कॉलेज की छत पर हवा तेज़ चल रही थी। सूरज ढल रहा था। रितांश अब भी डायरी को हाथ में पकड़े खड़ा था।
उसका दिमाग एक ही बात पर अटका हुआ था—
पापा ज़िंदा हैं...
उसने गहरी साँस ली। फिर सिद्धिदात्री की तरफ देखा।
वो बोला -
मुझे अपने पापा को ढूँढना है। कृष्णा अग्निहोत्री को।
यह नाम सुनते ही...सिद्धिदात्री के चेहरे पर हैरानी उभर आई।
वो बोली -
क्या कहा?
कृष्णा अग्निहोत्री?
अब हैरान होने की बारी रितांश की थी।
वो बोला -
तुम उन्हें जानती हो?
सिद्धिदात्री कुछ पल सोचती रही।
फिर बोली—
जानती तो नहीं...लेकिन उनका नाम बहुत बार सुना है।
ज्यादा याद नहीं है पर जब मैं छोटी थी इस नाम का बहुत जिक्र होता था..।
रितांश की आँखें फैल गईं।
वो बोला -
क्या?
सिद्धिदात्री पास आकर बोली—
पर मुझे ज्यादा याद नहीं है..कोई बताता था वो इंजीनियर थे और उनको जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद और दुर्लभ उपचारों का उन्हें बहुत ज्ञान था। पर याद नहीं आ रहा कौन बताता था।
फिर थोड़ी देर रुक के बोली -
हां! जब मैं खो गई थी और इधर उधर भटक रही थी।
तब मैं मदद मांगने गई तो लोगों मुझे देखकर घुसर फुसुर कर रहे थे। कुछ कृष्णा अग्निहोत्री का जिक्र कर रहे थे। एक aunty ने मुझसे बोला था कि तुम्हे कृष्णा और राधा अग्निहोत्री के घर जाना चाहिए इसलिए मैं ढूंढते ढूंढते तुम्हारे घर आई।
रितांश ध्यान से सुन रहा था।
वो बोली -
और...
सिद्धिदात्री थोड़ी रुकी।
वो बोली -
एक uncle बोल रहे थे कि उनकी मंत्र शक्ति बहुत अद्भुत है।
कई बार तो लोग उनसे ऐसी समस्याओं का समाधान करवाने आते थे जिन्हें डॉक्टर तक समझ नहीं पाते थे।
मुझे लगा क्या पता मुझे वो ठीक कर दें.... क्या पता मेरी याददाश्त लौटा दें।
रितांश को विश्वास ही नहीं हुआ। उसे तो बस इतना पता था कि उसके पापा एक इंजीनियर थे। लेकिन यह सब...कभी किसी ने नहीं बताया।
वह बुदबुदाया -
माँ ने भी कभी नहीं बताया...
सिद्धिदात्री बोली—
एक aunty बोल रही थीं....अगर कभी संकट में फँस जाओ...
और कृष्णा अग्निहोत्री जीवित हों...तो समझो भगवान ने अभी तुम्हें छोड़ा नहीं है।
रितांश पूरी तरह चुप हो गया। उसे अहसास हुआ कि सिद्धिदात्री ने बिना याददाश्त की वजह से भटकने ने में ही कितनी जानकारी ले ली थी उसके पिता की। अचानक उसे डायरी का एक और पन्ना याद आया। वह जल्दी से पन्ने पलटने लगा। और सचमुच...एक पन्ने के नीचे एक पता लिखा था। लेकिन आधा हिस्सा मिट चुका था।
केवल इतना पढ़ा जा सकता था—
.. बीहड़ जंगल...हिमालय
रितांश का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
वो बोला -
हिमालय...
उसने पूछा -
क्या मिला?
