सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे गायब हो चुकी थी। जंगल फिर से शांत था। रितांश अब लगभग पूरी तरह ठीक हो चुका था। लेकिन सिद्धिदात्री के हाथ अब भी काँप रहे थे। अभी कुछ देर पहले...उसे सचमुच लगा था कि वह उसे खो देगी। और यह एहसास उसे अंदर तक डरा गया था। अचानक...उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह रोते हुए बोली -
तुम बेवकूफ हो...इतना घायल होने के बाद भी उड़ते रहे...
अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो...?
वह बात पूरी नहीं कर पाई। अगले ही पल...वह झुककर रितांश के सीने से लग गई। उसने दोनों हाथों से उसकी शर्ट कसकर पकड़ ली। जैसे यकीन कर रही हो कि वह सचमुच सुरक्षित है। रितांश बिल्कुल स्थिर रह गया। उसे समझ ही नहीं आया कि क्या करे। उसके जीवन में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। न कोई लड़की इस तरह उससे लिपटी थी। न किसी ने उसके लिए इस तरह आँसू बहाए थे। वह बस चुपचाप बैठा रहा। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। लेकिन इस बार...गुस्से या शक्ति के कारण नहीं। यह एक अलग ही एहसास था। एक ऐसा एहसास जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।
कुछ देर बाद...
उसने धीरे से कहा—
मैं ठीक हूँ।
सिद्धिदात्री ने सिर उठाया। उसकी आँखें अभी भी नम थीं।
वो बोली -
झूठ। तुम बिल्कुल ठीक नहीं थे।
और फिर भी मुझे बचाने की कोशिश कर रहे थे।
रितांश हल्का सा मुस्कुराया।
वो बोला -
क्योंकि अगर मैं नहीं बचाता...तो तुम मुझे डाँटने के लिए भी नहीं बचती।
सिद्धिदात्री ने आँसू पोंछे। फिर पहली बार हल्का सा हँस दी। उन्हें पता नहीं था...कि जंगल के दूसरी ओर एक ऊँची चट्टान पर कोई खड़ा था। सफेद वस्त्र। और आँखों में गहरी शांति। वह कृष्णा अग्निहोत्री थे। उन्होंने दोनों को दूर से देखा। फिर हल्की मुस्कान उनके चेहरे पर आ गई।
वो बोले -
बिल्कुल मेरी और सिद्धिका की तरह...
लेकिन अगले ही क्षण उनका चेहरा गंभीर हो गया। क्योंकि जंगल की गहराइयों से एक भयानक शक्ति जाग चुकी थी। और उसकी नज़र अब...रितांश और सिद्धिदात्री दोनों पर थी।
जंगल की ठंडी हवा बह रही थी। सिद्धिदात्री अभी भी रितांश के करीब बैठी थी। उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। रितांश भी पहली बार खुद को अजीब सा महसूस कर रहा था। तभी... अचानक उसकी कलाई पर बना काला चिह्न चमकने लगा। टप... टप..जैसे उसके भीतर कोई शक्ति जाग रही हो। रितांश ने चौंककर अपनी कलाई देखी।
वो बोला -
ये क्या...
उसी समय...सिद्धिदात्री की गर्दन पर बना ॐ का चिन्ह भी चमक उठा। पहले हल्का फिर और तेज़। दोनों चिह्न एक-दूसरे की उपस्थिति पर प्रतिक्रिया कर रहे थे। सिद्धिदात्री कुछ समझ पाती...
उससे पहले ही रितांश हाथ फिसला। और उसकी गर्दन वाला चिन्ह...रितांश की कलाई के चिह्न से छू गया। एक पल के लिए समय जैसे रुक गया। फिर...धड़ाआआम!! सुनहरी और लाल ऊर्जा की लहर फूट पड़ी। दोनों दर्द से चीख उठे।
सिद्धिदात्री चीखी -
आह्ह!!
रितांश चीखा -
उफ़्फ!!
ऐसा लग रहा था जैसे शरीर के भीतर आग भर दी गई हो। रितांश की नसों में जलन दौड़ गई। सिद्धिदात्री की गर्दन का चिन्ह धधकने लगा। दोनों जमीन पर गिर पड़े। रितांश ने अपनी कलाई पकड़ ली।
वहाँ का निशान लाल अंगारे की तरह चमक रहा था। सिद्धिदात्री की आँखों से आँसू निकल आए।
वो बोली -
बहुत... दर्द हो रहा है...
उसकी आवाज काँप रही थी। रितांश भी कराह उठा। पहली बार उसकी शक्तियाँ उसके नियंत्रण से बाहर जा रही थीं। अचानक...
दोनों की आँखों के सामने अजीब दृश्य आने लगे। एक विशाल युद्ध। आकाश में देवता। धरती पर राक्षस। और बीच में...दो प्रकाश पुंज। एक रक्त जैसा लाल। दूसरा सूर्य जैसा स्वर्णिम।
फिर एक रहस्यमयी आवाज़ गूँजी—
रक्त और प्रकाश...विनाश भी हैं...और मुक्ति भी...
