भाग 6
आधी रात की औरत
“माँ… मुझे बाहर आने दो…”
तहखाने में गूँजी उस आवाज़ ने दोनों के शरीर में जैसे बर्फ जमा दी।
आरव और रोहन बिल्कुल स्थिर खड़े थे।
काले लोहे के उस विशाल दरवाज़े के पीछे… कुछ था।
कुछ ऐसा… जो इंसान नहीं था।
दरवाज़े के नीचे से निकलता काला पानी अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था। उसके साथ इतनी भयानक बदबू फैल रही थी कि साँस लेना मुश्किल हो गया।
धड़ाम!!!
एक बार फिर अंदर से जोरदार चोट की आवाज़ आई।
पूरा तहखाना काँप उठा।
छत से मिट्टी गिरने लगी।
रोहन डर के मारे चिल्ला पड़ा, “भागो यहाँ से!”
लेकिन आरव की नजर उस दरवाज़े पर जमी हुई थी।
उसका दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे दरवाज़े के पीछे जो भी है… वो उसे बुला रहा हो।
धीरे-धीरे… उसके दिमाग के अंदर।
“आरव…”
“ताले खोल दो…”
“बस एक दरवाज़ा…”
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
आवाज़ें और तेज़ होती जा रही थीं।
रोहन ने उसका कंधा पकड़ा, “तू ठीक है?”
आरव ने काँपते हुए कहा, “वो… वो मुझसे बात कर रहा है…”
“कौन?!”
धड़ाम!!!
इस बार दरवाज़े पर इतनी जोर से चोट हुई कि ऊपर लगा एक ताला टूटकर नीचे गिर गया।
ठननन…
दोनों जम गए।
तहखाने की हवा अचानक और ठंडी हो गई।
अब दरवाज़े के पीछे से किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज़ आ रही थी।
ही… ही… ही…
लेकिन वो बच्चे की हँसी नहीं थी।
उसमें कुछ बहुत गलत था।
जैसे कई आवाज़ें एक साथ हँस रही हों।
उसी समय…
तहखाने की सारी मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
धप्प!
पूरा तहखाना अँधेरे में डूब गया।
रोहन चीख पड़ा, “Flashlight ऑन कर!”
आरव ने काँपते हाथों से flashlight ऑन की।
और रोशनी जलते ही…
दोनों की चीख निकल गई।
उनके सामने वही औरत खड़ी थी।
रानी सुनयना।
लेकिन इस बार…
वो पहले से कहीं ज्यादा डरावनी दिख रही थी।
उसके लंबे बाल जमीन तक फैले थे।
सफेद आँखों से काला पानी बह रहा था।
उसकी लाल साड़ी पूरी खून से भीगी हुई थी।
और उसके पेट का घाव अब खुल चुका था…
इतना गहरा कि अंदर अँधेरा दिखाई दे रहा था।
वो बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
लेकिन उसके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।
वो हवा में तैर रही थी।
रोहन पीछे हटते हुए गिर पड़ा।
“हे भगवान…”
सुनयना धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ी।
छन… छन… छन…
उसकी पायल की आवाज़ पूरे तहखाने में गूँज रही थी।
हर कदम के साथ दीवारों पर लगे पुराने मंत्र काले पड़ते जा रहे थे।
फिर वो आरव के बिल्कुल सामने आकर रुक गई।
इतनी पास… कि उसकी सड़ी हुई त्वचा की बदबू साफ महसूस हो रही थी।
कुछ सेकंड तक वो सिर्फ उसे देखती रही।
फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ उठाया।
उसकी उँगलियाँ लंबी और जली हुई थीं।
वो हाथ सीधे आरव के चेहरे की तरफ बढ़ा।
रोहन चिल्लाया, “पीछे हट!”
लेकिन आरव हिल नहीं पाया।
जैसे उसका शरीर पत्थर बन गया हो।
सुनयना की उँगली उसके माथे को छू गई।
और उसी पल…
आरव की आँखों के सामने सब बदल गया।
चारों तरफ आग लगी हुई थी।
हवेली जल रही थी।
औरतों की चीखें हर तरफ गूँज रही थीं।
“बचाओ!!”
