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यूं गल रही हैं हसरतें

यूं गल रहीं हैं हसरतें

कहानी/शरोवन

यूं तो हर किसी को अपने घाव गहरे नज़र आते हैं, मगर मानसिकता के तौर पर मिले हुये ज़ख्मों से टपकता हुआ खून जब दिल की किताब पर तकदीर की एक दूसरी कहानी लिखने लगे तब इंसान की समझ में आता है कि जिस प्यार के मन्दिर की इबादत में उसने सीढि़यों की सारी ईटें घिस दी हैं, वह तो सब एक छल और फरेब था ही पर, खुद की बेवकूफी भी थी। तकदीर ने आहुति की जि़न्दगी की डोर डेनिएल के साथ बांध दी तो बदले में आहुति को तीन बच्चों का बोझ और पति की तरफ से परित्याग का वनवास मिला, मगर इस बोझ को बांटने के लिये राघव वायदा करके भी पीछे क्यों हट गया? यह बात आहुति कभी भी समझ क्यों नहीं पाई?"

***

‘मेरी शक्ल देखते ही तुम्हारे चेहरे की तकलीफ कैसे बढ़ जाती है?’ आहुति ने राघव का बिगड़ा मूंड देखा तो कहने से रूक न सकी।

‘?’

आहुति के मुख से ख़रे-खोटे शब्द सुनकर राघव अपलक उसे देखता ही रह गया?

‘कितने दिनों से मैं तुम्हें मोबाइल पर, तुम्हारे घर पर, और तुम्हारे काम पर फोन कर करके परेशान हूं, और एक तुम हो जो बात करना तो अलग, अब फोन उठाने से भी डरने लगे हो?’

‘?’

राघव फिर भी चुप रहा तो आहुति का मूंड जैसे और भी खराब हो गया। वह फिर से बोली,

‘अपने पीछे आने से पहले, मैंने तुम्हें पहले ही आगाह किया था कि मैं अंगारों पर चलती हूं और तुम्हारी आंखों में सपने फूलों के हैं। इसलिये मेरे पीछे आने से पहले आग से न जलने वाले जूते पहनकर आना। मगर तुम नहीं माने। और अब तुम्हें न जाने क्या होता जा रहा है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे किसी दिन तुम मुझे पहचानने से भी इनकार कर दोगे?’ . . .’

‘टीचर जी, मैंने सवाल कर लिया है। आप कॉपी जांच दीजिये।’ अचानक ही सामने खड़ी एक छात्रा ने कहा तो सोचते हुये विचारों में लीन आहुति का ध्यान भंग हो गया। वह तुरन्त ही वर्तमान में आई और छात्रा के हाथों से कॉपी लेकर, साड़ी से अपनी आंखों की कोर में छिपे हुये आंसुओं के मोती पोंछते हुये चुपचाप कॉपी देखने लगी। फिर एक ही मिनट के पश्चात तुरन्त ही छात्रा को कॉपी वापस करते हुये बोली,

‘ये लो। तुमने तो पूरा प्रश्न ही हल कर दिया है।’

छात्रा मुस्कराती हुई, पर एक संशय से न समझते हुये, प्रश्नभरी दृष्टि डालती हुई चली गई और जाकर अपनी जगह पर बैठ गई। अंतिम कक्षा का अंतिम पीरियड चल रहा था। कुछ ही मिनट और बाकी होंगें, फिर इसके पश्चात आज का दिन और काम समाप्त हो जायेगा। आहुति अपनी जगह पर बैठ कर फिर से सोचने लगी। कल ही तो वह राघव से मिल कर आई थी, मगर राघव ने ना तो उससे कुछ कहा था और न ही कुछ बात की थी। वह केवल मूक बना, जैसे बेबस सा, आहुति को बस देखता ही रहा था। बस इसी बात को वह तब से अपनी कक्षा में बैठी हुई सोच-सोचकर परेशान थी। तीन बच्चों की मां, एक अध्यापिका और पति के रहते हुये, राघव कब और कैसे उसकी जि़न्दगी में हलचल मचा बैठा, इस बात का एहसास उसे तब हुआ जब कि एक दिन वह खुद ही राघव की आंखों में अलगाव के तिनके देखने लगी थी। सोचते हुये तभी अचानक से स्कूल की समाप्ति के घंटे बजने लगे तो आहुति अपने स्थान से उठी, डेस्क के अन्दर से अपना पर्स निकाला और साड़ी की सलवटें संवारती हुई, कक्षा के बाहर निकल कर सीधी कौमन रूम की तरफ चल दी।

