राक्षसों ने एक-दूसरे की तरफ देखा...और फिर एक साथ झपट पड़े।
बोला -
देवकन्या को पकड़ो!
आज बचने मत देना!
पूरा जंगल उनकी चीखों से गूँज उठा। सिद्धिदात्री पीछे हट गई। उसने खंजर निकाल लिया। लेकिन राक्षसों की संख्या बहुत ज्यादा थी। तभी...रितांश के भीतर फिर वही जलन उठी। उसकी आँखें लाल हो गईं। पीठ में तेज़ दर्द हुआ। और अगले ही पल...उसके विशाल काले पंख बाहर निकल आए।
फड़ाआक!
पंखों के फैलते ही तेज़ हवा का झोंका उठा। पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं। सिद्धिदात्री आश्चर्य से उसे देख रही थी।
वो बोली -
रि... रितांश...
लेकिन रितांश के पास सोचने का समय नहीं था। उसने तुरंत सिद्धिदात्री को अपनी बाँहों में उठा लिया।
बोला -
मजबूती से पकड़ो!
वो बोली -
क्या?!
वो बोला -
बस पकड़ो!
अगले ही पल...वह जमीन से ऊपर उठ गया। तेज़ हवा के साथ रितांश आसमान में उड़ने लगा। सिद्धिदात्री ने घबराकर उसकी गर्दन पकड़ ली। नीचे पूरा जंगल छोटा दिखाई दे रहा था। यह उसकी जिंदगी की पहली उड़ान थी। और शायद सबसे खतरनाक भी। लेकिन राक्षस पीछे नहीं रुके। उनमें से कई ने भी अपने पंख फैला दिए। कुछ हवा में उड़ने लगे। कुछ पेड़ों की चोटियों पर दौड़ते हुए उनका पीछा कर रहे थे।
सबसे बड़ा राक्षस चिल्लाया—
भाग नहीं सकते!
देवकन्या हमारी है!
एक राक्षस बिजली की तरह पीछे से आया। उसने रितांश पर पंजा मारा। रितांश झटके से एक तरफ मुड़ा। पंजा उसके कंधे को छू गया। कपड़ा फट गया। खून की कुछ बूंदें हवा में बिखर गईं।
सिद्धिदात्री घबरा गई।
वो बोली -
तुम घायल हो गए!
रितांश दाँत भींचकर बोला—
मैं ठीक हूँ!
हालाँकि वह ठीक नहीं था। इतने लंबे समय तक उड़ने की आदत उसे नहीं थी। उसकी शक्तियाँ अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थीं।
अचानक...जंगल के बीचोंबीच एक अजीब सी रोशनी दिखाई दी।
जैसे अंधेरे के बीच कोई दीपक जल रहा हो। रितांश ने उसी दिशा में देखा। और उसके दिल में एक अजीब सा एहसास हुआ। जैसे कोई उसे बुला रहा हो। जैसे कोई परिचित शक्ति वहाँ मौजूद हो।
तभी उसके कानों में एक आवाज़ गूँजी—
दाएँ मुड़ो...
रितांश चौंक गया। आवाज़ बहुत शांत थी। लेकिन उसमें एक अजीब अधिकार था।
कोई बोला -
जल्दी...वे तुम्हारे पीछे हैं।
सिद्धिदात्री ने पूछा—
क्या हुआ?
