पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 2 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 2

रितांश के हाथ काँप रहे थे। डायरी के पन्ने एक-एक करके खुल रहे थे। हर पन्ने के साथ उसकी दुनिया बदलती जा रही थी।

उसने आगे पढ़ा—
रितांश...तुम न तो पूरी तरह इंसान हो...और न ही पूरी तरह शैतान।

उसकी साँसें रुक सी गईं।

आगे लिखा था -
तुम दोनों दुनियाओं के बीच की कड़ी हो।
तुम्हारे अंदर तुम्हारी माँ की शक्ति है...और इंसानों का दिल भी।

रितांश ने मुट्ठियाँ भींच लीं। अब उसे समझ आने लगा था कि उसके साथ बचपन से अजीब चीज़ें क्यों होती थीं। उसने अगली पंक्ति पढ़ी। और इस बार उसकी आँखें फैल गईं।

आगे लिखा था -
मेरे बेटे...अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो मैं शायद तुम्हारे साथ नहीं हूँ।
लेकिन अब तुम्हारे ऊपर एक जिम्मेदारी है।

रितांश का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

आगे लिखा था -
तुम्हें अपनी माँ की रक्षा करनी है।
और भविष्य में जो भी तुम्हारा भाई या बहन हो...उसे भी सुरक्षित रखना है।

रितांश ठिठक गया।

वो फुसफुसाया -
भाई... बहन...?

फिर उसे अपनी छोटी बहन रितांशी याद आई। अचानक उसके मन में डर दौड़ गया। अगर डायरी में यह लिखा है...तो इसका मतलब खतरा सिर्फ उसके लिए नहीं है। उसने तेजी से अगला पन्ना पलटा।
वहाँ कृष्णा की लिखावट पहले से ज्यादा बिखरी हुई थी। जैसे उसने ये हिस्सा बहुत जल्दबाज़ी में लिखा हो।

आगे लिखा था -
वे लोग वापस आएँगे। क्योंकि उन्हें पता है कि सिद्धिका का रक्त खत्म नहीं हुआ। और जब उन्हें तुम्हारे बारे में पता चलेगा...तो वे तुम्हें अपने पक्ष में करना चाहेंगे।

रितांश के माथे पर पसीना आ गया।

उसने आगे पढ़ा -
याद रखना...तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति तुम्हारा गुस्सा नहीं...
तुम्हारा नियंत्रण है।

उसी समय...बाहर खिड़की के पास खड़े तीनों साये गायब हो गए।
लेकिन घर के मुख्य दरवाज़े पर...धीरे से दस्तक हुई। ठक...फिर दूसरी। ठक... ठक...राधा नीचे हॉल में चौंककर दरवाज़े की तरफ देखने लगी। रितांशी अपने कमरे से बाहर निकली।

वो बोला - 
मम्मी, इतनी रात को कौन आया है?

राधा के पास कोई जवाब नहीं था।

उधर कमरे में...

रितांश ने डायरी का आख़िरी पढ़ा हुआ वाक्य फिर देखा—
जिस दिन आधी रात को वे तुम्हारे घर का दरवाज़ा खटखटाएँ...
समझ लेना कि तुम्हारा असली जीवन शुरू हो चुका है।

ठक... ठक... ठक...दरवाज़े की आवाज़ इस बार और तेज़ हो गई।
रितांश धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसकी आँखों में हल्की लाल चमक उभर आई। और पहली बार...उसे महसूस हुआ कि शायद उसके पिता उसे इसी दिन के लिए तैयार कर रहे थे।

बारिश अब भी लगातार हो रही थी। रात के एक बज चुके थे। पूरे घर में सन्नाटा था। रितांश ने राधा और रितांशी को दरवाज़े से दूर रहने को कहा।

वो बोला - 
आप दोनों अंदर जाइए।

उसकी आवाज़ सामान्य थी...लेकिन चेहरे पर गंभीरता थी। राधा कुछ कहना चाहती थी। पर जाने क्यों...उसने बेटे की बात मान ली।
रितांश धीरे-धीरे मुख्य दरवाज़े तक गया।ठक... ठक...दस्तक अब भी जारी थी। उसने हैंडल पकड़ा...और दरवाज़ा खोल दिया। बाहर एक लड़की खड़ी थी। लगभग सोलह साल की। बारिश में पूरी तरह भीगी हुई। सफेद सलवार-सूट। लंबे काले बाल। बड़ी-बड़ी आँखें।
और माथे पर हल्का सा तिलक।

उसे देखकर कोई भी यही कहता—
यह तो किसी मंदिर में पूजा करने वाली साधारण लड़की लगती है।

रितांश ने पूछा—
तुम कौन हो?

लड़की ने हल्की मुस्कान दी।

वो बोली - 
मेरा नाम सिद्धिदात्री है। मैं रास्ता भटक गई हूँ।
रात बहुत हो गई है...क्या मैं आज की रात आपके घर रुक सकती हूँ?