फिर जब घर आई, तो स्कूल से वापस आई हुई दोनों लड़कियां उसे देखते ही उससे लिपट गईं। आहुति की मां ने दोनों लड़कियों को खाना पहले ही से खिला दिया था। मां जब उसके लिये भी खाना गर्म करने लगी तो आहुति वहीं से बोली,

‘मामा, खाना गर्म मत करना। मुझे भूख नहीं है। सिर्फ चाय बना लें।’

‘दिन-रात काम करती है, फिर भी इसे भूख नहीं लगती है। न जाने कैसे रह लेती है?’ मां मन ही मन बड़बड़ाई, फिर चाय का पानी गर्म होने को रख दिया।

‘अच्छा, मैं ज़रा चेन्ज़ हो लूं। तब तक तुम्हारा भाई भी स्कूल से आ जायेगा।’ दोनों लड़कियों से कहकर आहुति अपने कमरे में चली गई। फिर जब कपड़े बदलकर और मैक्सी पहनकर वह आयने के सामने आई तो अपने रूप को देखती हुई खुद ही से जैसे मुंह चिढ़ाते हुये बोली,

‘हूं। जंगल में सजे हुये पेड़ की बहार को कोई नहीं देखता है। मूर्ख मत बन?'

अपने से ही बात करते हुये वह अपनी मां के पास आकर बैठ गई। और अपने बड़े लड़के के स्कूल से वापस आने की प्रतीक्षा करने लगी। मां ने चाय का कप लाकर रखा तो आहुति ने कप उठाकर होठों से लगाया ही था कि, मां ने फिर से उसे टोका,

‘कुछ तो खा ले। सुबह भी तू केवल चाय ही पीकर गई थी?’

‘कहा न मामा, भूख नहीं है। लगती भी नहीं है। जबरन कैसे खा लूं?’

‘तीन बच्चों का बोझ, तू खुद और साथ में मैं। तेरा आदमी भी तुझे पूछता नहीं है। सारा घर और पहाड़ सा जीवन? खायेगी नहीं तो कैसे चलेगा यह सब? मैं तो यही सोच-सोचकर दिन रात मरी जाती हूं।’ मां बड़बड़ाई और जल्दी से जाकर किचिन में से दो रोटियां और गोभी और आलू की सब्जी लेकर आई, और आहुति से बोली,

‘चल खा। नहीं तो चार बजे टयूशन वाली तीनों लड़कियां आ जायेंगी और तब तू भूखी ही उन्हें पढ़ाती रहेगी।’

‘?’ आहुति ने मां की आंखों में देखा तो वहां झील में तैरती हुई ममता की चिंता से भरी कतरनों को देखकर जैसे पसीज़ सी गई। फिर चुपचाप उसने प्लेट सामने की और रोटी हाथ में उठा ली। मां ने देखा तो जैसे सन्तुष्ट होती हुई, उठते हुये बोली,

‘अब जल्दी से खा लेना। मैं जाकर नहा लेती हूं।’

मां के चले जाने के पश्चात, आहुति ने निवाला तोड़ा और सब्जी के साथ मिलाकर जैसे ही होठों से लगाया, तुरन्त ही उसकी आंखों के पर्दे पर अतीत की एक तस्वीर उभर आई . . .’

‘चलो मुंह खोलो। लो खाओ।’ राघव के हाथ में दलिये से भरा चम्मच देखकर आहुति उसे आश्चर्य से देखकर अविश्वास से बोली,

‘आप अपने हाथों से मुझे खिला रहे हैं?’

