MTNL की घंटी - 12 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 12

जब आँख खुली… तो अस्पताल का सफेद कमरा था…
ताई जी और सास दोनों उसके पास बैठे थे।
चेहरे पर चिंता भी थी… और कुछ उम्मीद भी।

और तभी डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा —

"बधाई हो… महक… तुम माँ बनने वाली हो!"
,सास खुशी खुशी बोली..."मंदिर की चौखट पर बैठी थी ना  तुम ..तो खुद भगवान आने वाले है हमारे घर...कृष्ण भगवान आने वाले है"

महक की आँखों से आँसू बह निकले…
पर इस बार वो आँसू सिर्फ दुःख के नहीं थे…

ये प्रार्थना मे किये गये प्रश्नो का उतर् था...…
उतर था......" कान्हा"

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मार्च का आखिरी हफ्ता था...
सर्दियाँ विदा ले रही थीं, पर उनकी ठंडी यादें अभी भी हवा में थीं। शाम कुछ खास थी — हल्की ठंडी हवा के झोंके बार-बार ड्राइंग रूम की खिड़की से अंदर आते और महक के गालों को छूकर यूं निकल जाते जैसे कोई भूली-बिसरी याद अचानक दिल को छू जाए।

घर लगभग खाली था। परी सास और ताई जी के साथ पार्क गई थी। ताया जी और गौरव ऑफिस में व्यस्त थे।
महक अकेली थी… पर मन भरा हुआ था — देव जी से बात करने की इच्छा से... काश एक बार देव जी से बात हों जाए 

सुबह से ही एक बेचैनी ने उसे जकड़ रखा था। बार-बार मन में देव जी की छवि उभरती, और फिर खुद-ब-खुद आंखें भीग जातीं।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था… लेकिन दिल कह रहा था —
"आज उनका फोन आएगा… शायद एक आखिरी बार।"

📞 ट्रिन ट्रिन
महक का दिल उछल गया। उसने लपक कर रिसीवर उठाया।

"हेलो?"
नही....…रोंग नंबर।

काश…
"काश देव जी एक बार फोन कर लें… बस एक बार।"
वो जानती थी कि उसे उन्हें भूल जाना चाहिए, पर एक बात… बस एक आख़िरी बात करनी थी।
मानो सदियों से दिल में जमी कोई बात अब बाहर आना चाहती थी।

📞 ट्रिन ट्रिन… ट्रिन ट्रिन
महक का दिल धक-धक करने लगा।
उसने कांपते हाथों से फोन उठाया —
"हेलो… हेलो, कौन?"

कुछ नहीं…
केवल चुप्पी…
सिर्फ साँसों की धीमी सी आवाज़…

महक की आंखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा —
"देव जी… आप?"

चुप्पी की गहराई से एक टूटी हुई, भारी आवाज़ आई…

"महक..."
देव की आवाज़ जैसे किसी टूटी हुई बांसुरी से निकली हो। बस एक शब्द… और महक जोर से रोने लगी।

"नहीं… रोना नहीं… चुप… बिल्कुल चुप…"
देव ने जैसे महक  को संभालते हुए कहा।
महक के आँसू थम नहीं रहे थे।
"देव जी… आप कैसे हैं?… कान्हा क्यों चला गया?… कैसे रहेंगे उसके बिना?"

फोन के उस पार एक लंबा सन्नाटा था। फिर देव की टूटी हुई आवाज़ आई —
" पता नही मै कैसा हू , बस इतना बहुत है की जिन्दा हूं अब तक.....रही बात कानहा की तो अच्छा हुआ जो वो भगवान के पास चला गया… ....."
"ऐसा ना कहे...आप का दर्द मै समझ सकती हूँ " महक ने कहा
देव ने बात जारी रखते हुए कहा....
"जब उसे दौरे आते थे तो वो तड़पता था… और मैं... मैं पूरी रात उसे गोद में लिए बैठा रहता था… सोचता था — क्या गलती की थी मैंने?
कोसता था उस पल को जब सोनिया से बच्चे की भीख मांगी... क्यों सोनिया से बच्चे की भीख मांगी थी मैने?"

