बीहड़ जंगल के अंदर कदम रखते ही...सब कुछ बदल गया। पेड़ इतने घने थे कि चाँदनी तक ज़मीन पर नहीं पहुँच पा रही थी। चारों तरफ अजीब आवाज़ें गूँज रही थीं। कहीं किसी के रोने की आवाज़। कहीं किसी के हँसने की। सिद्धिदात्री ने खंजर कसकर पकड़ लिया।
वो बोली -
मुझे ये जगह बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही।
रितांश भी सतर्क था। उसे महसूस हो रहा था कि सैकड़ों आँखें अंधेरे से उन्हें देख रही हैं। तभी...एक पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से कुछ नीचे कूदा।
धप्प!
सिद्धिदात्री चौंक गई। उसके सामने एक भयानक औरत खड़ी थी।
बिखरे हुए बाल। काले नाखून। उल्टे पैर। और पूरी तरह सफेद आँखें। एक चुड़ैल। उसने सिद्धिदात्री को देखते ही चीख मारी।
वो बोली -
देवताओं की संतान!
मर जाओ!
अगले ही पल वह बिजली की तरह सिद्धिदात्री पर झपटी। सिद्धिदात्री ने खंजर चलाया। लेकिन चुड़ैल सामान्य प्राणी नहीं थी।
वह धुएँ की तरह गायब हुई...और पीछे प्रकट हो गई। उसने सिद्धिदात्री की गर्दन पकड़ ली। सिद्धिदात्री का खंजर हाथ से छूट गया। वह हवा में लटक गई। साँस टूटने लगी।
रितांश बोला -
सिद्धिदात्री!
रितांश उसकी तरफ दौड़ा। लेकिन तभी चुड़ैल की आँखें उसकी आँखों से मिलीं। और वह हँसने लगी।
वो बोली -
ओह...तो ये वही है...सिद्धिका का बेटा।
यह सुनते ही...रितांश के भीतर कुछ टूट गया। उसे अपनी माँ याद आई। राधा याद आई। रितांशी याद आई। और पहली बार...
सिद्धिदात्री को खोने का डर भी महसूस हुआ। उसके भीतर का गुस्सा नियंत्रण से बाहर जाने लगा। अचानक...उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो गईं। दाँत लंबे और नुकीले हो गए। लेकिन यह सब नहीं था। उसकी पीठ में भयंकर दर्द उठा। और अगले ही क्षण...
उसकी पीठ से विशाल काले पंख निकल आए।पूरा जंगल काँप उठा। पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं। हवा तूफान बन गई। चुड़ैल का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने तुरंत सिद्धिदात्री को छोड़ दिया।
वो बोली -
नहीं...यह संभव नहीं...वह रक्त फिर से जाग गया!
रितांश अब जमीन पर नहीं खड़ा था। वह हवा में था। विशाल काले पंख फैले हुए। लाल आँखें अंधेरे में चमक रही थीं। लेकिन उसके चेहरे पर क्रूरता नहीं थी। सिर्फ गुस्सा था। और अपने लोगों को बचाने की इच्छा। चुड़ैल भागने लगी। लेकिन रितांश बिजली की गति से उसके सामने पहुँच गया। उसने सिर्फ एक बार उसकी ओर देखा। उसकी आँखों से लाल प्रकाश निकला। और चुड़ैल चीख उठी। कुछ ही क्षणों में उसका शरीर धुएँ में बदल गया। फिर...कुछ भी नहीं बचा। सिद्धिदात्री जमीन पर बैठी थी। वह रितांश को देख रही थी। जिस लड़के को वह अब तक शैतान समझती थी...वही अपनी जान जोखिम में डालकर उसे बचा रहा था।
उसके मन में पहली बार एक सवाल उठा—
अगर यह राक्षस है...तो फिर इंसान किसे कहेंगे?