‘क्यों? इंसानियत के नाते क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता हूं? डिप्रेशन में जीते हुये बिस्तर पर तो जा पड़ी हो। ऐसा ही रहा तो एक दिन इस दुनियां से भी चल बसोगी। कभी सोचा है कि दुनियां में क्या एक ही इंसान है जो तुम्हें चाहता होगा?’ राघव ने दूसरा चम्मच भर कर आहुति के मुख में देते हुये कहा।

‘मर जाती तो ही अच्छा था।’

‘तुम्हारे लिये अच्छा हो सकता है, पर इन तीन मासूमों का क्या होगा, जिन्हें तुमने जन्म दिया है। कभी सोचा है कि कभी-कभी इंसान दूसरों के लिये भी जि़न्दा रहता है। कहते हुये राघव ने पानी का गिलास उठाकर आहुति के होठों से लगाया तो उसने गिलास के साथ राघव के दोनों हाथ भी पकड़ लिये। ना जाने क्या सोचकर और किस आस की उम्मीद पर ?

आहुति का विवाह डेनियल के साथ केवल इक्कीस वर्ष की अवस्था में इसलिये हो गया था क्योंकि उसके विवाह में स्थानीय चर्च के पास्टर ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी। पास्टर ने ही डेनियल के बारे में आहुति की मां को बताया था। सामाजिक प्रतिष्ठा और रहन-सहन के हिसाब से आहुति और उसकी मां के लिये एक पास्टर की बात, सलाह और पसंद एक प्रकार से परमेश्वरीय निर्णय था। पास्टर की बात सिर पर रखते हुये आहुति को डेनियल के साथ बांधने के बाद पता चला कि उसकी बेटी की शादी उस आदमी से हो गई है जो पहले ही एक बीबी रख चुका है। इतना ही नहीं, शादी के कुछ ही महीनों के पश्चात आहुति को एहसास होने लगा कि उसका जीवन उस झाड़-झंकाड़ जैसे सूखे़ वृक्ष से बांध दिया गया है जिस पर कभी भी बहारें नहीं आयेंगी। एक गैर-जिम्मेदार, किसी भी संजीदगी, धड़कते हुये दिल के स्पन्दों से महरूम, आलसी और असहज व्यक्ति उसकी उस जीवन नैय्या का मांझी बन जायेगा, जिसने अभी जीवन-सागर की लहरों को स्पर्श भी नहीं किया था; सोच-सोचकर आहुति मन ही मन रोती और अपने फूटे नसीब को कोसती थी।

फिर इसी उहापोह और दिन-रात झुलसते हुये अंगारों की सेज़ पर जलते, तरसते और सुलगते हुये आहुति तीन बच्चों की मां कब बन गई, यह एहसास भी उसे तब हुआ जब डेनियेल का बच्चों की किसी भी जिम्मेदारी के लिये नकारात्मक और लापरवाही जैसा नज़रिया और व्यवहार सामने आने लगा। समय बीतता गया। आहुति से जैसे भी होता वह बच्चों को संभालती। पति क्या करता है? कितना कमाता है? यह बात ना तो कभी डेनियल ने ही बताई और पति के चिड़चिड़े मिजाज से पहले ही वाकिफ आहुति ने भी ना कभी पूछा, और ना जानने की कोशिश ही की। वह चुपचाप घर चलाने और बच्चों को पालने के लिये एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाने का काम करने लगी। घर की बीबी कमाने लगी तो डेनियेल की आदत में जैसे चार चांद लग गये। वह जो काम करता था उसको भी बिल्कुल से छोड़कर घर पर ही बैठ गया। दिन भर ठूंठ के समान घर पर बैठे रहना और समय पर भोली-भाली पत्नि की कमाई की रोटियां तोड़ना; बस यही दो काम थे, जिनका वास्ता डेनियेल से था। फिर जब ऐसा हुआ तो जाहिर था कि पत्नि भी आस करती कि जब पति कुछ नहीं करता है तो कम से कम बच्चों को ही देख लिया करे। लेकिन जब डेनियेल ने यह भी नहीं किया तो आहुति का भी सब्र का बांध टूट गया। वह एक दिन डेनियेल से बोली,

‘देख रहे हो कि मैं काम भी करूं, काम के मध्य में आकर छोटी बच्ची को दूध पिलाने आऊं और फिर से वापस जाऊं। फिर जब शाम को वापस आऊं तो खाना पकाऊं, बच्चों को देखूं, सारा घर संभालू। बुरी तरह से थक जाती हूं मैं? जानवर नहीं हूं मैं। आप कुछ नहीं तो केवल बच्चों को ही देख लिया करें?’

