भाग 8
मौत या भ्रम
“क्या तुम मेरे साथ खेलोगे…?”
पालने में लेटे उस बच्चे की आवाज़ सुनते ही आरव का गला सूख गया।
वो बच्चा बिल्कुल स्थिर लेटा था।
लेकिन उसकी सफेद आँखें लगातार झपके बिना आरव को देख रही थीं।
उसके होंठों पर फैली मुस्कान धीरे-धीरे और बड़ी होती जा रही थी।
चरर… चरर…
पालना अपने आप हिल रहा था।
रोहन काँपती आवाज़ में बोला, “आरव… पीछे हट…”
लेकिन आरव जैसे वहीं जम गया था।
उसे ऐसा लग रहा था कि वो बच्चा सिर्फ उसे देख नहीं रहा…
बल्कि उसके दिमाग के अंदर घुस रहा है।
धीरे-धीरे।
तभी बच्चे ने फिर फुसफुसाया—
“माँ ने मुझे अकेला छोड़ दिया…”
उसकी आवाज़ अचानक बहुत उदास हो गई।
कुछ सेकंड के लिए वो सच में एक मासूम बच्चा लगा।
लेकिन अगले ही पल…
उसकी गर्दन धीरे-धीरे घूमने लगी।
टक… टक… टक…
पूरा सिर पीछे की तरफ मुड़ गया।
और फिर भी उसकी आँखें आरव को ही देख रही थीं।
रोहन चीख पड़ा।
“भागो!!!”
धड़ाम!!!
उसी समय 13वें दरवाज़े पर जोरदार चोट हुई।
दरवाज़े की बड़ी दरार अब और फैल चुकी थी।
अंदर का अँधेरा धीरे-धीरे तहखाने में फैल रहा था।
जहाँ वो अँधेरा जाता… दीवारें काली पड़ जातीं।
मोमबत्तियाँ बुझ जातीं।
और हवा बर्फ जैसी ठंडी हो जाती।
सुनयना दर्द से कराह उठी।
उसका शरीर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा था।
जैसे वो गायब हो रही हो।
“वो… जाग रहा है…”
आरव ने घबराकर पूछा, “उसे रोका कैसे जाए?!”
सुनयना कुछ बोलने ही वाली थी कि अचानक उसका चेहरा बदल गया।
उसकी आँखें पूरी काली हो गईं।
और होंठों पर डरावनी मुस्कान फैल गई।
“क्यों रोकना चाहते हो…?”
उसकी आवाज़ अब उसकी नहीं थी।
बहुत भारी।
बहुत गहरी।
रोहन पीछे हट गया।
“ये… ये सुनयना नहीं है…”
सुनयना धीरे-धीरे हवा में ऊपर उठने लगी।
उसके बाल अपने आप उड़ रहे थे।
फिर उसने अचानक अपना सिर झटका…
और उसकी गर्दन पूरी उल्टी दिशा में घूम गई।
टक!!!
आरव का दिल बैठ गया।
अब वो सीधे उसकी तरफ देख रही थी।
लेकिन वो चेहरा सुनयना का नहीं लग रहा था।
उसमें कुछ और था।
कुछ बहुत पुराना… बहुत खतरनाक।
“तुम सब देर से आए…” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
उसी समय तहखाने की दीवारों पर अचानक परछाइयाँ उभरने लगीं।
दर्जनों लोग।
चीखते हुए।
जलते हुए।
जैसे किसी ने उन्हें ज़िंदा जला दिया हो।
पूरे तहखाने में दर्दभरी चीखें गूँजने लगीं।
“बचाओ!!”
“दरवाज़ा बंद करो!!”
“उसे बाहर मत आने दो!!”
आरव ने अपने कान बंद कर लिए।
लेकिन आवाज़ें उसके दिमाग के अंदर गूँज रही थीं।
अचानक…
सारी चीखें एकदम बंद हो गईं।
पूरा तहखाना फिर शांत हो गया।
और उसी सन्नाटे में…
किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी।
ठक…
ठक…
ठक…
जैसे कोई नंगे पैर अँधेरे में चल रहा हो।
लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
आवाज़ धीरे-धीरे करीब आ रही थी।
ठक… ठक… ठक…
रोहन काँपने लगा।
“को… कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
बस आवाज़।
और करीब।
फिर अचानक…
आरव को महसूस हुआ कि किसी ने उसके कान के पास आकर फुसफुसाया—
“पीछे देखो…”
उसका पूरा शरीर काँप उठा।
धीरे-धीरे उसने पीछे देखा।
और उसकी चीख निकल गई।
उसके ठीक पीछे…
वही बच्चा खड़ा था।
लेकिन अब वो पालने में लेटा छोटा बच्चा नहीं था।
उसका शरीर लंबा हो चुका था।
हड्डियाँ टेढ़ी-मेढ़ी थीं।
हाथ जमीन तक लटक रहे थे।
और उसके मुँह के अंदर…
सिर्फ अँधेरा था।
कोई जीभ नहीं। कोई दाँत नहीं।
बस अंतहीन काला अँधेरा।
वो धीरे-धीरे मुस्कुराया।
फिर उसकी आवाज़ पूरे तहखाने में गूँजी—
“क्या तुम मेरी नई माँ बनोगे…?”
आरव डर के मारे पीछे गिर पड़ा।
उसी समय…
सारी lights एक साथ टिमटिमाने लगीं।
टक! टक! टक!
और अगले ही पल…
सब कुछ बदल गया।
आरव ने खुद को अपने कमरे में पाया।
वो अपने बिस्तर पर बैठा था।
सुबह हो चुकी थी।
खिड़की से धूप आ रही थी।
उसने तेजी से चारों तरफ देखा।
सब normal था।
ना कोई तहखाना। ना हवेली। ना वो बच्चा।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“ये… सपना था?”
उसी समय उसकी माँ कमरे में आईं।
“आरव? तू ठीक है?”
आरव कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रहा।
फिर धीरे से बोला, “मैं… घर पर हूँ?”
“और कहाँ होगा?” उसकी माँ हँस पड़ीं।
आरव का दिल धीरे-धीरे शांत होने लगा।
शायद सच में वो सपना था।
बहुत डरावना सपना।
तभी उसकी नजर आईने पर गई।
और उसका खून जम गया।
आईने में…
उसके पीछे कोई खड़ा था।
लंबे बाल।
सफेद आँखें।
रानी सुनयना।
आरव तुरंत पलटा।
लेकिन पीछे कोई नहीं था।
उसकी साँसें फिर तेज़ हो गईं।
“नहीं…”
तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।
“आआआह्ह्ह!!!”
आरव तुरंत भागकर नीचे पहुँचा।
और जो उसने देखा…
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पूरा घर काले पानी से भरा था।
दीवारों पर हाथों के निशान बने थे।
और उसकी माँ फर्श पर पड़ी काँप रही थीं।
वो डर के मारे एक कोने की तरफ इशारा कर रही थीं।
“व… वहाँ…”
आरव ने धीरे-धीरे उस कोने की तरफ देखा।
और वहाँ…
वही बच्चा बैठा था।
सफेद आँखें।
टेढ़ी मुस्कान।
वो धीरे-धीरे अपना सिर टेढ़ा करते हुए बोला—
“मैं तुम्हारे साथ घर आ गया…”
अगला भाग जल्द ही...