पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 3 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 3

रविवार की सुबह थी। कई दिनों बाद घर में थोड़ा सुकून था। राधा ने सबके लिए नाश्ता बनाया था।

हॉल में—


👉 राधा

👉 रितांश

👉 रितांशी

👉 और सिद्धिदात्री


साथ बैठे थे।


राधा ने प्यार से पूछा—

बेटा, तुम्हारा घर कहाँ है?


सिद्धिदात्री कुछ पल चुप रही। उसकी मुस्कान हल्की पड़ गई।


फिर उसने धीरे से कहा—

आंटी... मुझे नहीं पता।


सब उसे देखने लगे।


रितांशी ने पूछा -

मतलब?


सिद्धिदात्री ने सिर झुका लिया।


वो बोली - 

कल सुबह जब मेरी आँख खुली...तो मैं एक पार्क की बेंच पर बैठी थी। मुझे अपना नाम याद है...लेकिन उसके अलावा कुछ नहीं।


पूरा हॉल कुछ सेकंड के लिए शांत हो गया। राधा के चेहरे पर चिंता आ गई।


वो बोली - 

तुम्हें अपने माता-पिता भी याद नहीं?


सिद्धिदात्री ने ना में सिर हिला दिया।


वो बोली - 

नहीं...मुझे यह भी नहीं पता मैं कहाँ से आई हूँ।


राधा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।


राधा बोली - 

कोई बात नहीं बेटा। जब तक तुम्हें सब याद नहीं आता...तब तक यह घर तुम्हारा भी है।


सिद्धिदात्री ने ऊपर देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर सच्ची भावनाएँ उभरीं। क्योंकि वर्षों में पहली बार...किसी ने उसे अपनापन दिया था। लेकिन रितांश चुप था। उसे कुछ अजीब लग रहा था। कल रात जिस लड़की ने खंजर छिपाकर रखा था...वह आज सचमुच उलझी हुई लग रही थी। जैसे...उसकी याददाश्त सच में गायब हो। तभी अचानक...सिद्धिदात्री के दिमाग में एक दृश्य चमका। एक विशाल मंदिर...सुनहरी रोशनी...


और कोई आवाज़—

तुम्हें उसे ढूँढना होगा...


सिद्धिदात्री का सिर दर्द से पकड़ लिया।


वो सिसक गई -

आह...


राधा बोली - 

क्या हुआ?


राधा तुरंत उठी।


सिद्धिदात्री ने जल्दी से कहा -

कुछ नहीं...


लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।


उसी समय...रितांश को कृष्णा की डायरी का एक और पन्ना याद आया।


उसमें लिखा था—

कुछ लोग तुम्हारे पास भेजे जाएँगे...उनमें से कुछ दुश्मन होंगे...

और कुछ को खुद नहीं पता होगा कि वे कौन हैं।


रितांश की नज़र सिद्धिदात्री पर टिक गई। और पहली बार...उसे लगा कि शायद यह लड़की उससे भी बड़ा रहस्य है।


नाश्ता खत्म हो चुका था। राधा रसोई में काम कर रही थी। रितांशी अपने कमरे में मोबाइल चला रही थी। और रितांश कृष्णा की डायरी लेकर बैठा था। उधर...सिद्धिदात्री आँगन में तुलसी के पास खड़ी थी। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।


फिर धीरे से फुसफुसाई—

हे नारायण..आज मैंने झूठ बोल दिया।

पाप मत लगाना।


उसके चेहरे पर हल्की अपराधबोध की झलक आई। लेकिन अगले ही पल वह सामान्य हो गई। क्योंकि उसे अपना मकसद याद था।

वह यहाँ किसी कारण से आई थी। पूरा दिन वह घर के हर सदस्य को ध्यान से देखती रही। राधा...एक साधारण, दयालु महिला।

रितांशी...शरारती लेकिन दिल की साफ। और रितांश...सबसे रहस्यमय। सिद्धिदात्री ने कई बार उसे ध्यान से देखा। वह पढ़ाई करता था। माँ का सम्मान करता था। बहन का ख्याल रखता था।

उसमें उसे कोई दुष्टता नहीं दिखी। यही बात उसे सबसे ज़्यादा परेशान कर रही थी।


उस रात उसने अपनी डायरी में लिखा—

अगर यही शैतान है...तो फिर शैतान इतने अच्छे क्यों होते हैं?


फिर उसने वह पन्ना फाड़ दिया।


शाम को रितांशी सीढ़ियों से उतर रही थी। अचानक उसका पैर फिसल गया। वह गिरने ही वाली थी कि...रितांश बिजली की तरह वहाँ पहुँचा। किसी सामान्य इंसान से कहीं ज़्यादा तेज़। उसने अपनी बहन को गिरने से पहले ही पकड़ लिया। रितांशी हँस पड़ी।


बोली - 

Thanks भैया।


लेकिन सिद्धिदात्री की आँखें सिकुड़ गईं। उसने पूरा दृश्य देखा था।

इतनी तेज़ गति...सामान्य नहीं थी। उस रात कमरे में अकेले बैठी सिद्धिदात्री ने खिड़की से बाहर देखा। अब उसे यकीन हो चुका था।

रितांश के अंदर कुछ तो है। लेकिन वह क्या है—

राक्षस?

रक्षक?

या दोनों का मिश्रण?