‘नौकरी तुमने अपनी मर्जी से की है, और बच्चों को मां पालती है आदमी नहीं।’ डेनियेल ने निहायत ही एक गंवारू उत्तर दिया तो आहुति के दिल पर जैसे छाले पड़ गये। वह बिफरती हुई बोली,

‘तो फिर आप कमाकर लाओ, मैं बच्चों को देखूंगी।’

‘मुझसे काम नहीं होता है।’ डेनियेल बोला।

‘नहीं होता है तो मत करिये। मैं करती तो हूं। आप अपने बच्चे भी नहीं देख सकते क्या?’

‘बच्चे तुमने पैदा किये हैं, तो तुम ही देखो।’

‘क्या बकवास करते हैं आप? बच्चे केवल मेरी मर्जी से ही पैदा हो गये क्या?’ आहुति का पारा सातवें आसमान पर देखा तो डेनियल फिर आगे कुछ नहीं बोला।

बात यहीं पर समाप्त नहीं हुई। रोज़ झगड़े होते। रोज़ ही तनाव बना रहता। धीरे-धीरे दोनों के मध्य अलगाव, असहजता और आपसी मन मुटाव के दायरे हर पल बढ़ने लगे। इन सब बातों का प्रभाव ऐसा पड़ा कि घर, एक घर ना होकर यातनाओं और तकलीफों का एक ऐसा पड़ाव बनता नज़र आने लगा कि जिसके उखड़ने के कोई भी संकेत नहीं दिखाई देते थे। फिर जब ज्यादा बात आगे बढ़ी तो आहुति अपने तीनों बच्चों को डेनियेल को सोंपकर अपनी मां के पास चली आई। यही सोचकर कि मां के न होने पर शायद डेनियेल बच्चों की कद्र करना सीख ले। मगर इस प्रयास का भी कोई प्रभाव डेनियेल पर नहीं पड सका। वह केवल अपने ही प्रति, और घर के लिये उदासीन और निठल्ला ना बना रहा, बल्कि बच्चों के प्रति भी बिल्कुल लापरवा और निर्लिप्त रहा तो इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी लड़की बीमार हो गई। दूसरे दोनों बच्चे भूखे-प्यासे और मां की कमी को तरसने लगे। आहुति को जब ये सब पता चला तो मां की ममता कहां तक सब्र करती? वह जाकर तीनों बच्चों को लेकर अपनी मां के घर पर आ गई। मां के साथ ही रहती हुई वह अपनी नौकरी करती और बच्चों को भी पालने लगी, इसी आस पर कि शायद कभी डेनियेल वापस आये? अपनी गलती का एहसास करे और अपने बच्चों के साथ उसको भी वापस घर ले जाये। फिर भी आहुति की सोची हुई उम्मीदों के अनुसार कोई भी बदलाव के चिन्ह नज़र आते, उसके स्थान पर सारे समाज और जान पहचानवालों के मध्य आहुति और डेनियेल के अलगाव के किस्से जरूर सुनने को मिलने लगे। लोगों की जुबान पर आहुति के चरित्र के प्रति प्रश्नचिन्ह अपनी संशय से युक्त इबारतें लिखने लगे। तब उन्हीं दिनों के मध्य आहुति को यह भी सुनने को मिला कि डेनियेल लोगों से कहता है कि, वह आहुति को रखेगा भी नहीं और उसे छोड़ेगा भी नहीं। तब इन सब बातों को सुन सुनकर आहुति के जैसे कान पकने लगे। वह बेहद परेशान रहने लगी। अक्सर ही सोचती कि ऐसा तो उसने कुछ किया भी नहीं है, और यह सजा उसे मिल रही है। अपने इन सारे हालातों के लिये कभी वह अपनी मां को दोष देती तो कभी उस पास्टर को, जिसके खुदाई जैसे निर्णय पर वह आंखें मूंदकर डेनियल का हाथ पकड़ बैठी थी। फिर दिन-रात सोचने, परेशान रहने और अंधकारमय अनिश्चित भविष्य के प्रति चिन्तित होने का परिणाम यह हुआ कि आहुति ना केवल तनावयुक्त ही हुई बल्कि बिस्तर पर जा पड़ी। बीमार हुई, इसकदर हुई कि स्वस्थ्य होने के जब कोई आसार नज़र नहीं आये तो उसकी मां भी परेशान और चिन्तित हो गई।