और दूर...जंगल की गहराइयों में...एक व्यक्ति ध्यान से बैठा मुस्कुरा रहा था। उसने आँखें खोलीं।
कोई बोला -
अच्छा...तो शक्तियाँ आखिर जाग गईं।
वह था...कृष्णा अग्निहोत्री।
चुड़ैल के नष्ट होते ही...जंगल कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया।रितांश की लाल आँखें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उसके काले पंख भी गायब होने लगे। सिद्धिदात्री अभी भी ज़मीन पर बैठी थी।
उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। लेकिन तभी...जंगल के अंधेरे में दर्जनों लाल आँखें चमक उठीं।
घुर्ररर...
पेड़ों के पीछे से कई राक्षस निकल आए। इस बार उनकी नज़र रितांश पर नहीं...सिद्धिदात्री पर थी।
एक राक्षस चिल्लाया—
देवकन्या मिल गई!
दूसरा बोला—
इसे पकड़ लो!
यही है वो!
सिद्धिदात्री फुसफुसाई -
देवकन्या?
मैं?
उसे कुछ समझ नहीं आया। तभी सबसे बूढ़ा राक्षस आगे आया।
उसकी आँखों में डर भी था...और नफरत भी।
वो बोला -
तुम्हें नहीं पता?
तुम साधारण इंसान नहीं हो।
सिद्धिदात्री अवाक रह गई।
बूढ़ा राक्षस बोला—
तुम पैदा नहीं हुई थीं।
तुम मिली थीं।
एक नदी की प्रचंड लहरों में बहती हुई टोकरी में।
सिद्धिदात्री का दिल धड़क उठा। उसे बचपन की कुछ धुंधली बातें याद आने लगीं। उसके पालक पिता...उनकी बातें...उनकी चिंता...
राक्षस आगे बोला—
जिस रात तुम्हें पाया गया था...आकाश में बिजली चमकी थी।
और फिर एक दिव्य आवाज़ गूँजी थी।
उसकी आवाज़ काँप गई।
आकाशवाणी बोली -
यह बालिका देवकन्या है। जब अंधकार बढ़ेगा...यह संतुलन स्थापित करेगी।
पूरा जंगल जैसे उस भविष्यवाणी को याद करके सिहर उठा।
एक राक्षस गुर्राया—
अगर यह बड़ी हो गई...तो हमारा अंत निश्चित है।
इसे अभी खत्म कर दो!
और अगले ही पल...दर्जनों राक्षस सिद्धिदात्री की ओर झपट पड़े।
सिद्धिदात्री कुछ समझ पाती...उससे पहले रितांश उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए।
वो बोला -
कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा।
एक राक्षस हँस पड़ा।
वो बोला -
और तू रोकेगा हमें?
रितांश ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आँखें फिर लाल होने लगीं।
लेकिन इस बार...उन लाल आँखों में एक अजीब सुनहरी चमक भी थी। जैसे उसके भीतर दो विरासतें एक साथ जाग रही हों। सिद्धिका का रक्त...और कृष्णा का प्रकाश। राक्षस अचानक रुक गए।क्योंकि पहली बार...उन्हें एहसास हुआ कि उनके सामने खड़ा लड़का केवल आधा राक्षस नहीं था। वह कुछ और था। कुछ ऐसा...जो पहले कभी अस्तित्व में नहीं आया था।
उसी समय...जंगल के सबसे भीतर।एक प्राचीन कुटिया के सामने बैठे कृष्णा अग्निहोत्री ने आँखें खोलीं। उनके सामने रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। कृष्णा ने दूर जंगल की दिशा में देखा।
और धीमे से मुस्कुराए।
वो बोले -
तो आखिर...देवकन्या और रक्तवंश का उत्तराधिकारी मिल ही गए।
फिर उनके चेहरे पर गंभीरता आ गई।
वो बोले -
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी...
क्योंकि जंगल के सबसे गहरे हिस्से में...कुछ और भी जाग चुका था। कुछ ऐसा...जिससे राक्षस भी डरते थे।