कई घंटों की यात्रा के बाद...रितांश और सिद्धिदात्री आखिर उस पहाड़ी क्षेत्र के आखिरी गाँव में पहुँच गए। यह वही गाँव था...
जिसके आगे बीहड़ जंगल शुरू होता था। सूरज ढलने वाला था।
हवा में अजीब सी ठंडक थी। गाँव छोटा था। मिट्टी के घर।संकरी गलियाँ। और दूर पहाड़ों की काली परछाइयां। लेकिन एक बात बहुत अजीब थी। जैसे ही दोनों गाँव में दाखिल हुए...सारे लोग उन्हें देखने लगे।
एक बूढ़ा आदमी चलते-चलते रुक गया। कुछ औरतों ने अपने बच्चों को पीछे कर लिया। चाय की दुकान पर बैठे लोग फुसफुसाने लगे। रितांश ने भौंहें सिकोड़ लीं।
वो बोला -
ये सब हमें ऐसे क्यों देख रहे हैं?
सिद्धिदात्री ने भी महसूस किया।
वो बोली -
जैसे...जैसे इन्होंने कोई भूत देख लिया हो।
वे आगे बढ़े। तभी एक बूढ़ी औरत उनके पास से गुज़री। उसकी नज़र जैसे ही रितांश पर पड़ी...उसके हाथ से पानी का घड़ा गिर गया।
धड़ाम!
वह काँपने लगी।
वो बोली -
नहीं...यह नहीं हो सकता...
रितांश चौंक गया।
वो बोला -
क्या हुआ दादी?
लेकिन बूढ़ी औरत कुछ नहीं बोली। वह जल्दी से वहाँ से चली गई।
आखिर दोनों एक छोटी सी चाय की दुकान पर पहुँचे।
रितांश ने पूछा—
काका, बीहड़ जंगल का रास्ता किधर है?
यह सुनते ही दुकान पर बैठे सभी लोग चुप हो गए। जैसे किसी ने कोई मनहूस नाम ले लिया हो। चाय वाले ने धीरे से सिर उठाया।
उसने पहले सिद्धिदात्री को देखा। फिर रितांश को। और अचानक उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
वो बोला -
तुम..तुम्हारा नाम क्या है बेटा?
रितांश बोला -
रितांश।
यह सुनते ही बूढ़े के हाथ काँप गए। उसने कुर्सी पकड़ ली।
वो बोला -
असंभव...बिल्कुल वैसा ही चेहरा...
रितांश ने तुरंत पूछा—
किस जैसा?
बूढ़े ने काँपती आवाज़ में कहा—
अठारह साल पहले...एक आदमी यहाँ आया था।
उसकी आँखों में भी वही आग थी। उसके साथ एक बहुत सुंदर औरत थी। लोग उसे देवी भी कहते थे...और शैतान भी। उसकी आँखें तुम्हारी तरह ही लाल थीं।
सिद्धिदात्री और रितांश एक साथ खड़े हो गए। उनका दिल तेजी से धड़कने लगा।
वो बोला -
उनका नाम क्या था?
बूढ़ा कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
कृष्णा...और...सिद्धिका।
पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। रितांश की साँस अटक गई। पहली बार...उसे अपने माता-पिता के निशान मिल रहे थे। लेकिन तभी...
गाँव के मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी। टन... टन... टन...
और गाँव वाले डरकर घरों के अंदर भागने लगे।
एक आदमी चिल्लाया—
सूरज डूब रहा है!
जल्दी घरों में जाओ!
जंगल वाले फिर जाग जाएँगे!
रितांश और सिद्धिदात्री एक-दूसरे को देखने लगे। उन्हें महसूस हो गया था...कि इस गाँव में सिर्फ कृष्णा का रहस्य नहीं छिपा। कुछ और भी था। कुछ ऐसा...जिससे पूरा गाँव डरता था।
सूरज पूरी तरह डूब चुका था। गाँव की गलियाँ खाली हो गई थीं।
हर दरवाज़ा बंद था। हर खिड़की पर पर्दे गिर चुके थे।
गाँव वाले बार-बार चिल्ला रहे थे—
बेटा, कहीं छुप जाओ!