जिन दिनों उपरोक्त सारी परेशानियां आरंभ ही हुई थीं, और जब आहुति डेनियल के घर पर ही रह रही थी, उन्हीं दिनों राघव उसके दो बच्चों को अंग्रेजी की टयूशन पढ़ाने आया करता था। लेकिन जब आहुति अपने बच्चों के साथ अपनी मां के घर पर आ गई तो बच्चों को पढ़ाने का यह सिलसिला भी समाप्त हो चुका था। फिर भी राघव को आहुति और डेनियल के अलगाव और अलग रहने की बातें लोगों के मुख से सुनने को मिल ही जाती थीं। एक दिन जब उसे पता चला कि आहुति अपने पति के साथ मनमुटाव की समस्या के कारण बेहद परेशान है तो वह उससे मिलने उसकी मां के घर जा पहुंचा। वहां जाकर जब उसने आहुति की दशा देखी तो देखते ही दंग रह गया। आहुति का शरीर बीमारी से कम पर दिन-रात तनावग्रस्त जि़न्दगी और बिगड़े हुये हालात की गर्म हवाओं के थपेड़े सहते- सहते न केवल टूट ही चुका था बल्कि बिस्तर से भी जाकर चिपक गया था। गत् दिनों में आहुति के चेहरे की वह आभा जो कभी किसी सिंगार की मोहताज नहीं थी, अब किसी भी दम तोड़ती हुई लाश से कम नहीं लग रही थी। राघव ने कुछेक देर आहुति की मां से बात की तो पता चला कि बुरी तरह से टूट चुकी आहुति बिल्कुल भी खाना नहीं खाती है। केवल चाय या पानी पीकर ही पड़ी रहती है। तब राघव ने सारी परिथिति को जान और समझकर उसकी मां से दूध में दलिया बनाने को कहा। जब तक दलिया तैयार हुआ तब तक वह आहुति से बातें करता रहा। उसे समझाता रहा। आहुति चुपचाप सुनती रही। बोली कुछ भी नहीं। फिर जब दलिया बनाकर आहुति की मां लेकर आई तो उसे देखते ही आहुति ने खाने से मना कर दिया। तब राघव ने उसकी मां से दलिया अपने हाथ में लिया और उनसे बोला कि,

‘मां जी, आप जाइये। मैं सब देख लूंगा।’

आहुति की मां के जाने के पश्चात, राघव ने सबसे पहले आहुति को उसकी पीठ से तकिया लगाकर बैठाया, फिर चम्मच से दलिया लेकर उसके मुंह के सामने लाकर बोला, ‘चलो मुंह खोलो। लो खाओ। . . . ’

. . .सोचते हुये आहुति की आंखों से दुख और दर्द की मारी दो बूंदें टूटकर उसके गालों से ढलक गईं। मां अभी तक स्नान कर रही थी। दोनों लड़कियां अपना स्कुल का होमवर्क कर रहीं थीं। सामने दीवार पर लगी हुई यीशु मसीह की तस्वीर के पीछे किसी गौरया के बने हुये घोंसले के बिखरे हुये तिनके नीचे गिरे जाते थे। लगता था कि वह अपना घर छोड़कर जा चुकी थी। कुछेक दिन पहले उसके बच्चों की चहचहाटें इस घोंसले से सुनाई दे जाती थीं। पता नहीं उसके बच्चों का क्या हुआ होगा? सोचते ही आहुति का दिल कांप गया। थोड़े ही से पल बीते होंगें कि इतनी सी देर में आहुति अपने जिये हुये उन कड़वे दिनों को फिर एक बार दोहरा गई थी, जिनमें उसकी जि़न्दगी के भुगते हुये दिनों का दुख था। पीड़ायें थीं। शिकायते थींं और अनिश्चतता की ढलान पर टिके हुये जैसे बेमकसद आयाम थे। एक औरत का दर्द जब उसका चाहनेवाला ही न समझ सके तो फिर दूसरों की आस करना ही बेकार है। सोचते हुये आहुति का मन रो उठा।

