पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 11 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 11

उधर...जंगल से सैकड़ों किलोमीटर दूर...रात के लगभग दो बजे थे। घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। राधा अपने कमरे में थी। और रितांशी हॉल में बैठी अपने भाई को याद कर रही थी। उसकी नजर बार-बार दरवाज़े पर चली जाती।


वह बुदबुदाई -
भैया अभी कहाँ होंगे...

तभी...धड़ाम! मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया। ठंडी हवा का तेज़ झोंका अंदर आया। रितांशी घबरा गई। और अगले ही पल...कुछ अजीब आकृतियाँ घर में घुस आईं। उनकी आँखें लाल थीं। चेहरे इंसानों जैसे...लेकिन कुछ अलग। कुछ भयावह। एक ने रितांशी का हाथ पकड़ लिया।

वो बोले - 
मिल गई।

दूसरा गुर्राया—
रक्तवंश की बहन।

रितांशी घबरा गई। वह पूरी ताकत से छूटने की कोशिश करने लगी।

वो चीखी -
माँ! माँ बचाओ!

उसकी चीख पूरे घर में गूँज उठी। कमरे से भागती हुई राधा बाहर आई। उसने देखा उसकी बेटी को जबरदस्ती घसीटा जा रहा था।
एक पल के लिए वह डर गई। लेकिन अगले ही पल...उसके भीतर कुछ बदलने लगा। जैसे-जैसे रितांशी की चीख बढ़ी...वैसे-वैसे राधा का गुस्सा भी बढ़ने लगा। उसकी साँसें भारी होने लगीं। दिल तेज़ी से धड़कने लगा और फिर...कुछ ऐसा हुआ जो वर्षों से नहीं हुआ था। 

उसके चेहरे की झुर्रियाँ गायब होने लगीं। सफेद होते बाल फिर से काले होने लगे। उसका शरीर धीरे-धीरे जवान होने लगा।
मानो समय पीछे लौट रहा हो। राक्षसों ने मुड़कर देखा। और उनकी आँखें डर से फैल गईं। राधा की आँखें...धीरे-धीरे लाल हो रही थीं।
वैसी ही लाल...जैसी कभी सिद्धिका की हुआ करती थीं। एक राक्षस काँप उठा।

वो बोला - 
नहीं...ये असंभव है।

दूसरा पीछे हट गया।

दूसरा बोला - 
वो तो मर चुकी थी...सिद्धिका वापस नहीं आ सकती!

राधा धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ी। उसकी आँखों में अब माँ का प्रेम नहीं...एक भयानक क्रोध दिखाई दे रहा था।

उसकी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—
उसे...छोड़ दो।

राक्षसों के कदम अपने आप पीछे हट गए। रितांशी स्तब्ध थी। उसने अपनी माँ को कभी ऐसा नहीं देखा था।

वो बोली - 
माँ...?

उसकी आवाज़ काँप रही थी। उधर राधा के दिमाग में अजीब दृश्य चमकने लगे। नदी...सुनहरी रोशनी...कृष्णा...और एक नाम...
सिद्धिका...राधा ने अचानक अपना सिर पकड़ लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये यादें किसकी हैं। लेकिन इतना जरूर था...कि उसके भीतर सोई हुई कोई शक्ति जागने लगी थी। और दूर जंगल में...रितांश अचानक बेचैन होकर उठ बैठा। जैसे माँ और बेटे के बीच कोई अदृश्य संबंध सक्रिय हो गया हो। उसकी लाल आँखें फैल गईं।

वो फुसफुसाया -
माँ...

उसके मुँह से अनायास निकला। और उसी क्षण...शैतानों के राजा के चेहरे पर पहली बार चिंता दिखाई दी।

वो चिल्लाया -
नहीं...सिद्धिका की शक्ति फिर से जाग रही है।

घर में फिर से सन्नाटा छा गया था। अभी कुछ क्षण पहले तक जहाँ अफरा-तफरी थी...वहाँ अब टूटी हुई कुर्सियाँ और बिखरा हुआ सामान पड़ा था। राधा की साँसें तेज़ चल रही थीं। उसके सामने खड़ा आखिरी राक्षस भागने की कोशिश कर रहा था। लेकिन वह भाग नहीं पाया। राधा ने उसका गला पकड़ लिया। इतनी आसानी से...जैसे उसका वजन कुछ भी न हो। राक्षस की आँखें डर से फैल गईं।

वो बोला - 
छोड़ दो...