अगले ही क्षण दृश्य गायब हो गया। दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा।लेकिन दोनों के निशानों में अब बदलाव आ चुका था। रितांश की कलाई के काले चिह्न के बीच एक छोटी सुनहरी रेखा उभर आई थी। और सिद्धिदात्री के ॐ चिह्न के चारों ओर हल्की लाल आभा दिखाई दे रही थी। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। वे समझ नहीं पा रहे थे कि अभी क्या हुआ।
लेकिन इतना साफ था—
उनकी शक्तियाँ अब किसी अदृश्य बंधन से जुड़ चुकी थीं।
कृष्णा अग्निहोत्री अचानक ध्यान से उठ खड़े हुए। उनके चेहरे पर चिंता आ गई।
वो बोले -
नहीं...इतनी जल्दी नहीं...
उन्होंने जंगल की दिशा में देखा।
वो बोले -
दोनों चिह्न जाग चुके हैं।
और जंगल की सबसे गहरी छाया में... एक प्राचीन, भयानक सत्ता ने अपनी आँखें खोल दीं।
उसकी गूँजती आवाज़ अंधेरे में फैल गई—
आख़िरकार...दोनों उत्तराधिकारी मिल गए...
रात गहरा चुकी थी। जंगल पहले से भी ज्यादा डरावना लग रहा था। कहीं दूर उल्लू की आवाज़ सुनाई दे रही थी। हवा पेड़ों की शाखाओं से टकराकर अजीब सी सरसराहट पैदा कर रही थी।रितांश और सिद्धिदात्री दोनों थक चुके थे। पूरा दिन भागदौड़...
राक्षसों के हमले...शक्तियों का जागना...और फिर वह रहस्यमयी घटना। आखिरकार उन्हें एक विशाल बरगद का पेड़ मिला। उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकली हुई थीं। दोनों वहीं बैठ गए। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ जंगल की आवाज़ें थीं। तभी पास की झाड़ियों में कुछ हिला। सिद्धिदात्री तुरंत चौंक गई।
बोली -
क... कौन है?
उसने घबराकर अंधेरे की तरफ देखा। लेकिन वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया। रितांश भी सतर्क हो गया।
फिर बोला—
पास आ जाओ। जंगल में बहुत जंगली जानवर होते हैं।
उठाकर ले जाएँगे और पता भी नहीं चलेगा।
सिद्धिदात्री ने पहले तो बहादुर बनने की कोशिश की।
वो बोली -
मुझे डर नहीं लगता।
उसी समय...कहीं दूर से किसी जानवर की भयानक दहाड़ सुनाई दी। गुर्रर्राआआ!!
वह तुरंत बोली -
मुझे थोड़ा सा डर लगता है...
रितांश हँस पड़ा। और वह धीरे-धीरे उसके पास खिसक आई। कुछ देर बाद...दोनों पेड़ के सहारे बैठे थे। रात की ठंडी हवा चल रही थी। सिद्धिदात्री की आँखें बार-बार बंद हो रही थीं। पूरे दिन की थकान अब असर दिखा रही थी। रितांश भी जागे रहने की कोशिश कर रहा था। लेकिन शरीर जवाब दे रहा था।
कुछ देर बाद...सिद्धिदात्री की आँख लग गई। नींद में उसे शायद एहसास भी नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे और करीब खिसक आई।
फिर अनजाने में...रितांश की बाँहों के सहारे सिर रख दिया। और कुछ ही पलों में गहरी नींद में चली गई। रितांश एकदम स्थिर रह गया। उसने नीचे देखा। सिद्धिदात्री बिल्कुल निश्चिंत होकर सो रही थी। जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि उसके रहते कोई खतरा पास नहीं आएगा। रितांश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने धीरे से अपना सिर पेड़ से टिकाया।
वह बुदबुदाया -
अजीब लड़की है...
लेकिन उन्हें नहीं पता था...कि बरगद के पेड़ से कुछ दूर...दो चमकती हुई आँखें उन्हें देख रही थीं। वे किसी जानवर की नहीं थीं।
और न किसी राक्षस की।नवह व्यक्ति कई घंटों से उन दोनों पर नज़र रखे हुए था। सफेद वस्त्र...शांत चेहरा...और आँखों में वर्षों का इंतज़ार। कृष्णा अग्निहोत्री। उन्होंने सोते हुए दोनों को देखा।
फिर आकाश की ओर देखकर धीमे से मुस्कुराए।
वो बोले -
बिल्कुल बच्चे ही तो हैं...
लेकिन अगले ही पल...उनकी मुस्कान गायब हो गई। क्योंकि जंगल के सबसे अंधेरे हिस्से से एक ऐसी शक्ति की आहट आ रही थी...जिसका सामना करने के लिए शायद रितांश अभी तैयार नहीं था।