जंगल का रास्ता खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। रितांश और सिद्धिदात्री लगातार आगे बढ़ रहे थे। कभी पहाड़ी रास्ते...कभी गहरी घाटियाँ...कभी घने पेड़ों का अंधेरा। लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही था कृष्णा अग्निहोत्री को ढूँढना।
चलते-चलते सिद्धिदात्री बोली—
तुम्हें सच में लगता है कि तुम्हारे पापा जीवित होंगे?
रितांश कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
पता नहीं। लेकिन दिल कहता है कि वो कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
सिद्धिदात्री ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर दृढ़ विश्वास था।
ऐसा विश्वास जो वर्षों के इंतज़ार से पैदा हुआ था।
🏠 दूसरी ओर उसी समय...घर में राधा बेचैन होकर कमरे में टहल रही थी। रितांशी बार-बार उसे देख रही थी। उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि उसकी माँ के साथ क्या हो रहा है। आईने में अब भी वही युवा चेहरा दिखाई दे रहा था। वही चेहरा...जो 16 साल पहले का था। राधा ने अपने हाथों को देखा।
फिर धीरे से बोली—
मैं जवान कैसे हो सकती हूँ...?
ये कोई सपना है क्या?
उसे अपने ही प्रतिबिंब से डर लगने लगा था। उसके मन में अजीब-अजीब यादें उभर रही थीं। कुछ चेहरे...कुछ आवाज़ें...
कुछ ऐसे पल...जो उसने कभी जिए ही नहीं थे। या शायद...जिए थे...लेकिन भूल चुकी थी। अचानक उसके मन में एक नाम गूँजा।
"सिद्धिका..."
राधा ने सिर पकड़ लिया।
वो बोली -
ये नाम मुझे इतना अपना क्यों लगता है?
रितांशी घबरा गई।
बोली -
माँ, आप ठीक तो हैं?
राधा ने खुद को संभालने की कोशिश की। लेकिन उसके दिल में एक अजीब खालीपन था। जैसे कोई बहुत प्रिय व्यक्ति उससे दूर हो।
उधर...हिमालय की ऊँचाइयों पर। कृष्णा अग्निहोत्री चट्टान के किनारे खड़ा था। ठंडी हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। उसने आँखें बंद कीं। और उसी क्षण...उसे राधा की बेचैनी महसूस हुई।
उसका चेहरा गंभीर हो गया।
वो फुसफुसाया -
सिद्धिका...तुम्हारी स्मृतियाँ लौटने लगी हैं।
वह जानता था समय का रहस्य अब अधिक देर तक छिपा नहीं रहेगा। यदि राधा को सब याद आ गया...तो वर्षों से दबे हुए सच भी सामने आ जाएंगे। और शायद...वह दिन भी आ जाएगा...जब पूरा परिवार फिर से एक साथ होगा।
उसी समय...अंधकार के महल में शैतानों का राजा क्रोधित बैठा था। उसके सामने तीन नाम चमक रहे थे रितांश, सिद्धिदात्री और
कृष्णा अग्निहोत्री।
उसने धीरे से कहा—
यदि ये तीनों मिल गए...तो भविष्यवाणी को रोकना असंभव हो जाएगा।
उसकी लाल आँखें चमक उठीं।
वो बोला -
उन्हें हिमालय पहुँचने से पहले रोकना होगा।
और उसी क्षण...जंगल के आगे के रास्ते में...कुछ बहुत शक्तिशाली जाग चुका था। जो रितांश और सिद्धिदात्री का इंतज़ार कर रहा था।
रात फिर से जंगल पर उतर आई थी। चारों तरफ घना अंधेरा फैल चुका था। ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच से चाँद की हल्की रोशनी जमीन पर पड़ रही थी। पूरे दिन लगातार चलने के बाद...सिद्धिदात्री अब पूरी तरह थक चुकी थी। उसके कदम लड़खड़ाने लगे थे आखिरकार वह एक बड़े पत्थर के पास बैठ गई।
वो बोली -
मुझसे अब और नहीं चला जाएगा...
रितांश भी उसके पास बैठ गया। वह खुद भी थका हुआ था, लेकिन चेहरे पर जाहिर नहीं होने दे रहा था। कुछ देर दोनों चुपचाप बैठे रहे। सिर्फ रात के कीड़ों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।तभी...सिद्धिदात्री धीरे-धीरे खिसककर उसके करीब आ गई। और बिना कुछ कहे अपना सिर रितांश के सीने पर टिका दिया। रितांश एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया। यह एहसास उसके लिए अब भी नया था। सिद्धिदात्री ने आँखें बंद कर लीं। उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।
कुछ क्षण बाद वह धीमी आवाज़ में बोली—
पता नहीं क्यों...