रितांश ने धीरे से कहा—
मुझे नहीं पता...लेकिन कोई हमें रास्ता दिखा रहा है।
पीछे राक्षस तेजी से करीब आ रहे थे। रितांश ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। उसके पंख और तेजी से फड़फड़ाए। और वह सीधा उस रहस्यमयी रोशनी की ओर बढ़ गया। पीछे...दर्जनों राक्षस उनका पीछा कर रहे थे। लेकिन किसी को पता नहीं था...कि जिस जगह की ओर वे जा रहे हैं...वहाँ का स्वामी स्वयं राक्षसों का भय था।और उसी समय...उस रोशनी के बीच खड़ा एक व्यक्ति धीरे-धीरे मुस्कुराया। उसकी आँखों में वर्षों का ज्ञान था।
वो बोला -
आ जाओ, बेटा...बहुत देर कर दी तुमने।
रितांश पूरी ताकत से उड़ रहा था। उसके कंधे से लगातार खून बह रहा था। सिद्धिदात्री उसकी बाँहों में थी। पीछे राक्षसों का झुंड अब काफी दूर छूट चुका था। लेकिन असली समस्या अब शुरू हुई।रितांश को उड़ने की आदत नहीं थी। उसकी शक्तियाँ अभी नई थीं।और शरीर पहले से ही घायल था। अचानक...उसके पंख लड़खड़ाने लगे। फड़... फड़...उसकी साँसें भारी हो गईं।
सिद्धिदात्री बोली -
रि... रितांश!
सिद्धिदात्री घबरा गई। रितांश ने उड़ने की कोशिश की। लेकिन उसकी आँखों के सामने धुंध छाने लगी। अगले ही पल...उसके पंख जवाब दे गए। दोनों तेजी से नीचे गिरने लगे।
धड़ाम!!
वे एक घास भरे मैदान में आ गिरे। सिद्धिदात्री तो बच गई। लेकिन रितांश की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। उसके पंख गायब हो गए। चेहरा पीला पड़ गया। साँसें भी अनियमित हो गईं।
सिद्धिदात्री बोली -
रितांश!
वह तुरंत उसके पास बैठ गई। उसने उसके कंधे को सहारा दिया।
लेकिन रितांश की आँखें आधी बंद थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह बेहोश होने वाला हो। सिद्धिदात्री के हाथ काँपने लगे।
वो बोली -
नहीं...तुम्हें कुछ नहीं होगा।
उसे याद आया कि उसके पिता हमेशा घायल व्यक्ति को खुली हवा देने को कहते थे। उसने जल्दी से रितांश की शर्ट के ऊपर के कुछ बटन खोल दिए। ताकि उसे साँस लेने में आसानी हो। फिर उसने घबराते हुए अपना हाथ उसके सीने पर रखा। दिल की धड़कन महसूस करने के लिए। लेकिन जैसे ही उसका हाथ रितांश के हृदय पर पड़ा...कुछ अजीब हुआ। उसकी गर्दन पर बना ॐ का चिन्ह चमकने लगा। पहले हल्का...फिर और तेज़...फिर इतना तेज़ कि पूरा जंगल सुनहरी रोशनी से भर गया। सिद्धिदात्री घबरा गई।
वो बोली -
ये मुझे क्या हो रहा है?
उसके हाथ से सुनहरी किरणें निकलने लगीं। वह सीधे रितांश के शरीर में प्रवेश करने लगीं। घाव धीरे-धीरे भरने लगे। उसकी साँसें सामान्य होने लगीं। चेहरे का पीलापन कम होने लगा। वह स्तब्ध थी। उसने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।
वो बोली -
मैं...?
मैं ये कैसे कर रही हूँ?
कुछ ही क्षणों बाद...रितांश की आँखें खुल गईं। वह पहले से काफी बेहतर महसूस कर रहा था। उसने आश्चर्य से अपने घाव को देखा।
वह लगभग भर चुका था। फिर उसकी नज़र सिद्धिदात्री पर गई।
जिसके गले पर बना ॐ का चिन्ह अब भी हल्का चमक रहा था।उसी समय...दूर कुटिया में बैठे कृष्णा अग्निहोत्री ने आँखें खोल दीं।
उनके चेहरे पर आश्चर्य नहीं था। मानो उन्हें पहले से पता था।
उन्होंने धीरे से कहा—
तो आखिर...देवकन्या की उपचार शक्ति भी जाग गई।
फिर उन्होंने आकाश की ओर देखा।
बोले -
अब समय बहुत कम है। क्योंकि जब रक्तवंश और देवकन्या की शक्तियाँ एक साथ जागती हैं...तो अंधकार भी जाग जाता है।
दूर जंगल की गहराइयों में...दो लाल आँखें धीरे-धीरे खुलीं। और एक भयानक गर्जना गूँज उठी।