदर बैठकर चित्र बनाते।
शाम होते-होते देव ने माधव का हाथ पकड़ा और बोला,
"चलो, कुछ साथ में लगाते हैं, ताकि ये हमेशा यहीं रहे।"
देव मुस्कुराए और देव ,परी और माधव तीनो ने मिलकर NGO के गार्डन में एक नन्हा आम का पेड़ लगाया।
माधव की छोटी छोटी हथेलियों में मिट्टी लगी हुई थी और आँखों में चमक — जैसे उसे पता हो कि ये पेड़ सिर्फ फल ही नहीं, बल्कि इस दिन की याद भी सँजोए रखेगा।
परी की नज़र दीवार पर टंगे पुराने गिटार पर पड़ी।
वो धीरे से देव के पास जाकर पूछ बैठी,
"ये किसका है?"
देव ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
"ये मेरा था… कभी-कभी बजाया करता था, लेकिन अब नहीं… हिम्मत नहीं होती।"
परी ने मासूमियत से आग्रह किया,
"प्लीज़, एक बार बजाकर तो दिखाइए।"
जब सबने भी साथ में कहा, तो देव ने गहरी सांस ली, गिटार उठाया, और धीमे-धीमे उंगलियों से एक धुन छेड़ दी —
"तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी… हैरान हूँ मैं…"
पूरा माहौल जैसे एक पल के लिए थम गया। धुन खत्म होते ही सबने जोरदार तालियां बजाईं,
और देव ने आंखों में आए नमी के कतरे चुपके से पोंछ लिए।
परी की जिद पर देव ने उसे गिटार के कुछ बेसिक नोट्स सिखाए,
और फिर मुस्कुराते हुए कहा,
"ये अब तुम्हारा है,"
गिटार परी को गिफ्ट कर दिया।
परी की खुशी देखते ही बन रही थी — जैसे उसे कोई खज़ाना मिल गया हो।
परी ने खुशी से गिटार को सीने से लगाया और चमकती आंखों के साथ बोली,
"थैंक यू, पापा! मैं आज से आपको हमेशा पापा ही कहूँगी।"
महक ने यह सुना तो उसके दिल में जैसे एक मीठी सी लहर दौड़ गई।
मन में उठ रहे अनगिनत सवालों के जवाब उसे मिल गए — अब उसे तसल्ली हो गई थी कि बच्चे देव को बहुत जल्दी अपना लेंगे।
उधर, रसोई से आती खुशबू सबको खाने की याद दिलाने लगी।
महक और सुधा ने जल्दी से मेज़ पर खाना सजा दिया,
और हंसी-खुशी के बीच सब साथ बैठकर खाने लगे — जैसे ये घर, ये रिश्ते, और ये पल हमेशा से ऐसे ही थे।
काफी रात हो चुकी थी
सुधा और आलोक अपने कमरे में चले गए,
लेकिन बच्चे तो जैसे देव से चिपक ही गए थे — कभी गिटार बजाने को कहते, कभी कोई कहानी सुनाने की ज़िद करते।
देव भी मुस्कुराते हुए उनकी बातों में खोए रहे।
महक चुपचाप बाहर आ गई।
थोड़ा ऊँचे स्थान पर बने पत्थर के चबूतरे पर बैठ गई और धीमे-धीमे कुछ गुनगुनाने लगी।
ठंडी हवा उसके लहराते बालों से खेल रही थी।
आसमान में पूर्णिमा का चाँद था — इतना चमकीला कि पूरा आँगन, पूरा बगीचा, और मानो महक का पूरा अस्तित्व उसकी रौशनी में नहा गया हो।
उस पल में, शांति और संगीत एक-दूसरे में घुलकर जादू रच रहे थे।
....to be continued