रात मत बिताना बाहर!
लेकिन जब रितांश और सिद्धिदात्री ने मदद माँगी...तो किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। डर...दया से बड़ा था। कुछ ही मिनटों में पूरा गाँव वीरान हो गया। सिद्धिदात्री ने चारों तरफ देखा।
वो बोली -
तो अब?
रितांश ने शांत स्वर में कहा—
अब देखते हैं ये लोग हैं कौन।
तभी...जंगल की तरफ से अजीब सी आवाज़ें आने लगीं। हवा ठंडी हो गई। और अचानक...आसमान से कई काली परछाइयाँ उतरने लगीं। फड़ाक... फड़ाक...विशाल पंख। लाल आँखें। नुकीले दाँत।
वे इंसान नहीं थे। वे राक्षसी प्राणी थे।कुछ ही क्षणों में उन्होंने दोनों को घेर लिया। उनमें से एक लंबा राक्षस आगे बढ़ा। उसने रितांश और सिद्धिदात्री को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर हँस पड़ा।
वो बोला -
क्या मुसीबत है...आज तो गाँव वालों ने बच्चों को छोड़ दिया।
बाकी भी हँसने लगे।
दूसरा बोला -
इनसे तो पेट भी नहीं भरेगा।
तीसरा बोला—
ये सोलह साल की लड़की...और अठारह साल का लड़का...इनको खाकर क्या होगा?
फिर उसने अपनी जीभ फेरते हुए कहा—
फिर भी...भूख तो मिट ही जाएगी।
सिद्धिदात्री ने खंजर कसकर पकड़ लिया। लेकिन उसने देखा...रितांश बिल्कुल नहीं डरा था। बल्कि...उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। राक्षस ने रितांश के कंधे पर हाथ रखा।
बोला -
चलो बच्चे...ज्यादा दर्द नहीं होगा।
अगले ही पल...उसकी मुस्कान गायब हो गई। क्योंकि उसने महसूस किया वह हाथ हिला ही नहीं पा रहा था। रितांश ने उसकी कलाई पकड़ रखी थी। और पकड़ इतनी मजबूत थी कि हड्डियाँ चरमराने लगीं।
कड़क...!
राक्षस की आँखें फैल गईं।
वो बोला -
ये...?
धीरे-धीरे...रितांश ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं।
लेकिन उन राक्षसों जैसी नहीं। उनसे कहीं ज्यादा चमकीली। कहीं ज्यादा डरावनी। पूरा वातावरण जैसे बदल गया। एक बूढ़ा राक्षस पीछे खड़ा था। जैसे ही उसकी नज़र रितांश पर पड़ी..उसका चेहरा सफेद पड़ गया। वह काँपते हुए पीछे हट गया।
वो बोला -
नहीं...असंभव...
बाकी राक्षस चौंक गए।
वो बोले -
क्या हुआ?
बूढ़े राक्षस की आवाज काँप रही थी।
वो बोला -
उसकी आँखें...वो रक्त...
फिर उसने भय से कहा—
ये कोई साधारण इंसान नहीं है।
वो बोला -
ये...सिद्धिका का पुत्र है।
सन्नाटा। सभी राक्षसों के चेहरे बदल गए। और पहली बार...शिकारी डर गए। जबकि शिकार...शांत खड़ा था। पूरा गाँव सन्नाटे में डूब गया। राक्षसों का झुंड...जो कुछ क्षण पहले हँस रहा था...अब भय से पीछे हट रहा था।
बूढ़ा राक्षस काँपती आवाज़ में बोला—
ये सिद्धिका का पुत्र है... क्योंकि सिद्धिका ने एक इंसान से शादी की थी। जिस वजह से ये इंसान और शैतान दोनों है।
यह सुनते ही बाकी राक्षसों की आँखें फैल गईं।
वो बोले -
क्या? लेकिन वो तो मर चुकी थी!