देव की आवाज़ कांपने लगी —
"वो दवा खा कर सो जाता था… पर मैं… मैं पूरी रात नहीं सोता था। हर रात उसकी हर साँस को गिनता था।
काश… उसकी माँ हमारे साथ होती… तो शायद उसका दर्द थोड़ा बाँट लेती… और मेरा भी।"

महक की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
देव आगे बोले —
"लेकिन जिस दिन तुमने उसे भजन सुनाया था… महक… उस दिन पहली बार उसके चेहरे पर सुकून देखा था।
लगा जैसे… माँ होती है तो शायद ऐसी होती है… जो बच्चे का दर्द अपनी आवाज़ से छीन लेती है।
मेरी माँ तो कभी थी ही नहीं… और कान्हा की माँ होकर भी…  माँ नहीं थी।"

देव की साँसें थरथरा उठीं —
"पर … अब मेरा कान्हा एक सच्ची माँ की कोख में   पहुँच गया है… जो उसे बेइंतहा प्यार देगी।"

महक का दिल अंदर से चीख उठा।
"आप कैसे रहेंगे उसके बिना…?" उसने धीमे से पूछा।

"मैं सब छोड़कर देहरादून जा रहा हूँ…"
" देहरादून? ??..." महक ने पूछा
" हा....वही जाऊंगा...दिल्ली ने मुझसे बहुत कुछ ले लिया है..गर जिंदा रहा तो वही रहूंगा"
देव का स्वर स्थिर था… जैसे सारे दर्द को समेट कर पत्थर बना हो।

फिर एक सन्नाटा… इतना गहरा कि जैसे वक़्त थम गया हो।
उस खामोशी में दो दिल, दो इन्सान… ना जाने कितनी बातें कर गये।
कुछ देर बाद देव ने धीरे से पूछा —
"तुम मुझसे मिलने पोस्ट ऑफिस क्यों आई थी?… वो पत्र… लिखने की वजह?"

महक ने एक लंबी साँस ली —
"मुझे नहीं पता… बस आपसे मिलने की जिद वहाँ ले गई।
मैं खुद समझ नहीं पाई… क्यों आपसे जुड़ाव महसूस करने लगी थी।"

देव मुस्कराया… लेकिन आवाज़ अब भी भारी थी —
"देख लिया था उस दिन… तुम्हारी बेचैनी… उस रोंग नंबर को लेकर।"
"मै आपसे ही बात करना चाहती थी.." महक ने बहुत धीमी आवाज मे कहा

"मुझे आपसे पुछ्ना था की… आप फोन क्यों करते थे मुझे?"
महक की आवाज़ में गहराती जिज्ञासा थी। कितनी मुश्किल से जुबान से यह प्रशन पूछ सकी

"मैंने कभी तुम्हें फोन नहीं किया…महक"
देव ने शांत स्वर में जवाब दिया।
"मैं तो अपने एकाउंटेंट… यानी ताया जी को फोन करता था।
तुम मेरी पूरी बात सुनती ही कहाँ थी…मेरे कुछ पूछने से पहले ही तुरंत बोल देती — 'ताया जी नहीं हैं ...' ताया जी सो  रहे है — मेरे पूछने के लिए कुछ बचता ही नही था 
मैं कुछ पूछ ही नहीं पाता था…"

महक का दिल जैसे ज़ोर से धड़क उठा।
उसका विश्वास डगमगाने लगा —
मन ही मन मे सोचने लगी
तो… वो सारे कॉल… संयोग थे?
वो फोन मेरे लिए कभी थे ही नही
या..देव जी झूठ बोल रहे है
टूटे हुए दिल को संभाल कर पूछा" आज भी आपने ताया जी से बात करने के लिए फोन किया है?"

"झूठ नही बोलूँगा मै ....आज से पहले कभी तुम्हारे लिए 
फोन नही किया...पर आज पहली बार...तुम्हारे लिए ..सिर्फ तुम्हारे लिए फोन किया है...." देव के मुँह से एक एक लफ़्ज़ नपा तुला सा था...
महक के पास कोई न कोई सवाल बचा ना कोई जवाब...
आगे क्या रास्ता चुनेगा देव ??
...to be continued 
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