यह उसे अभी पता लगाना था। उसने धीरे से अपना खंजर निकाला। खंजर की धार पर चाँदनी पड़ रही थी। फिर उसने उसे वापस रख दिया।


वो बोली - 

अभी नहीं...पहले पूरी सच्चाई जानूँगी।


उसे पता नहीं था...कि उसी समय ऊपर अपने कमरे में बैठा रितांश भी उसके बारे में सोच रहा था। कृष्णा की डायरी का एक पन्ना खुला था।


उस पर लिखा था—

जब वह तुम्हारे घर आएगी...तो वह तुम्हारी दुश्मन बनकर आएगी।

लेकिन फैसला तुम्हें करना होगा कि उसे दुश्मन रहने देना है...या सच दिखाना है।


रितांश की भौंहें सिकुड़ गईं।


वो बोला - 

क्या पापा... इसी लड़की की बात कर रहे थे?


बाहर रात और गहरी हो गई। और कहानी का असली खेल अब शुरू होने वाला था।


कॉलेज का पहला दिन था सिद्धिदात्री के लिए।


राधा ने जिद की थी—

घर में बैठे रहोगी तो दिमाग और उलझेगा।

चलो रितांश भैया के साथ जाओ।


सिद्धिदात्री मन ही मन मुस्कुराई थी। यही तो चाहिए था उसे।

रितांश को करीब से देखने का मौका।


कॉलेज बड़ा था। शोरगुल था। भीड़ थी। रितांश ने उसे कैंपस दिखाया। लाइब्रेरी। कैंटीन। क्लासरूम। वह चुपचाप चलती रही।

नज़रें हर तरफ थीं। लेकिन ध्यान सिर्फ एक पर।


शाम को छुट्टी के वक्त कैंपस का पिछला रास्ता। तीन लड़के। बड़े कद के। आँखों में गलत इरादा। उन्होंने रास्ता रोक लिया सिद्धिदात्री का।


एक बोला - 

अरे नई लड़की...इतनी सुंदर हो...दोस्ती नहीं करोगी?


सिद्धिदात्री रुक गई। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।वह खुद एक हथियार थी। इन तीनों को संभालना उसके लिए बाईं हाथ का खेल था। लेकिन उसने कुछ नहीं किया।


वह देखना चाहती थी—

रितांश क्या करता है।


रितांश उससे थोड़ा आगे था। तभी उसने पलटकर देखा। एक सेकंड। बस एक सेकंड। और उसका चेहरा बदल गया। वह पलटा।

तेज़ी से। बहुत तेज़ी से।

जब तक वे लड़के समझ पाते रितांश पहले लड़के का कॉलर पकड़ चुका था।


वो बोला - 

क्या हुआ?


उसकी आवाज़ शांत थी। लेकिन उस शांति में कुछ था। कुछ ऐसा जो रूह को कँपाए। दूसरे लड़के ने उसकी कमीज़ खींची।


वो बोले - 

अबे छोड़ उसे—


रितांश ने मुड़कर उसे देखा भी नहीं। बस एक हाथ से उसे परे धकेल दिया। वह लड़का दो कदम पीछे जाकर दीवार से टकराया।


वो फुसफुसाई -

इतनी ताकत...


सिद्धिदात्री की आँखें सिकुड़ीं। तीसरा लड़का। सबसे बड़ा। उसने रितांश की गर्दन पर हाथ रखा पीछे से और कुछ हुआ। जो रितांश ने खुद नहीं सोचा था। उसका शरीर खुद-ब-खुद मुड़ा। और उसके दाँत उस लड़के की गर्दन पर। एक झटके में। लड़का चीखा। रितांश एक कदम पीछे हटा। उसने अपना मुँह देखा। उसके होंठों पर खून था। तीनों लड़के भाग गए। रितांश खड़ा रहा। उसकी साँसें तेज़ थीं।

उसके हाथ काँप रहे थे।


उसने धीरे से कहा -

यह... यह मैंने नहीं चाहा था।


वह कुछ दूर खड़ी थी। पूरा दृश्य उसकी आँखों ने कैद किया था।

दाँत। खून। वह गति। वह ताकत।


उसके मन में एक ही बात गूँजी—

राक्षस।


उसका हाथ कमर के पास गया जहाँ खंजर छुपा था। लेकिन तभी रितांश ने पलटकर उसे देखा। उसकी आँखों में पश्चाताप था। शर्म थी।बऔर एक अजीब-सी थकान।


उसने कहा -

सॉरी...तुम्हें यह नहीं देखना चाहिए था।


सिद्धिदात्री का हाथ रुक गया।


वो मन ही मन बोली - 

राक्षस माफी नहीं माँगते।

राक्षस शर्मिंदा नहीं होते।


उसके भीतर कुछ हिल गया। घर लौटते हुए दोनों चुप थे। सिद्धिदात्री ने एक बार उसकी तरफ देखा। रितांश की आँखें नीची थीं। जैसे वह खुद से लड़ रहा हो।


उसने धीरे से पूछा—

तुम ठीक हो?


रितांश ने चौंककर उसे देखा।


उसने कहा -

मुझे होना चाहिए था। लेकिन मुझे खुद नहीं पता मैं क्या हूँ।


वह सबसे बड़ा सच था जो उसने आज तक किसी को बताया था।

सिद्धिदात्री चुप रही।


लेकिन उस रात अपनी डायरी में उसने लिखा—

एक राक्षस यह नहीं कहता कि, "मुझे नहीं पता

मैं क्या हूँ।"

"शायद... मैं गलत हूँ।"

"या शायद यह मेरी सबसे बड़ी भूल है।"


उसने कलम रोकी। खिड़की से चाँद देखा। और पहली बार उसे अपने मकसद पर शक हुआ। बाहर हवा चली। और कहानी एक नए मोड़ पर आ गई।