पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 10 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 10

रात का तीसरा पहर था। बरगद के विशाल पेड़ के नीचे...सिद्धिदात्री गहरी नींद में थी। अनजाने में उसका सिर रितांश के सीने पर टिका हुआ था। और रितांश ने भी उसे सुरक्षित रखने के लिए अपनी बाँहों में थाम रखा था। चारों तरफ घना अंधेरा था। सिर्फ झींगुरों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।

 तभी...जंगल में हलचल हुई। सरररर...एक झाड़ी हिली। फिर दूसरी। रितांश की आँखें तुरंत खुल गईं। लेकिन वे सामान्य नहीं थीं। वे पूरी तरह लाल हो चुकी थीं। शिकारी की तरह। सतर्क। उसकी पकड़ अनजाने में और कस गई। सिद्धिदात्री नींद में ही उसके और करीब सिमट गई। 

रितांश ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी नजरें अंधेरे को चीर रही थीं। जैसे वह किसी अदृश्य खतरे को महसूस कर सकता हो। कुछ क्षण तक वह घूरता रहा। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। न कोई जानवर। न कोई राक्षस। फिर भी...उसे महसूस हो रहा था कि कोई उन्हें देख रहा है।

उसी समय..बहुत दूर...अंधकार के एक विशाल महल में। काले पत्थरों से बना एक सिंहासन था। उस पर बैठा था...शैतानों का राजा। विशाल कद। जलती हुई लाल आँखें। और चेहरे पर भयावह शांति। उसके सामने हवा में एक दृश्य तैर रहा था। बरगद के नीचे सोए हुए रितांश और सिद्धिदात्री का। वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा। फिर उसके चेहरे पर ठंडी मुस्कान आ गई।

वह धीरे से बोला—
रक्तवंश...

उसकी नजर रितांश पर गई।

वो बोला - 
और देवकन्या...

उसकी नजर सिद्धिदात्री पर गई। फिर उसकी मुस्कान गायब हो गई।

वो बोला - 
कभी एक नहीं हो सकते।

पूरा कक्ष उसकी आवाज़ से काँप उठा।

उसके सामने खड़ा एक दानव बोला—
महाराज...अगर वे साथ रहे तो क्या होगा?

शैतानों का राजा कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला -
तुम नहीं समझोगे।
जब रक्त और प्रकाश मिलते हैं...तो या तो संसार का संतुलन बनता है...या सब कुछ नष्ट हो जाता है।

उसकी आँखों में पहली बार चिंता दिखाई दी।

वो बोला - 
और इस बार...मैं कोई जोखिम नहीं लूँगा।

वह सिंहासन से खड़ा हो गया। उसकी शक्ति से पूरा महल काँप उठा।

वो बोला - 
उन्हें अलग करो। हर हाल में। देवकन्या को जीवित लाओ।
और रक्तवंश के उत्तराधिकारी को...खत्म कर दो।

उधर...रितांश को अचानक एक अजीब बेचैनी महसूस हुई। जैसे कोई बहुत बड़ा खतरा उनकी ओर बढ़ रहा हो। उसने सोती हुई सिद्धिदात्री को देखा। वह बिल्कुल निश्चिंत थी। उसके चेहरे पर मासूमियत थी। रितांश ने धीरे से उसके माथे पर गिरे बाल हटाए।

और मन ही मन कहा—
जब तक मैं हूँ...तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।

लेकिन उसे नहीं पता था...कि उसी क्षण...जंगल के चारों दिशाओं से सैकड़ों लाल आँखें उनकी ओर बढ़ना शुरू कर चुकी थीं।

रात पहले से कहीं अधिक भयावह हो चुकी थी। बरगद के नीचे बैठा रितांश अचानक सतर्क हो गया। उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं।जैसे उसके भीतर का रक्तवंश किसी अदृश्य खतरे को महसूस कर चुका हो। उसकी आँखें और भी लाल हो गईं। वह अंधेरे को घूरने लगा। और तभी...उसे महसूस हुआ। वे आ चुके थे। एक नहीं। दर्जनों। शायद सैकड़ों।

जंगल के हर कोने से अंधेरी शक्तियाँ उनकी तरफ बढ़ रही थीं। सिद्धिदात्री अभी भी उसकी बाँहों में निश्चिंत होकर सो रही थी।
उसे कुछ भी पता नहीं था। रितांश ने उसकी तरफ देखा। एक पल के लिए उसके मन में आया कि उसे जगा दे। लेकिन फिर उसने सिर हिला दिया।

वो बोला -
जितनी देर यह चैन से सो सकती है..."उतनी देर सोने दूँगा।

उसने बहुत सावधानी से उसे अपनी बाँहों में उठा लिया। सिद्धिदात्री हल्का सा हिली। लेकिन जागी नहीं। नींद में ही उसने अनजाने में रितांश की शर्ट पकड़ ली।

अगले ही पल...रितांश जंगल की गहराइयों में दौड़ पड़ा। उसकी गति इंसानों जैसी नहीं थी। कुछ ही क्षणों में वह कई सौ मीटर दूर पहुँच गया। पीछे...लाल आँखें उनका पीछा कर रही थीं।