जीवन का उसूल है कि एक जीवन से थकी और सहारे की तलाश में भटकती हुई औरत और अपने वृक्ष से टूटती हुई किसी टहनी को जब अचानक ही सहारा मिल जाये तो वह तो सहारा देनेवाले से लिपट ही जायेगी। आहुति का भी यही हाल हुआ था। अपने पति से विक्षिप्त और बिना कारण परित्यागी, तीन बच्चों का पहाड़ सा बोझ ढोहती हुई आहुति को जब राघव का सामीप्य और सहारा मिला तो फिर वह उसी में अपना मांझी तलाश बैठी। फिर जब ऐसे में एक दिन राघव ने आहुति के सामने खुद ही विवाह का प्रस्ताव रखा तो उसने भी बहुत देर में काफी सोचने और समझने के पश्चात यही सोचकर हां कह दी कि, यदि किसी पेड़ को एक स्थान से उखाड़कर दूसरी जगह पर लगाया जाता है तो नई जगह और आवोहवा मिलने के पश्चात वह फिर से जिंदा रहने के सपने देखने लगता है। डेनियल ने तो उसे एक प्रकार से त्याग ही दिया था। तीन बच्चों का पालना, उन्हें अच्छी शिक्षा देना, उनका भविष्य बनाना, विशेषकर लड़कियों का जीवन, जिन्हें मां के साथ-साथ पिता के सहारे की बेहद आवश्यकता होती है, यही सारी बातें सोचकर आहुति राघव में अपने भावी जीवन और बिगड़े हुये घर को फिर से बसाने के दिन गिनने लगी थी। राघव के सहारे की आस में उसने एक दिन बाकायदा कोर्ट में डेनियल से तलाक लेने के कागज़ जमा कर दिये और अंतिम निर्णय के लिये कोर्ट और कचहरी के चक्कर भी काटने लगी। इस तरह से लगभग तीन साल बीत गये थे, कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा में और साथ ही राघव का हमकदम बने हुये। मगर पिछले कई दिनों से राघव में अचानक से आये परिवर्तन को देखकर, अपने प्रति राघव के द्वारा अलगाव की कोशिशें देखते हुय जब वह अधिक सहन नहीं कर सकी थी तो वह उसे ख़री-खोटी सुना आई थी, और तब से इन्हीं बातों को सोच-सोचकर परेशान थी। परेशान इसलिये भी थी कि इतना सब कुछ सहने के बाद भी राघव चुपचाप उसकी हरेक बात केवल सुनता रहा था। अपने मुख से उसने आधी बात भी आहुति से नहीं कही थी।

आहुति के कुछेक दिन इन्हीं सोचों और विचारों में बीत गये। इन दिनों ना तो उसने खुद ही राघव को कोई फोन किया और ना ही राघव का ही फोन उसके पास आया। वह चुपचाप स्कूल जाती। वहां अपना काम करती। बच्चों को पढ़ाती और वापस घर आकर अपने बच्चों को देखती। रात-दिन सोचा-विचारी करके मन ही मन कुढ़ती रहती। अप्रत्यक्ष रूप से अपने परमेश्वर से शिकायतें करती। फिर जब कभी भी उसके तनाव की रस्सियां जब ज्यादा कसने लगतीं तो बच्चों को पीट भी देती थी। यही दिन चर्या थी। यही उसका जीवन फूटे हुये नसीब का वह बुलबुला था जो हर दिन और हर पल बढ़ता तो जाता था लेकिन फूटने का नाम नहीं लेता था। हांलाकि राघव की पलायनता का उसको एक एहसास तो हो गया था, मगर फिर भी मन में उसके एक आस की किरण भी थी कि राघव आज आये, कल आये, शायद आज ही आता हो?

