भाग 5
तहखाने का दरवाज़ा
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो… तो समझ लो — वो तुम्हें चुन चुकी है।”
आरव के हाथ काँप उठे।
डायरी के पन्नों से अजीब सी बदबू आ रही थी… जैसे वो कागज़ नहीं, किसी पुरानी कब्र से निकाली गई चीज़ हो।
कमरे के चारों तरफ दीवारों में फँसे चेहरे अभी भी धीरे-धीरे हिल रहे थे।
कुछ रो रहे थे… कुछ उसे घूर रहे थे।
और उन सबकी आँखों में सिर्फ एक ही चीज़ थी—
डर।
आरव ने काँपते हाथों से अगला पन्ना खोला।
लिखावट बहुत खराब थी। जैसे किसी ने डर के मारे जल्दी-जल्दी लिखा हो।
“मेरा नाम देवेंद्र है। मैं इस हवेली का नौकर था। अगर कोई ये पढ़ रहा है… तो शायद मैं अब ज़िंदा नहीं हूँ।”
कमरे का तापमान अचानक और गिर गया।
आरव की साँसों से धुआँ निकलने लगा।
डायरी के अगले शब्द पढ़ते ही उसका दिल तेज़ धड़कने लगा—
“हवेली में 12 कमरे नहीं हैं। असली कमरा नीचे है। तहखाने के अंदर।
वहीं वो दरवाज़ा है… जिसे बंद रहना चाहिए था।”
अचानक…
ऊपर कहीं से किसी चीज़ के घसीटे जाने की आवाज़ आई।
घररररर…
जैसे कोई भारी चीज़ छत पर रेंग रही हो।
आरव ने डरते हुए ऊपर देखा।
छत पर पानी टपक रहा था।
लेकिन वो पानी लाल था।
खून जैसा।
टप… टप… टप…
एक बूंद डायरी पर गिरी।
और उसी समय कमरे की दीवारों में फँसे सारे चेहरे एक साथ चीखने लगे—
“भागो!!!”
पूरा कमरा काँप उठा।
आरव डर के मारे पीछे हट गया।
तभी उसके पीछे से किसी औरत की फुसफुसाहट आई—
“देर हो चुकी है…”
वो तुरंत पलटा।
और इस बार…
वो औरत उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी।
लाल साड़ी।
लंबे काले बाल।
सफेद आँखें।
लेकिन अब उसका चेहरा पहले से साफ दिखाई दे रहा था।
उसकी त्वचा जगह-जगह से जली हुई थी।
होंठ कटे हुए थे।
और पेट के बीचोंबीच गहरा घाव था… जैसे किसी ने उसे चीर दिया हो।
आरव की साँस अटक गई।
वो हिल भी नहीं पा रहा था।
औरत धीरे-धीरे उसके करीब आई।
उसकी पायल की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी।
छन… छन… छन…
फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“उसे नीचे मत जाने देना…”
“क… किसे?”
औरत ने जवाब नहीं दिया।
उसने काँपता हुआ हाथ उठाया… और फर्श में खुले अँधेरे रास्ते की तरफ इशारा किया।
नीचे से अब भी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।
“माँ…”
“मुझे डर लग रहा है…”
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसी समय…
औरत अचानक दर्द से चीख उठी।
उसका शरीर बुरी तरह काँपने लगा।
और अगले ही पल…
कमरे की सारी दीवारों से काले हाथ निकलने लगे।
सैकड़ों हाथ।
वो हाथ औरत को पकड़कर पीछे खींचने लगे।
वो चीख रही थी।
“नहीं!!”
“उसे मत जगाओ!!”
लेकिन धीरे-धीरे वो अँधेरे में खिंचती चली गई।
और जाते-जाते उसने आखिरी बार आरव की तरफ देखा।
उसकी सफेद आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।
“तहखाने का दरवाज़ा मत खोलना…”
धप्प!
पूरा कमरा अचानक शांत हो गया।
जैसे वहाँ कुछ हुआ ही न हो।
आरव की साँसें टूट रही थीं।
उसके दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—
तहखाना।
नीचे क्या है?
