रात का समय था। बाहर भयंकर बारिश हो रही थी। बिजली की चमक पूरे आसमान को बार-बार चीर रही थी।
घर के अंदर...रितांशी अपने कमरे में पढ़ रही थी। राधा रसोई समेट रही थी। तभी ऊपर वाले कमरे से एक दर्द भरी चीख सुनाई दी।
आह्ह्ह....!!
राधा का दिल धक से रह गया।
वो बोली -
रितांश!
वो भागती हुई उसके कमरे की तरफ दौड़ी। कमरे का दरवाज़ा खुला। और अंदर का दृश्य देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। रितांश बिस्तर पर पड़ा तड़प रहा था। उसकी साँसें बेकाबू थीं।
पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था।
राधा बोली -
बेटा क्या हुआ?
राधा घबराकर उसके पास बैठ गई। लेकिन रितांश खुद भी नहीं समझ पा रहा था।
वो बोला -
माँ...मेरे दाँत...बहुत दर्द कर रहे हैं...
उसने अपना चेहरा पकड़ लिया। ऐसा लग रहा था जैसे जबड़े की हड्डियाँ बदल रही हों। फिर उसने अपनी आँखें खोलीं। राधा एकदम सन्न रह गई। उसकी आँखों की पुतलियाँ गहरे लाल रंग में चमक रही थीं।
राधा बोली -
रितांश...!
राधा की आवाज काँप गई। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती...रितांश दर्द से फिर कराह उठा।
वो बोला -
मेरी पीठ जल रही है...!
वो बिस्तर से नीचे गिर पड़ा। ऐसा लग रहा था जैसे पीठ के अंदर कुछ बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। राधा पूरी तरह घबरा चुकी थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे। क्योंकि...
उसे अपने अतीत के बारे में कुछ भी याद नहीं था। उसे यह भी नहीं पता था कि उसके बेटे के अंदर कौन सा रक्त बह रहा है। इन सब बातों को...सिर्फ एक इंसान जानता था। कृष्णा। और कृष्णा सोलह साल से गायब था।
उधर रितांश के कानों में अजीब आवाज़ें गूंजने लगीं —
जागो...तुम्हारा समय आ गया है...अपनी शक्ति स्वीकार करो...।
रितांश चीख पड़ा -
नहीं!
तभी अचानक...उसकी पीठ से लाल ऊर्जा की लपट जैसी निकली।
पूरा कमरा एक पल के लिए काँप उठा। खिड़कियों के शीशे चटक गए। लाइटें झपकने लगीं। राधा डरकर पीछे हट गई। उसने ऐसा दृश्य अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा था।
उसी समय...घर के दूसरे कोने में रखी वह पुरानी बंद अलमारी अपने आप खुल गई। अंदर से एक पुरानी डायरी नीचे गिर पड़ी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
यदि यह पढ़ रहे हो...तो इसका मतलब है कि रितांश की शक्तियाँ जाग चुकी हैं।
— कृष्णा
राधा की आँखें फैल गईं। बारिश और तेज हो गई। और पहली बार...उसे एहसास हुआ कि उसके पति ने उससे बहुत बड़ा रहस्य छुपाया था।
बारिश अब भी लगातार हो रही थी। रितांश का दर्द धीरे-धीरे कम हो चुका था।बलेकिन उसकी आँखों में अब भी बेचैनी थी। राधा चुपचाप उस पुरानी डायरी को हाथ में लिए बैठी थी। उसका मन बार-बार उसे खोलकर पढ़ने का कर रहा था। आखिर उसने पहला पन्ना खोला। वहाँ कृष्णा की लिखावट थी।बवही लिखावट जिसे उसने सोलह सालों से नहीं देखा था। उसकी आँखें नम हो गईं।
लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र नीचे लिखी पंक्तियों पर गई—
मेरी बस एक ही विनती है...इस डायरी को रितांश के अलावा कोई और नहीं पढ़ेगा।
अगर तुम यह पढ़ रही हो, राधा... तो मुझ पर एक आख़िरी भरोसा करना।
राधा के हाथ काँप गए। उसने तुरंत डायरी बंद कर दी।
वो धीमे से मुस्कुराई और बोली -
आज भी...आज भी आप मुझे आदेश दे रहे हो, कृष्णा...
उसकी आँखों से एक आँसू गिर पड़ा। लेकिन उसने डायरी आगे नहीं पढ़ी। कुछ देर बाद...रितांश अपने कमरे में बैठा था। उसके शरीर में अब भी अजीब सा भारीपन था। तभी दरवाज़ा खुला।
राधा अंदर आई। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।
रितांश ने हैरानी से पूछा -
माँ?