आखिर उसे पहाड़ की चट्टानों के बीच एक संकरी गुफा दिखाई दी।
बाहर से वह लगभग अदृश्य थी। रितांश तुरंत भीतर चला गया।
गुफा गहरी थी। अंधेरी। और सुरक्षित। कम से कम कुछ समय के लिए। 

वह धीरे से बैठ गया। फिर सिद्धिदात्री को अपने पास खींच लिया। जैसे कोई किसी अनमोल चीज़ की रक्षा कर रहा हो। उसने अपनी बाँहें उसके चारों ओर लपेट दीं। और फिर...उसकी पीठ से विशाल काले पंख निकल आए। उन्होंने दोनों को पूरी तरह ढक लिया। बाहर से देखने पर ऐसा लगता था...मानो गुफा में सिर्फ अंधेरा हो। कोई मौजूद ही न हो।

सिद्धिदात्री अब भी सो रही थी। उसका सिर रितांश के सीने पर टिका था। उसकी साँसें शांत थीं। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि कितनी बड़ी मुसीबत उनके सिर पर मंडरा रही है। लेकिन रितांश जाग रहा था। उसकी लाल आँखें गुफा के मुहाने पर टिकी थीं।
शिकारी की तरह। रक्षक की तरह।
और तभी...गुफा के बाहर कदमों की आवाज़ आई। ठक... ठक... ठक...किसी भारी चीज़ के कदम।

फिर एक डरावनी आवाज़ गूँजी —
मुझे उसकी गंध आ रही है...रक्तवंश यहीं कहीं छिपा है।

रितांश की पकड़ अनजाने में और कस गई। सिद्धिदात्री हल्का सा करवट लेकर उसके और करीब आ गई। और गुफा के बाहर...कई लाल आँखें अंधेरे में चमकने लगीं।

गुफा के भीतर गहरा अंधेरा था। रितांश बिल्कुल स्थिर बैठा हुआ था। उसकी बाँहों में सिद्धिदात्री सुरक्षित सो रही थी। उसे अभी तक अंदाज़ा भी नहीं था कि बाहर क्या चल रहा है।

इतिहास में शायद पहली बार...एक देवकन्या...एक राक्षस के रक्तवंश की बाँहों में...सबसे सुरक्षित थी। गुफा के बाहर से आती आवाज़ें अब और स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। ठक... ठक... ठक...
भारी कदम। फिर कई राक्षस गुफा के अंदर घुस आए। रितांश की साँस रुक गई। उसकी लाल आँखें फैल गईं।

उसने मन ही मन सोचा -
अब तो गए...

उसने सिद्धिदात्री को और कसकर अपने सीने से लगा लिया। और अपने विशाल पंखों से उसे पूरी तरह ढक लिया। राक्षस धीरे-धीरे उनकी दिशा में बढ़े। बस कुछ कदम दूर। फिर अचानक धड़ाआम!! एक तेज़ चमक हुई। नीली बिजली जैसी ऊर्जा फूटी।
पहला राक्षस चीखता हुआ पीछे जा गिरा।

आआआह!

दूसरा भी आगे बढ़ा। उसे भी वही झटका लगा। कुछ ही क्षणों में सारे राक्षस पीछे हट गए। उनके चेहरों पर डर था। रितांश समझ नहीं पाया कि हुआ क्या। उसने धीरे से नीचे देखा। सिद्धिदात्री अब भी सो रही थी। लेकिन...उसकी गर्दन पर बना ॐ का चिह्न चमक रहा था। सुनहरी रोशनी की पतली लहरें पूरे गुफा में फैल रही थीं।
और वही रोशनी एक अदृश्य दीवार बनाकर खड़ी थी।

एक राक्षस काँपती आवाज़ में बोला—
देवकन्या...

दूसरा पीछे हट गया।

वो बोला - 
यह दिव्य रक्षा है। हम इसके पास नहीं जा सकते।

तीसरे ने गुस्से में गुर्राकर हमला करने की कोशिश की। लेकिन इस बार झटका और भी शक्तिशाली था। वह कई फीट दूर जा गिरा।
रितांश कुछ पल तक सिद्धिदात्री को देखता रहा। वह गहरी नींद में थी। उसे नहीं पता था कि उसकी शक्ति जाग चुकी है। और न यह कि अभी उसने दोनों की जान बचाई है। रितांश के चेहरे पर अनजाने में हल्की मुस्कान आ गई।

वो बोला - 
तो तुम भी मेरी रक्षा कर सकती हो...

उसी समय...शैतानों का राजा अपने सिंहासन पर बैठा यह सब देख रहा था। उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

वो बोला - 
दिव्य रक्षा...इसका मतलब भविष्यवाणी सच है।

उसने अपनी मुट्ठी भींच ली।

वो बोला - 
अगर ये दोनों साथ रहे...तो वह शक्ति जाग सकती है...

एक पल के लिए उसके चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

क्योंकि हजारों वर्षों पुरानी एक भविष्यवाणी कहती थी—
जब रक्तवंश और देवकन्या एक-दूसरे की रक्षा करेंगे...तब अंधकार का युग समाप्त होने लगेगा।

और इस समय...गुफा के भीतर...दोनों को इस भविष्यवाणी के बारे में कुछ भी पता नहीं था। सिद्धिदात्री अब भी चैन से सो रही थी। और रितांश...रात भर जागकर पहरा देने का निर्णय कर चुका था।