रितांश ने पन्ना दिखाया। सिद्धिदात्री की आँखें भी चौड़ी हो गईं।
वो बोली -
तो इसका मतलब...वो सच में ज़िंदा हो सकते हैं।
कई सालों से रितांश अपने पिता के बारे में सिर्फ कहानियाँ सुनता आया था। लेकिन आज पहली बार...उसे लगा कि वह उनसे मिल सकता है। उसने डायरी बंद की। उसकी आँखों में दृढ़ता थी।
वो बोला -
मैं उन्हें ढूँढूँगा। चाहे हिमालय जाना पड़े...या दुनिया के किसी भी कोने में।
सिद्धिदात्री उसे देखती रही। वह पहली बार समझ रही थी कि यह लड़का सिर्फ अपनी शक्ति का उत्तर नहीं ढूँढ रहा।बवह अपने पिता को ढूँढ रहा था। और शायद...अपने अस्तित्व का सच भी।
अगली सुबह...घर का माहौल भारी था। रितांश अपना बैग तैयार कर रहा था। कुछ कपड़े...कृष्णा की डायरी...एक टॉर्च...और जरूरी सामान। उसने फैसला कर लिया था। अब चाहे जो हो...
उसे अपने पिता को ढूँढना ही था।
राधा दरवाजे पर खड़ी उसे देख रही थी। उसकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
वह धीरे से बोली -
बेटा...हिमालय से पहले वो जंगल आते हैं।
बहुत खतरनाक जंगल। लोग कहते हैं वहाँ जाने वाले कई लोग कभी वापस नहीं आते। कुछ की तो लाश तक नहीं मिलती।
राधा की आवाज भर्रा गई।
वो बोली -
मैं तुम्हारे पापा को खो चुकी हूँ...अब तुम्हें नहीं खो सकती।
रितांश कुछ पल चुप रहा। फिर माँ के पास आकर बैठ गया।
वो बोला -
माँ...अगर पापा सचमुच ज़िंदा हैं...तो क्या मैं उन्हें खोजने की कोशिश भी न करूँ?
राधा के पास कोई जवाब नहीं था। आख़िरकार उसने काँपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा।
वो बोली -
जाओ...लेकिन वादा करो...वापस आओगे।
रितांश मुस्कुरा दिया।
वो बोला -
वादा।
तभी पीछे से आवाज आई—
मैं भी चलूँगी।
सबने पलटकर देखा। सिद्धिदात्री खड़ी थी।
रितांश तुरंत बोला—
नहीं। यह कोई पिकनिक नहीं है। जंगल खतरनाक है।
सिद्धिदात्री ने हाथ बाँध लिए।
वो बोली -
और मैं भी कोई सामान्य लड़की नहीं हूँ।
वैसे भी...कृष्णा अग्निहोत्री के बारे में मुझे भी जानना है।
रितांश ने मना करने की बहुत कोशिश की। लेकिन सिद्धिदात्री भी कम जिद्दी नहीं थी। आख़िरकार...उसे मानना पड़ा।
तभी रितांशी दौड़ती हुई आई।
बोली -
भैया! मैं भी चलूँ क्या?
रितांश हँस पड़ा।
वो बोला -
बिल्कुल नहीं। तुम यहीं रहो।
और माँ का ख्याल रखो।
रितांशी ने मुँह फुला लिया।
वो बोली -
सब मज़ेदार एडवेंचर आप लोग ही करोगे।
मुझे घर में छोड़ जाओगे।
राधा और रितांश दोनों हँस पड़े।
कुछ घंटों बाद...बस अड्डे पर। रितांश और सिद्धिदात्री बस में बैठ चुके थे। राधा और रितांशी उन्हें विदा करने आई थीं। बस धीरे-धीरे चलने लगी। राधा की आँखों में आँसू थे। और रितांश की आँखों में एक लक्ष्य। उसे नहीं पता था कि आगे क्या मिलने वाला है। लेकिन उसे इतना यकीन था कहीं न कहीं...उसके पिता कृष्णा अग्निहोत्री उसका इंतज़ार कर रहे हैं।
उसी समय...सैकड़ों किलोमीटर दूर...एक घने बीहड़ जंगल के बीच। एक प्राचीन काली के सामने। काली दाढ़ी वाला एक व्यक्ति ध्यान में बैठा था। वो 42 साल के आसपास था। उसकी आँखें बंद थीं। अचानक उसने आँखें खोलीं। और हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
बोले -
आ ही गया...मेरा बेटा।
उसके सामने रखी अग्नि की लौ अचानक तेज़ हो उठी। और पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया। वह था...कृष्णा अग्निहोत्री।
To be continued.......