×

महिला विशेष ओनलाईन किताबें पढ़ें अथवा हमारी ऐप डाऊनलोड करें

    रीता का कसूर प्रथम भाग
    by Poornima Raj
    • (3)
    • 70

    म्हारी बनरी गुलाब का फूल , कि भँवरा बन्ना जी ।महारी बनरी चाँद का नूर ,कि चकोरा प्यारा बनरा जी ॥ एक घर में महिलाएं ढोल और हरमोनियम पर यह ...

    काश में माँ न होती
    by Neerja Dewedy
    • (5)
    • 75

                                                           काश! मैं माँ न होती       आकाश में घने बादल छाये थे. रह-रह कर बिजली कड़कती थी. जनवरी की ठंड में सरसराती हवा के साथ खिड़की से आती ...

    स्त्री
    by Rakesh kumar pandey Sagar
    • (4)
    • 108

                              "स्त्री" स्त्री,        एक शब्द जो देखने में अधूरा है, लेकिन अपने अंदर समेटे ...

    मधर्स डे - डिजीटल लव
    by Haresh Chaudhary
    • (8)
    • 198

    करवटें बदलते बदलते थक गई थी लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी।आती भी केसे कल मदर्स डे जो है। पूरे 5 साल के बाद दोनों बच्चे होस्टल से ...

    डिवोर्स...
    by r k lal
    • (19)
    • 193

    डिवोर्स आर0 के0 लाल   वकील साहब को आज घर पर बुलाया गया था। उनके साथ,  ड्राइंग रूम में मेरे मम्मी-पापा, भाई, चाचा एवं पड़ोस के एक अंकल सभी ...

    पूरे दिल से
    by Ritu Dubey
    • (1)
    • 106

    अपने दिल की बात ही तो सुनती हूँ, तभी तो इस जगह खड़ी हूँ ...

    बेवजह... भाग ६
    by Harshad Molishree
    • (7)
    • 140

    अब तक..."विक्रम ठाकुर ने तन्ने हवेली पर बुलाया है, आज जो कुछ भी हवा उसके लिए ठाकुर साहब ने शमा मांगी है और तुझे नौकरी पर भी वापस बुलाया ...

    मां का आँचल
    by Rakesh kumar pandey Sagar
    • (5)
    • 93

                   1-       "तेरे आँचल को छूने से" हे माँ तुझको नमन मेरा, तू ही श्रृंगार है मेरा, बहलता है ये ...

    बेवजह... भाग ५
    by Harshad Molishree
    • (5)
    • 73

    अब तक...ठक ठक की आवाज़ स सरला जाग गयी, सरला समझ गयी कि दरवाज़े पर ठाकुर होगा... मारे घबराहट के सरला पसीने मैं लटपट होचुकीथी, सरला वही घबराहट के ...

    बेवजह... भाग ४
    by Harshad Molishree
    • (4)
    • 84

    अब तक....देखते ही देखते नौ महीने बीत गए... सरला को बहोत तेज़ दर्द होरहा था, किसीभी वक़्त प्रसर्ग हो सकता था, सभी लोग बहोत उकसूक्त थे... सरला को बार ...

    ओ वुमनिया (सीरीज)
    by Dipti Methe
    • (6)
    • 207

    भाग - १ - निमा :         कल रातसे आसमान जोरों-शोरों से पिघल रहा था | गरज गरजकर बादल पानी बरसा रहें थे | पलाश की बाहोंमे जब नींद ...

    बेवजह... भाग ३
    by Harshad Molishree
    • (5)
    • 156

    बेवजह... भाग ३इस कहानी का हेतु किसी भी भाषा, प्रजाति या प्रान्त को ठेस पोहचने के लिए नही है... यह पूरी तरह से एक कालपनित कथा है, इस कहानी का ...

    दादी,,
    by Nirpendra Kumar Sharma
    • (5)
    • 119

    चिंटू अरे ओ चिंटू,,,, अस्सी बरस की रामकली बिस्तर पर लेटे लेटे अपने पोते को पुकार रही है। रामकली बूढी अवश्य हो गई है किंतु जीवन जीने की आशा ...

    वो औरत है, क्या यही उसकी कमजोरी है।
    by Sonia chetan kanoongo
    • (19)
    • 323

    भाग दौड़ वाली जिंदगी से अनिता खुश तो नही थी पर ये उसकी नियति बन गयी थी , उसने हमेशा से सोचा कि बस ग्रहस्थ जीवन जीऊँगी जहाँ घर ...

    बेवजह... भाग २
    by Harshad Molishree
    • (5)
    • 306

     बेवजह...भाग २...इस कहानी का हेतु किसी भी भाषा, प्रजाति या प्रान्त को ठेस पोहचने के लिए नही है... यह पूरी तरह से एक कालपनित कथा है, इस कहानी का ...