राधा उसके सामने बैठ गई और बोली -
ये तुम्हारे पापा की है।
रितांश एकदम चौंक गया।
वो बोला -
पापा की...?
राधा ने सिर हिलाया।
वो बोली -
मैंने इसे नहीं पढ़ा।
क्योंकि उन्होंने मना किया है।
उसने डायरी रितांश के हाथ में रख दी।
वो बोली -
शायद...तुम्हारे सारे सवालों के जवाब इसमें हैं।
रितांश कुछ पल तक उस डायरी को देखता रहा। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। क्योंकि यह पहली बार था...जब उसे अपने पिता से जुड़ी कोई चीज़ मिली थी। उसने काँपते हाथों से डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
प्रिय रितांश,
अगर तुम यह पढ़ रहे हो...तो इसका मतलब है कि वह दिन आ चुका है जिससे मैं सबसे ज़्यादा डरता था।
रितांश की साँस रुक गई।
उसने अगली पंक्ति पढ़ी—
तुम इंसान हो...लेकिन पूरी तरह इंसान नहीं हो।
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। और बाहर आसमान में बिजली चमकी। रितांश की लाल होती आँखें उस डायरी पर टिक गईं।
उसे महसूस हुआ...कि उसकी पूरी ज़िंदगी का सच अब खुलने वाला है।
बाहर बारिश अब भी हो रही थी। कमरे में सिर्फ टेबल लैम्प की हल्की रोशनी थी।वीरितांश के हाथ में कृष्णा की डायरी थी।
उसने अगली पंक्तियाँ पढ़नी शुरू कीं —
रितांश...जब तुम पैदा हुए थे, उसी दिन मुझे पता चल गया था कि तुम्हारे अंदर कुछ ऐसा है जो इस दुनिया के किसी भी इंसान में नहीं है।
रितांश की धड़कन तेज़ हो गई।
आगे लिखा था —
डरना मत। तुम राक्षस नहीं हो।
तुम्हारा दिल तुम्हारी माँ की तरह पवित्र है।
उसकी आँखें नम हो गईं। उसे पहली बार अपने पिता की आवाज़ शब्दों में सुनाई दे रही थी।
उसने आगे पढ़ा —
लेकिन तुम्हारे रक्त में एक ऐसी शक्ति है जो सदियों पुरानी है।
वही शक्ति जो कभी तुम्हारी माँ के अंदर थी।
रितांश की आँखें फैल गईं।
वो फुसफुसाया —
माँ...?
उसे याद आया...जब भी वह अपनी माँ को देखता था, उसे कभी नहीं लगता था कि वह किसी रहस्य से जुड़ी हो सकती हैं। उसने अगला पन्ना पलटा। वहाँ एक पुरानी तस्वीर चिपकी हुई थी। तस्वीर में एक लाल साड़ी पहने लड़की...लाल आँखें...लंबे काले पंख...
और उसके साथ खड़े थे कृष्णा। रितांश का शरीर सिहर उठा।
वो बोला -
ये...ये माँ हैं...?
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
डायरी में लिखा था—
तुम्हारी माँ का नाम पहले राधा नहीं था।
वह सिद्धिका थी। और वह इंसान नहीं थी।
रितांश को लगा जैसे पूरी दुनिया घूम गई हो। तभी उसकी आँखों में फिर वही लाल चमक उभरी। लेकिन इस बार...उसे दर्द नहीं हुआ।
बल्कि...उसे कुछ दृश्य दिखाई देने लगे। एक नदी...एक मंदिर...
एक युवक...एक लड़की जिसके लाल और काले पंख थे...जैसे वह किसी और की यादें देख रहा हो।
उधर दरवाज़े के बाहर...राधा खड़ी थी। वह अंदर नहीं आई। क्योंकि कृष्णा की आख़िरी इच्छा वही थी। लेकिन उसका दिल घबरा रहा था। उसे लग रहा था कि आज...उसका बेटा कुछ ऐसा जान जाएगा...जो उसकी पूरी जिंदगी बदल देगा। रितांश ने पन्ना पलटा।
वहाँ सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
अगर तुम्हारी आँखें लाल होने लगी हैं...तो समझ लो कि वे तुम्हें ढूँढने आ चुके हैं।
रितांश ठिठक गया।
वो बोला -
वे... कौन?
तभी...घर के बाहर अचानक बिजली कड़की। और खिड़की के उस पार...बारिश में तीन काले साये खड़े दिखाई दिए। वे सीधे रितांश के कमरे की तरफ देख रहे थे। उनकी आँखें भी लाल थीं।
🔥 To Be Continued...