तेरहवा द्वार - 4 InkImagination द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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तेरहवा द्वार - 4

भाग 4
दीवारों का सच


“उसने अपने बच्चे को अभी तक नहीं छोड़ा…”
आरव की आँखें उस portrait पर जमी रह गईं।
हवा अचानक और ठंडी हो गई थी। कॉरिडोर की सारी लाइटें धीमे-धीमे टिमटिमा रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा हवेली ज़िंदा हो… और उनकी हर हरकत देख रही हो।
रोहन काँपती आवाज़ में बोला, “भाई… यहाँ से चलते हैं…”
लेकिन आरव जैसे सुन ही नहीं रहा था।
उसकी नजर उस औरत की गोद में बैठे बच्चे पर टिक गई थी।
बच्चे का चेहरा पूरी तरह काला था।
सिर्फ उसकी आँखें दिखाई दे रही थीं।
सफेद।
बिल्कुल उसी औरत जैसी।
तभी…
portrait की औरत की मुस्कान धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।
आरव की साँस अटक गई।
“रोहन… ये… ये पहले ऐसा था क्या?”
रोहन ने डरते हुए portrait की तरफ देखा…
और चीख पड़ा।
“भाई भागो!”
अचानक portrait के अंदर बैठा बच्चा धीरे-धीरे अपना सिर घुमाने लगा।
टक…
अब उसकी आँखें सीधे आरव की तरफ थीं।
और अगले ही पल—
पूरे कॉरिडोर की लाइट बंद हो गई।
धप्प!
चारों तरफ गहरा अँधेरा छा गया।
रोहन की घबराई आवाज़ गूँजी, “आरव!!”
“मैं यहीं हूँ!”
दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
तभी अँधेरे में किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।
ही… ही… ही…
वो हँसी बिल्कुल उनके आसपास से आ रही थी।
जैसे कोई अँधेरे में उनके बीच खड़ा हो।
आरव ने काँपते हाथों से flashlight ऑन की।
रोशनी जलते ही…
दोनों जम गए।
कॉरिडोर की दीवारों पर छोटे-छोटे हाथों के निशान बने हुए थे।
ताज़ा।
गीले।
और वो निशान धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे थे।
जैसे कोई बच्चा दीवारों पर रेंग रहा हो।
छप… छप… छप…
तभी कॉरिडोर के आखिर में कोई दिखाई दिया।
एक छोटा बच्चा।
उसकी पीठ उनकी तरफ थी।
वो बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
उसके कपड़े पुराने और फटे हुए थे।
और उसके पूरे शरीर से पानी टपक रहा था।
रोहन लगभग रो पड़ा, “ये… ये क्या है…”
बच्चा धीरे-धीरे अपना सिर घुमाने लगा।
टक…
लेकिन उसका चेहरा…
चेहरा था ही नहीं।
सिर्फ काला अँधेरा।
और उसी अँधेरे के अंदर दो सफेद आँखें चमक रही थीं।
आरव डर से पीछे हट गया।
उसी समय बच्चे ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“माँ बुला रही है…”
फिर वो अचानक दीवार के अंदर समा गया।
धप्प!
कॉरिडोर फिर शांत हो गया।
दोनों कुछ सेकंड तक वहीं खड़े रहे।
फिर रोहन चीखा, “बस! मैं जा रहा हूँ!”
