भाग 10
आखिरी रात
“उसका असली शरीर अभी भी हवेली की दीवारों के अंदर बंद है…”
रानी सुनयना की काँपती आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई।
आरव कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रह गया।
घर की दीवारों में लगातार दरारें पड़ रही थीं। काला पानी अब पूरे फर्श पर फैल चुका था। बाहर आसमान में तेज़ बिजली चमक रही थी।
और हर चमक के साथ…
वो बच्चा थोड़ा और बड़ा दिखाई दे रहा था।
उसकी मुस्कान अब इंसानी नहीं रही थी।
उसका शरीर अँधेरे में घुलता जा रहा था।
जैसे वो किसी और रूप में बदल रहा हो।
“अगर उसका शरीर बाहर आ गया…” सुनयना की आवाज़ काँपी, “तो वो कभी वापस बंद नहीं होगा…”
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“शरीर कहाँ है?”
सुनयना ने धीरे-धीरे हवेली की दिशा में देखा।
“तीसरी मंज़िल… लाल दरवाज़े के पीछे…”
उसी समय वो बच्चा अचानक जोर से हँस पड़ा।
ही… ही… ही…
उसकी हँसी के साथ घर की सारी खिड़कियाँ अपने आप टूट गईं।
धड़ाम!!!
काँच के टुकड़े हर तरफ बिखर गए।
आरव की माँ चीख उठीं।
बच्चा धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ा।
उसकी सफेद आँखें अब पूरी काली होने लगी थीं।
“अब कोई नहीं बचेगा…”
अचानक वो बिजली की तरह तेजी से आरव की माँ की तरफ बढ़ा।
“माँ!!”
आरव दौड़ा।
लेकिन उससे पहले ही सुनयना उस बच्चे के सामने आ गईं।
पूरा कमरा जोर से काँप उठा।
दोनों के बीच अजीब काला धुआँ फैलने लगा।
बच्चा दर्द से चीख पड़ा।
“तुम मुझे रोक नहीं सकती!”
सुनयना की आँखों से काले आँसू बह रहे थे।
“जब तक मैं हूँ… तू पूरी तरह बाहर नहीं आएगा…”
अचानक उन्होंने आरव की तरफ देखा और चीखीं—
“हवेली जाओ!! अभी!!”
अगले ही पल…
पूरा घर अँधेरे में डूब गया।
रात के करीब 3 बजे।
बारिश पहले से भी ज्यादा तेज़ हो चुकी थी।
आरव और रोहन हवेली के बाहर खड़े थे।
लेकिन आज हवेली वैसी नहीं लग रही थी।
उसकी खिड़कियों में दर्जनों परछाइयाँ घूम रही थीं।
तीसरी मंज़िल की सारी लाइटें जल रही थीं।
और अंदर से लगातार किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी।
रोहन काँपते हुए बोला, “भाई… ये आखिरी बार है। अगर आज बचे ना…”
आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी आँखों में सिर्फ डर नहीं था अब।
गुस्सा भी था।
सच जानने का गुस्सा।
उसने हवेली का गेट खोला।
चरररर…
अंदर कदम रखते ही…
पूरा हवेली जैसे जाग उठी।
ऊपर से दौड़ने की आवाज़ें आने लगीं।
दीवारों पर हाथों के निशान उभरने लगे।
और हवा में वही फुसफुसाहट गूँजने लगी—
“वो आ गया…”
“द्वार वापस आ गया…”
दोनों तेजी से तीसरी मंज़िल की तरफ भागे।
लेकिन आज सीढ़ियाँ बदल चुकी थीं।
दीवारों पर ताज़ा खून फैला था।
जमीन पर गीले पैरों के निशान थे।
और हर मंज़िल पर कोई shadow कुछ सेकंड के लिए दिखाई देती… फिर गायब हो जाती।
जैसे हवेली उन्हें देख रही हो।
तीसरी मंज़िल पहुँचते ही दोनों रुक गए।
कॉरिडोर अब पहले से लंबा हो चुका था।
बहुत लंबा।
और आखिर में वही लाल दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।
लेकिन इस बार…
दरवाज़ा खुला हुआ था।
अंदर से लाल रोशनी बाहर आ रही थी।
और उसी रोशनी में कोई खड़ा था।
ठाकुर वीरेंद्र सिंह।
या शायद…
उसकी लाश।
उसकी सफेद आँखें चमक रही थीं।
चेहरे की त्वचा सड़ चुकी थी।
लेकिन उसके होंठों पर मुस्कान थी।
“बहुत देर कर दी…”
रोहन डर के मारे पीछे हट गया।
लेकिन आरव आगे बढ़ा।
“तू क्या चाहता है?!”
ठाकुर धीरे-धीरे हँसा।
“मैं नहीं… वो चाहता है…”
उसने कमरे के अंदर इशारा किया।
और तभी…
पूरा कॉरिडोर जोर से काँप उठा।
धड़ाम!!! धड़ाम!!!
जैसे हवेली के अंदर कोई विशाल चीज़ चल रही हो।
अचानक दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
और उन दरारों के अंदर से…
इंसानी हाथ बाहर निकलने लगे।
सैकड़ों हाथ।
चीखते हुए चेहरे।
रोते हुए लोग।
“हमें बाहर निकालो!!”