रितांश उसे ध्यान से देखने लगा। पता नहीं क्यों...उसे उस लड़की से कोई खतरा महसूस नहीं हुआ। लेकिन...उसकी डायरी वाली बात अचानक याद आ गई।

लिखा था -
हर वह चीज़ जैसी दिखती है...वैसी होती नहीं।

रितांश की आँखें एक पल के लिए लाल चमकीं। और उसी पल...उसे कुछ अजीब दिखाई दिया। उस लड़की के पीछे...बारिश में...एक क्षण के लिए सुनहरी रोशनी का हल्का घेरा दिखाई दिया।
फिर सब सामान्य हो गया।

वो बोली - 
क्या हुआ?
आप मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं?

रितांश तुरंत सामान्य हो गया।

वो बोला - 
कुछ नहीं।

आखिरकार उसने दरवाज़े से हटते हुए कहा—
अंदर आ जाओ।

सिद्धिदात्री ने हाथ जोड़कर कहा—
धन्यवाद।

वह घर के अंदर आ गई। जैसे ही वह हॉल में पहुँची...राधा उसे देखकर मुस्कुरा दी।

राधा बोली - 
अरे बिटिया, तुम तो पूरी भीग गई हो।

रितांशी भी उत्सुकता से उसे देखने लगी। कुछ ही मिनटों में...सिद्धिदात्री ऐसे बात करने लगी जैसे वह उन्हें बरसों से जानती हो। लेकिन ऊपर कमरे में रखी कृष्णा की डायरी...अपने आप खुल गई।

उसके एक पन्ने पर लिखा था—
यदि कभी 'सिद्धिदात्री' नाम की लड़की तुम्हारे दरवाज़े पर आए...
तो समझ लेना...भाग्य ने पहली चाल चल दी है।

बाहर बिजली चमकी। और दूर कहीं...कोई मुस्कुरा रहा था। रात गहरी हो चुकी थी। पूरा घर सो चुका था। राधा अपने कमरे में थी।
रितांशी भी सो गई थी। और रितांश...वह अब भी कृष्णा की डायरी के बारे में सोच रहा था।

उधर दूसरी तरफ...सिद्धिदात्री को जो कमरा दिया गया था...वह चुपचाप अंदर गई। दरवाज़ा बंद होते ही...उसके चेहरे की मासूम मुस्कान गायब हो गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी कठोरता आ गई। उसने अपने बैग से एक कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली।
वह एक खंजर था। चमकदार...जिस पर कुछ प्राचीन मंत्र उकेरे हुए थे। सिद्धिदात्री ने उसे हाथ में लिया।

और धीमे स्वर में बोली—
देवताओं ने मुझे शैतान को खत्म करने के लिए भेजा है...

उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश अब रुक चुकी थी। उसके चेहरे पर दृढ़ता थी।

वो बोली - 
और शैतान मुझे मिल चुका है।

 दूसरी तरफ उसी समय...रितांश अपने कमरे में बैठा था। अचानक उसे बेचैनी महसूस हुई। जैसे कोई उसे देख रहा हो। उसने खिड़की की तरफ देखा। कुछ नहीं था। लेकिन उसके भीतर की शक्ति उसे चेतावनी दे रही थी।

सिद्धिदात्री ने खंजर को देखते हुए आँखें बंद की। 

उसे अपने गुरु की बात याद आई—
जिसे तुम ढूँढ रही हो...वह पूरी तरह दुष्ट नहीं होगा। इसीलिए निर्णय लेना कठिन होगा।

उस समय उसने जवाब दिया था—
यदि वह निर्दोष हुआ तो?
यदि उसने किसी का बुरा न किया हो तो?

गुरु ने कहा था—
तब तुम्हें सत्य स्वयं खोजना होगा।

सिद्धिदात्री ने धीरे से नीचे हॉल की तरफ देखा। राधा ने उसे खाना खिलाया था। रितांशी ने उससे दोस्ती की तरह बात की थी। और रितांश...उसने बिना जाने एक अजनबी को अपने घर में जगह दी थी। यह किसी राक्षस जैसा व्यवहार नहीं था।

उसके मन में पहली बार एक सवाल उठा—
क्या मैं सही घर में आई हूँ?

उसने खंजर वापस कपड़े में लपेट दिया।

और धीरे से फुसफुसाई—
कल से मैं सच्चाई पता करूँगी...रितांश सचमुच शैतान है...
या किसी बहुत बड़े खेल का हिस्सा।

उसी समय...दूसरे कमरे में बैठे रितांश की आँखें एक पल के लिए लाल चमक उठीं। और उसे ऐसा लगा...जैसे घर में कोई उसके बारे में फैसला करने आया है।