लेकिन जैसे ही वो सीढ़ियों की तरफ भागा…
सीढ़ियों का रास्ता गायब था।
दोनों वहीं रुक गए।
जहाँ सीढ़ियाँ थीं… अब वहाँ सिर्फ दीवार थी।
पुरानी… गीली… और उस पर नाखूनों के निशान।
रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“न… नहीं…”
आरव ने दीवार छुई।
वो असली थी।
“ये कैसे possible है…”
तभी पीछे से वही औरत की फुसफुसाहट सुनाई दी—
“अब कोई वापस नहीं जाएगा…”
दोनों तुरंत पलटे।
कॉरिडोर खाली था।
लेकिन हवा में अब तेज़ सड़ांध फैल चुकी थी।
इतनी भयानक कि साँस लेना मुश्किल हो रहा था।
अचानक…
लाल दरवाज़ा अपने आप खुलने लगा।
चररररर…
उसके अंदर सिर्फ अँधेरा था।
गहरा… अंतहीन अँधेरा।
और उसी अँधेरे में किसी औरत के रोने की आवाज़ गूँज रही थी।
रोहन काँप गया।
“दरवाज़ा बंद करो…”
लेकिन आरव उस दरवाज़े को घूर रहा था।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे अंदर कोई उसे बुला रहा हो।
धीरे-धीरे…
बहुत प्यार से।
“आरव…”
उसकी आँखें कुछ सेकंड के लिए खाली हो गईं।
और वो बिना सोचे उस कमरे की तरफ बढ़ने लगा।
“भाई!” रोहन चिल्लाया।
लेकिन आरव जैसे trance में था।
जैसे उसके शरीर पर उसका control ही न हो।
वो कमरे के अंदर चला गया।
और अगले ही पल…
धड़ाम!!!
दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
“आरव!!!”
रोहन पूरी ताकत से दरवाज़ा पीटने लगा।
लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
कमरे के अंदर पूरा अँधेरा था।
इतना कि आरव अपने हाथ तक नहीं देख पा रहा था।
उसकी flashlight बंद हो चुकी थी।
लेकिन फिर भी…
उसे महसूस हो रहा था कि वो अकेला नहीं है।
कमरे में कोई और भी था।
बहुत सारे लोग।
धीमी साँसों की आवाज़ें चारों तरफ गूँज रही थीं।
ह्ह्ह्ह्ह…
ह्ह्ह्ह्ह…
आरव की धड़कन तेज़ हो गई।
“क… कौन है?”
अचानक कमरे के बीचोंबीच एक लालटेन अपने आप जल उठी।
टक!
हल्की पीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
और जो आरव ने देखा…
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पूरा कमरा दीवारों से भरा था।
लेकिन उन दीवारों में…
इंसानी चेहरे दिखाई दे रहे थे।
जैसे लोगों को ज़िंदा दीवारों में चुन दिया गया हो।
कुछ चेहरे रो रहे थे।
कुछ की आँखें खुली थीं।
कुछ के मुँह सिल दिए गए थे।
और सबसे डरावनी बात—
वो सब अभी भी हिल रहे थे।
धीरे-धीरे।
जैसे ज़िंदा हों।
आरव का गला सूख गया।
तभी दीवार में फँसी एक औरत ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
और फुसफुसाई—
“हमें बाहर निकालो…”
आरव डर के मारे पीछे हट गया।
लेकिन उसके पीछे भी अब दीवार थी।
और उस दीवार से दर्जनों हाथ बाहर निकल रहे थे।
काले… जले हुए… लंबे नाखून वाले हाथ।
वो हाथ उसकी तरफ बढ़ने लगे।
“नहीं… दूर रहो!”
आरव चीख पड़ा।
तभी कमरे के बीचोंबीच अचानक जमीन फटने लगी।
क्र्र्र्र्र…
फर्श के नीचे से पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं।
नीचे गहरा अँधेरा था।
और उसी अँधेरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।
“माँ…”
“माँ…”
फिर…
एक औरत की धीमी आवाज़ गूँजी—
“उसे बचा लो…”
पूरा कमरा काँपने लगा।
दीवारों में फँसे लोग एक साथ चीखने लगे।
“मत जाओ!”
“नीचे मत जाना!”
“वो जाग जाएगी!”
लेकिन उसी समय…
आरव की नजर कमरे के कोने में रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।
उस पर धूल जमी हुई थी।
जैसे कई सालों से किसी ने उसे छुआ न हो।
काँपते हाथों से उसने डायरी उठाई।
उसका पहला पन्ना खोलते ही…
उसकी साँस रुक गई।
ऊपर खून जैसे लाल अक्षरों में लिखा था—
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो… तो समझ लो — वो तुम्हें चुन चुकी है।”
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