उसका रक्तवंश कैसे जीवित हो सकता है?
उसके पति ने हमसे खुद कहा था कि अब सिद्धिका कभी वापस नहीं आएगी। वो अब इंशान है।
रितांश खुद भी हैरान था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी माँ का नाम...इस अंधेरी दुनिया में कितना बड़ा था।
उसने धीरे से पूछा—
तुम लोग मेरी माँ को जानते थे?
यह सुनकर सभी राक्षस एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। जैसे किसी भूले हुए डर का नाम सुन लिया हो।
बूढ़ा राक्षस बोला—
जानते थे?
पूरी राक्षस जाति उसका नाम सुनकर काँपती थी।
वह सिर्फ शक्तिशाली नहीं थी...वह विद्रोह थी। उसने पहली बार हमारी जाति के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत की थी। एक इंसान से प्यार किया था उसने। हमने तो उसे खून पीने भेजा था। पर वो प्यार कर बैठी और किसी का भी खून नहीं पीया।
सिद्धिदात्री भी ध्यान से सुन रही थी। उसे पहली बार सिद्धिका के बारे में कुछ वास्तविक बातें सुनने को मिल रही थीं।
तभी एक युवा राक्षस गुर्राया—
चाहे जो हो! ये अभी बच्चा है!
इसे यहीं खत्म कर दो!
नहीं तो ये आगे हम सब का राजा बनेगा!
वह बिजली की गति से रितांश की ओर झपटा। सिद्धिदात्री ने तुरंत खंजर निकाला। लेकिन उससे पहले रितांश की आँखों में लाल चमक कौंधी। उसका शरीर अपने आप हरकत में आ गया। उसने राक्षस का हाथ पकड़ा..और एक ही झटके में उसे कई फीट दूर फेंक दिया।
धड़ाम!
राक्षस एक पेड़ से टकराया। पूरा गाँव दहल उठा। रितांश खुद अपनी ताकत देखकर स्तब्ध था।
वो बोला -
ये...मैंने किया?
उसने अपनी हथेलियों को देखा। उसे महसूस हो रहा था कि उसके भीतर कुछ जाग रहा है। कुछ बहुत पुराना। कुछ जो उसकी माँ से जुड़ा था।
तभी बूढ़ा राक्षस बोला—
अगर तुम सच जानना चाहते हो...तो जंगल के अंतिम छोर पर जाओ। वहाँ एक आदमी रहता है। जिसे हम भी छूने की हिम्मत नहीं करते।
रितांश का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वो बोला -
कौन?
बूढ़े राक्षस की आँखों में डर था।
वो बोला -
वही जिसने सिद्धिका को बदल दिया था।
वही जिसने राक्षसों और देवताओं दोनों को चुनौती दी थी।
तुम्हारे पिता कृष्णा अग्निहोत्री।
सिद्धिदात्री और रितांश दोनों एक साथ खड़े हो गए। इतने सालों से जिसकी तलाश थी...वह शायद सचमुच यहीं कहीं था।
उसी समय...गाँव के पीछे फैला बीहड़ जंगल अचानक अजीब सी रोशनी से चमक उठा। जंगल के बीच एक संकरा रास्ता दिखाई देने लगा। बूढ़ा राक्षस पीछे हट गया।
वो बोला -
रास्ता खुल गया है...लेकिन याद रखना...जो इस जंगल में प्रवेश करता है...वह वही इंसान बनकर वापस नहीं लौटता।
रितांश ने सिद्धिदात्री की तरफ देखा। सिद्धिदात्री ने अपना खंजर कसकर पकड़ लिया। और दोनों...उस रहस्यमयी जंगल की ओर बढ़ने लगे।