और वो औरत किससे डर रही थी?
तभी ऊपर से रोहन की आवाज़ सुनाई दी—
“आरव!!”
“मैं यहाँ हूँ!”
कुछ सेकंड बाद दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
रोहन अंदर आते ही जम गया।
“हे भगवान…”
लेकिन अजीब बात ये थी…
अब कमरे में कोई चेहरे नहीं थे।
दीवारें बिल्कुल normal थीं।
जैसे आरव ने जो देखा… वो सिर्फ भ्रम हो।
“तू ठीक है?”
आरव काँपती आवाज़ में बोला, “यहाँ कोई था…”
रोहन ने उसकी हालत देखी।
“हमें अभी निकलना होगा।”
लेकिन तभी…
फर्श के नीचे से फिर वही बच्चे की आवाज़ आई—
“माँ…”
दोनों नीचे देखने लगे।
लकड़ी की टूटी सीढ़ियाँ अब भी अँधेरे में जा रही थीं।
रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“नहीं भाई… नीचे नहीं जाएँगे।”
लेकिन आरव जैसे खुद को रोक नहीं पा रहा था।
उसने flashlight उठाई।
“मुझे देखना होगा।”
“तू पागल है!”
आरव धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।
रोहन मजबूरी में उसके पीछे गया।
हर सीढ़ी के साथ बदबू बढ़ती जा रही थी।
सड़ी हुई लाशों जैसी।
नीचे पूरा अँधेरा था।
इतना गहरा कि flashlight की रोशनी भी छोटी लग रही थी।
सीढ़ियाँ खत्म होते ही…
दोनों एक विशाल तहखाने में पहुँचे।
और उसे देखकर दोनों की साँस रुक गई।
पूरा तहखाना अजीब निशानों से भरा था।
दीवारों पर काले मंत्र लिखे थे।
जमीन पर सूखे खून से बना विशाल गोल चिन्ह था।
और उसके बीचोंबीच…
एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।
पालना धीरे-धीरे अपने आप हिल रहा था।
चरर… चरर…
लेकिन उसमें कोई नहीं था।
तभी पीछे से बच्चे की हँसी सुनाई दी।
ही… ही… ही…
दोनों तुरंत पलटे।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसी समय तहखाने की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर पर आरव की नज़र गई।
उसमें ठाकुर वीरेंद्र सिंह खड़ा था।
और उसके साथ वही औरत।
लेकिन इस बार…
वो pregnant थी।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
“रानी सुनयना और उनका पुत्र।”
रोहन धीरे से बोला, “तो ये उसका बच्चा था…”
तभी अचानक तहखाने में रखी सारी मोमबत्तियाँ अपने आप जल उठीं।
टक! टक! टक!
और उनकी रोशनी में पहली बार तहखाने का असली हिस्सा दिखाई दिया।
कमरे के आखिर में…
एक विशाल लोहे का दरवाज़ा था।
काला।
जंग लगा हुआ।
और उस पर दर्जनों ताले लगे थे।
दरवाज़े के ऊपर खून से लिखा था—
“13”
दोनों की साँसें रुक गईं।
यही था…
13वाँ दरवाज़ा।
उसी समय दरवाज़े के पीछे से जोरदार आवाज़ आई।
धड़ाम!!!
जैसे किसी ने अंदर से पूरी ताकत से दरवाज़ा पीटा हो।
फिर दूसरी आवाज़।
धड़ाम!!!
रोहन डर के मारे पीछे हट गया।
“कोई… अंदर है…”
तभी दरवाज़े के नीचे से काला पानी बाहर आने लगा।
धीरे-धीरे…
और उसके साथ ठंडी हवा फैलने लगी।
आरव का flashlight काँपने लगा।
फिर…
दरवाज़े के पीछे से एक बच्चे की बहुत धीमी आवाज़ आई—
“माँ… मुझे बाहर आने दो…”
अगला भाग जल्द ही...