वह थोड़ा रुकी।
फिर बोली -
लेकिन मुझे तुम्हारी बाहों में सुकून मिलने लगा है।
रितांश ने उसकी ओर देखा। चाँदनी में उसका चेहरा बेहद शांत लग रहा था। वह कुछ पल चुप रहा।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
शायद इसलिए क्योंकि जंगल में मैं ही एकमात्र इंसान हूँ जो तुम्हें हर मुसीबत से बचाने की कोशिश कर रहा है।
सिद्धिदात्री हल्का सा मुस्कुराई।
वो बोली -
तुम इंसान हो भी या नहीं, इसका तो तुम्हें खुद ही नहीं पता।
यह सुनकर रितांश हँस पड़ा। कई दिनों बाद वह दिल से हँसा था।
फिर उसने आकाश की ओर देखा। सितारों से भरा आसमान बहुत सुंदर लग रहा था।
वो बोला -
जो भी हूँ...
उसने धीरे से कहा -
बस इतना जानता हूँ कि तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।
सिद्धिदात्री ने उसकी धड़कनों की आवाज़ सुनी। न जाने क्यों...उसे पहली बार लगा कि वह सचमुच सुरक्षित है।
लेकिन उसी समय...जंगल के अंधेरे में दो चमकती हुई लाल आँखें उन्हें देख रही थीं। और दूर कहीं...
एक भारी आवाज़ गूँजी—
रक्तवंश और देवकन्या के बीच यह बंधन दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है...इसे तोड़ना ही होगा।
रात अभी बाकी थी। और खतरा भी।
उधर...अंधकार के विशाल महल में बेचैनी बढ़ती जा रही थी। काले पत्थरों से बने उस महल में पहली बार...शैतानों का राजा चिंतित था। वह अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था। लेकिन आज उसकी आँखों में वह घमंड नहीं था।
उसके सामने हवा में एक दृश्य तैर रहा था—
रितांश और सिद्धिदात्री का। वह दोनों को एक-दूसरे के करीब देख रहा था। और यही बात उसे सबसे ज्यादा डरा रही थी।
उसके सामने खड़ा एक दानव बोला—
महाराज, एक साधारण रक्तवंशी और एक देवकन्या से आपको इतना भय क्यों?
शैतानों का राजा अपनी जगह से उठा। उसकी लाल आँखें क्रोध से चमकने लगीं।
वो बोला -
मूर्ख!
पूरा महल उसकी गर्जना से काँप उठा।
वह धीरे-धीरे बोला—
तुम नहीं जानते...हजारों वर्ष पुरानी उस भविष्यवाणी को।
महल के बीचोंबीच एक प्राचीन शिला प्रकट हुई।
उस पर दिव्य अक्षरों में लिखा था—
जब रक्त और प्रकाश एक होंगे...तब एक नई शक्ति जन्म लेगी।
वह शक्ति अंधकार और प्रकाश दोनों पर अधिकार करेगी।
और वही तीनों लोकों का शासक बनेगा।
दानव भयभीत हो गए।
शैतानों का राजा आगे बोला—
यदि रक्तवंश और देवकन्या एक हो गए...क्योंकि कृष्णा और सिद्धिका बहुत चालक हैं हो ना हो वो लोग उन दोनों की शादी करा देंगे। और जब उन दोनों के बीच संबंध बनेंगे। तो उनकी संतान हम सब से कहीं अधिक शक्तिशाली होगी।
उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं।
वो बोला -
वह न पूरी तरह देव होगी...और न पूरी तरह शैतान।
वह दोनों शक्तियों का संगम होगी। और उसी दिन...मेरे शासन का अंत हो जाएगा।
पूरा कक्ष कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया।
एक दानव काँपती आवाज़ में बोला—
तो हमें क्या करना होगा, महाराज?
शैतानों के राजा की आँखों में निर्दयता उतर आई।
वो बोला -
हर हाल में उन्हें अलग करो। यदि आवश्यकता पड़े...
वह कुछ पल रुका।
वो बोला -
तो रक्तवंश के उत्तराधिकारी को समाप्त कर दो।
लेकिन देवकन्या को जीवित पकड़कर मेरे सामने लाओ।
सभी दानव झुक गए।
वो बोले -
जैसी आपकी आज्ञा, महाराज।
उधर...घने जंगल में...रितांश और सिद्धिदात्री अब भी अनजान थे।
सिद्धिदात्री रितांश के कंधे पर सिर रखे आसमान को देख रही थी।
और रितांश चुपचाप उसके पास बैठा था। उन्हें नहीं पता था...कि उनका यह बढ़ता हुआ बंधन...सिर्फ उनके दिलों को ही नहीं...
बल्कि पूरी दुनिया के भविष्य को भी बदल सकता है। और उसी क्षण...जंगल के अंधेरे में...सैकड़ों लाल आँखें फिर से चमक उठीं।
🔥 To Be Continued...