“दरवाज़ा खोलो!!”
आरव तेजी से साँस लेने लगा।
उसे समझ नहीं आ रहा था ये क्या हो रहा है।
फिर उसने देखा—
एक कमरा।
ठीक वही लाल दरवाज़े वाला कमरा।
उस कमरे के अंदर रानी सुनयना जमीन पर बैठी रो रही थी।
वो pregnant थी।
उसके हाथ काँप रहे थे।
और कमरे के बाहर…
ठाकुर वीरेंद्र सिंह खड़ा था।
उसकी आँखों में पागलपन था।
साथ में कुछ लोग काले कपड़ों में खड़े मंत्र पढ़ रहे थे।
“दरवाज़ा खोलो!” सुनयना चीख रही थी।
“मेरे बच्चे को मत छुओ!”
लेकिन ठाकुर के चेहरे पर कोई दया नहीं थी।
उसने दरवाज़े पर हाथ रखा और धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम्हारा बच्चा इस हवेली को अमर बना देगा।”
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
तभी दो आदमी कमरे के अंदर घुसे और सुनयना को पकड़ लिया।
वो चीखती रही।
रोती रही।
लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की।
फिर…
आरव ने देखा—
कमरे के बीचोंबीच वही काला दरवाज़ा था।
13वाँ दरवाज़ा।
उसके ऊपर अजीब काले निशान बने थे।
और उसके पीछे से कुछ लगातार दरवाज़ा पीट रहा था।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
ठाकुर पागलों की तरह हँसने लगा।
“बस थोड़ा और…”
“फिर वो जाग जाएगा…”
सुनयना रोते हुए चीखी—
“तुम नहीं जानते अंदर क्या है!”
लेकिन तभी…
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा।
चरररर…
अंदर सिर्फ अँधेरा था।
लेकिन उस अँधेरे में दो सफेद आँखें चमक रही थीं।
और अगले ही पल…
कमरे में मौजूद सारे लोग दर्द से चीखने लगे।
उनके शरीर हवा में उठ गए।
खून दीवारों पर फैल गया।
और फिर…
आरव ने कुछ ऐसा देखा जिससे उसकी आत्मा तक काँप गई।
अँधेरे के अंदर से एक छोटा हाथ बाहर आया।
लेकिन वो इंसानी हाथ नहीं था।
उसकी उँगलियाँ बहुत लंबी थीं।
काली।
और नाखून जानवरों जैसे।
फिर एक बच्चे की आवाज़ गूँजी—
“माँ…”
पूरा कमरा खून से भर गया।
और उसी खून में सुनयना चीखती हुई डूब गई।
“आरव!!!”
रोहन की आवाज़ सुनते ही आरव अचानक वापस तहखाने में आ गया।
वो जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी साँसें टूट रही थीं।
सिर में असहनीय दर्द हो रहा था।
रोहन घबराकर बोला, “क्या हुआ?!”
आरव काँपती आवाज़ में बोला—
“उस रात… उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया था…”
तभी दोनों की नजर सुनयना पर गई।
वो अब भी उनके सामने खड़ी थी।
लेकिन इस बार…
उसकी आँखों में आँसू थे।
काले आँसू।
धीरे-धीरे उसने 13वें दरवाज़े की तरफ देखा।
और पहली बार उसकी आवाज़ में डर साफ सुनाई दिया—
“वो मेरा बच्चा नहीं है…”
धड़ाम!!!
उसी पल दरवाज़े के सारे ताले एक साथ जोर से हिलने लगे।
जैसे अंदर कुछ पूरी ताकत से बाहर आने की कोशिश कर रहा हो।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
तहखाने की दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।
छत से मिट्टी गिरने लगी।
और फिर…
दरवाज़े के नीचे से दो सफेद आँखें दिखाई दीं।
छोटी।
लेकिन इंसानी नहीं।
और उनके साथ एक मुस्कुराती आवाज़ गूँजी—
“माँ… क्या इस बार भी तुम मुझे बंद रखोगी…?”
अगला भाग जल्द ही...