वह कराह उठा। लेकिन राधा के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। अगले ही पल...उसने उसे दूर फेंक दिया।
धड़ाम!
वह कई फीट दूर जाकर दीवार से टकराया। और बाकी राक्षस...
डरकर भाग खड़े हुए। रितांशी काँप रही थी। उसने कभी अपनी माँ को ऐसा नहीं देखा था। वह दौड़कर राधा के पास आई। और उसके आँचल में छिप गई।

वो बोली - 
माँ...मुझे डर लग रहा है...

उसकी आवाज़ काँप रही थी। माँ सुनते ही...राधा की आँखों का क्रोध कुछ कम हुआ। उसने तुरंत रितांशी को अपनी बाँहों में भर लिया। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को हर मुसीबत से बचाना चाहती हो।

वो बोली - 
डरो मत...मैं हूँ न।

उसकी आवाज़ कोमल थी। लेकिन...कुछ बदल चुका था। रितांशी ने ऊपर देखा। और वह स्तब्ध रह गई। क्योंकि उसकी माँ...अब उसकी माँ जैसी नहीं दिख रही थी। वह जवान थी। बहुत जवान।लंबे काले बाल। चमकती हुई लाल आँखें। और वही चेहरा...जो कभी वर्षों पहले...कृष्णा अग्निहोत्री ने पहली बार अपने ऑफिस में देखा था। सिद्धिका। बिल्कुल वैसी ही। समय जैसे उसके लिए रुक गया था।

राधा की नजर सामने लगे टूटे हुए शीशे पर पड़ी। वह खुद को देखकर जम गई। उसने काँपते हाथों से अपना चेहरा छुआ।

वो बोली - 
ये...मैं...?

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या देख रही है। क्योंकि उसकी यादों में...वह चालीस वर्ष की एक साधारण स्त्री थी। लेकिन आईने में...एक दूसरी कहानी दिखाई दे रही थी। अचानक उसके दिमाग में दृश्य चमके। एक नदी...एक मुस्कुराता हुआ युवक...कृष्णा...एक लाल साड़ी...एक खंजर...और सुनहरी रोशनी। राधा ने सिर पकड़ लिया।

वो कराह गई -
आह...

दर्द इतना तीव्र था कि वह घुटनों पर बैठ गई। रितांशी घबरा गई।

रितांशी बोली - 
माँ!

दूर जंगल में उसी क्षण...गुफा के भीतर बैठे रितांश को सीने में एक तेज़ झटका महसूस हुआ। उसकी आँखें अचानक खुल गईं। उसका हाथ अपने सीने पर चला गया। जैसे किसी बहुत करीबी व्यक्ति की पीड़ा उसने महसूस कर ली हो। सिद्धिदात्री अभी भी उसके पास बैठी थी।

वह चौंककर बोली—
क्या हुआ?

रितांश कुछ क्षण चुप रहा।

फिर धीरे से बोला—
माँ...माँ खतरे में है।

दूसरी ओर अंधकार के महल में...शैतानों का राजा अपने सिंहासन से खड़ा हो चुका था। उसके चेहरे पर पहली बार स्पष्ट बेचैनी थी।

वो बोला - 
सिद्धिका की आत्मा...जागने लगी है।

उसने मुट्ठी भींच ली। क्योंकि यदि राधा को सब याद आ गया...यदि रितांश अपने पिता तक पहुँच गया...और यदि देवकन्या उनके साथ रही...तो सदियों पुरानी भविष्यवाणी सच होने से कोई नहीं रोक पाएगा।और पहली बार...अंधकार का राजा स्वयं भय महसूस कर रहा था।

🔥 To Be Continued...