रोहन चीख पड़ा।
लेकिन उसी समय ठाकुर की लाश अचानक हवा में उठ गई।
उसका शरीर फटने लगा।
टक! टक! टक!
और अगले ही पल…
उसके अंदर से काला धुआँ बाहर निकल आया।
पूरा कॉरिडोर अँधेरे से भर गया।
उस अँधेरे के बीच दो विशाल सफेद आँखें चमक उठीं।
और एक आवाज़ गूँजी—
“मैं आखिरकार आज़ाद हूँ…”
पूरा हवेली हिलने लगी।
नीचे से चीखें आने लगीं।
खिड़कियाँ टूटने लगीं।
दीवारों से खून बहने लगा।
रोहन डर के मारे जमीन पर गिर पड़ा।
“ये… ये क्या है…”
अँधेरे के अंदर धीरे-धीरे एक विशाल आकृति बनने लगी।
बहुत लंबी।
छत से भी ऊँची।
उसके हाथ इंसानों जैसे नहीं थे।
पूरा शरीर हिलते हुए अँधेरे से बना था।
और उसके सीने के बीच…
दर्जनों चेहरे फँसे हुए थे।
चीखते हुए।
आरव की साँसें रुक गईं।
यही था…
13वें दरवाज़े के पीछे का असली सच।
वो कोई भूत नहीं था।
वो कुछ और था।
कुछ ऐसा… जो इंसानों के डर और मौत से ज़िंदा रहता था।
वो मुस्कुराया।
और उसकी मुस्कान के साथ पूरा हवेली काँप उठा।
“तुम लोगों ने मुझे बुलाया…”
आरव पीछे हट गया।
लेकिन तभी सुनयना अचानक उसके सामने प्रकट हुईं।
अब उनका शरीर पूरी तरह टूट चुका था।
जैसे वो आखिरी बार दिखाई दे रही हों।
उन्होंने काँपते हुए कहा—
“दीवार…”
“उसका शरीर दीवार के अंदर है…”
आरव ने तुरंत चारों तरफ देखा।
फिर उसकी नजर लाल कमरे की पीछे वाली दीवार पर पड़ी।
उस दीवार के अंदर कुछ धड़क रहा था।
धक… धक… धक…
जैसे कोई दिल।
आरव समझ गया।
वो दौड़कर दीवार के पास पहुँचा।
दीवार पर पुरानी ईंटें लगी थीं।
और उन ईंटों के बीच से काला खून रिस रहा था।
पीछे से वो विशाल अँधेरा तेजी से उसकी तरफ बढ़ रहा था।
“तुम मुझे वापस बंद नहीं कर सकते…”
पूरा कमरा काँप रहा था।
आरव ने पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई…
और पूरी ताकत से दीवार पर मारी।
धड़ाम!!!
पहली ईंट टूटी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
और अचानक…
दीवार के अंदर से भयानक चीख गूँजी।
पूरा हवेली हिल उठा।
अँधेरा दर्द से चीखने लगा।
“नहीं!!!”
आरव लगातार दीवार तोड़ता रहा।
ईंटें गिरती गईं।
और फिर…
दीवार के अंदर जो था… उसे देखकर उसकी साँस रुक गई।
एक छोटा कंकाल।
बच्चे का।
जिसके चारों तरफ काले धागे बँधे थे।
और उसकी छाती के अंदर…
कुछ अभी भी धड़क रहा था।
धक… धक… धक…
अँधेरा पागलों की तरह चीखने लगा।
पूरा हवेली टूटने लगी।
सुनयना रो पड़ीं।
“उसे खत्म कर दो…”
आरव काँपते हाथों से आगे बढ़ा।
उसने कंकाल को उठाया।
और उसी पल…
उसके दिमाग में हजारों चीखें गूँज उठीं।
इतना दर्द… कि उसकी आँखों से खून निकलने लगा।
लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।
उसने पूरी ताकत से उस धड़कती चीज़ को जमीन पर दे मारा।
धड़ाम!!!
एक पल के लिए…
सब शांत हो गया।
पूरा हवेली रुक गई।
अँधेरा स्थिर हो गया।
और फिर…
भयानक चीख के साथ सब कुछ टूटने लगा।
दीवारें गिरने लगीं।
छत फट गई।
सुनयना की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने पहली बार मुस्कुराकर कहा—
“अब… वो कभी वापस नहीं आएगा…”
अगले ही पल…
पूरा हवेली उनके चारों तरफ गिरने लगी।
तीन दिन बाद।
गाँव वाले हवेली के खंडहर के बाहर खड़े थे।
काली हवेली अब पूरी तरह मिट चुकी थी।
बस राख बची थी।
लोग कह रहे थे—
“श्राप खत्म हो गया…”
“अब सब ठीक है…”
लेकिन…
उस रात…
गाँव के एक छोटे बच्चे ने अपनी माँ से डरते हुए कहा—
“माँ… मेरे कमरे में कोई है…”
उसकी माँ मुस्कुराईं।
“डर मत। वहाँ कोई नहीं है।”
बच्चे ने धीरे-धीरे बिस्तर के नीचे देखा।
और अँधेरे में…
दो सफेद आँखें खुल गईं।
फिर एक बहुत धीमी हँसी गूँजी—
“क्या तुम मेरे साथ खेलोगे…?”