गीली, सुलगती और आंसू बहाती तड़प-तड़पकर जलती हुई लकडि़यों के समान धुंआ देती हुई आहुति के अरमानों और हसरतों की गलती हुई लाश के समान बेबस जीती हुई जि़न्दगी के इन्हीं धुंधभरे दिनों के मध्य एक दिन तब आहुति को राघव का एक पत्र मिला तो वह चौंक गई। धड़कते और परेशान मन से उसने पत्र खोला और पढ़ने लगी,

‘आहुति,

मैं जानता हूं कि तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो। होना भी चाहिये। पिछले दिनों जो भी हालात मेरे और तुम्हारे बीच बन रहे थे, उन सबका अंजाम कुछ ऐसा ही होना भी था। तुम सोच रही होगी कि मैं तुमको सहारा देकर, तुम्हारे साथ चलते हुये, तुमसे वायदा करके अचानक ही पीछे क्यों हट गया? इसका कारण है कि मुझे ऐसा ही करना भी चाहिये था। एक शादी- शुदा स्त्री और उसके पति के रहते हुये, उससे विवाह के सपने देखना, पाप नहीं महापाप होता है, इस बात का एहसास मुझे उसी दिन से था जब मैंने तुमको अपने हाथों से, तुम्हारी दम तोड़ती सांसों को फिर से वापस लाने के लिये तुमको भोजन खिलाया था। सच पूछो, तुम्हारी दशा, तुम्हारी मरती हुई उम्मीदों और तुमको दोबारा जीने की ख्वाइश देने के लिये मेरे पास कोई दूसरा चारा भी नहीं था। मैं यदि ऐसा नहीं करता, तुमसे झूठ नहीं बोलता, तुमसे शादी करने का झूठा वादा नहीं करता, तो शायद तुम अपने जीवन की 'आहुति' देने से भी नहीं चूकती। आज तुम मुझे कोई भी सजा दे सकती हो, मगर मैं जानता हूं कि आज मैंने तुमको जि़न्दगी के जिस मार्ग पर लाकर खड़ा किया है, वहां पर चलते हुये तुम समाज और आनेवाली मुसीबतों से खुद लड़ सकती हो। अपने फैसले खुद कर सकती हो। पति की किसी भी सहायता के बगैर अपना घर खुद भी संभालने लायक हो। और यही मैं चाहता भी था। यही मेरी कोशिश भी रही थी। तुम यह भी जानती हो कि, आज जिस जगह पर मैं खड़ा हुआ हूं वहां से कानूनन, सामाजिक, धार्मिक और मसीहियत के हिसाब से कोई भी रास्ता तुम्हारी तरफ नहीं जाता है। फिर जो काम हो ही नहीं सकता है, उसकी कोशिश करना भी मूर्खता ही होगी।

मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई है। इसलिये तुम्हारा शहर, तुम्हारे गली-कूचे और तुम्हारे हरेक वे स्थान जहां पर मैं तुमसे मिला था, सदा के लिये छोड़कर जा रहा हूं। मैंने जो कुछ भी किया था, वह सब तुम्हारे भले के लिये ही। मेरा इसमें कोई भी लालच और स्वार्थ नहीं था। मेरे प्रति तुम्हारी खीज़ और नाराज़गी अपनी जगह पर है, और मेरे उसूल और कायदे कानून अपने स्थान पर। मुझे मालुम है कि तुम एक बहुत ही नेक स्त्री और ऐसी मां हो, जो मुझसे बेहद प्यार करती है, लेकिन दुख होता है कि डेनियल ऐसी भली और शालीन नारी की कद्र तक नहीं जानता है। कोई सुख या सन्तुष्टि यदि मुझे है तो यही कि तुम्हारी गलती हुई हसरतों को मैंने तुम्हारे बच्चों का मुंह देखते हुये तुम्हें एक नया जीवन देने का प्रयास किया था। अपनी इस कोशिश में, मैं यदि तुम्हें पूरी तरह से निकालने में कामयाब नहीं हुआ हूं, फिर भी तुम्हें डूबने तो नहीं दिया। अंत में, तुमसे बस एक ही उम्मीद करता हूं कि जीवन-पथ के इन कठिन मार्गों पर चलते हुये अगर मैं फिर से कभी तुम्हें मिल जाऊं तो मुझे पहचानने से इनकार मत करना।

राघव।’

आहुति ने पत्र पढ़कर समाप्त किया तो फूट-फूटकर रो पड़ी। सहेजकर रखी हुई आस्थाओं पर जब अचानक ही अविश्वास की बिजली चीख़कर गिर पड़े तो दुख तो होना ही था। जवान होती उमंगों का गला जब बेदर्दी से दबा दिया जाये तो रोने और सिर पीटने के सिवा मनुष्य कर ही क्या सकता है? जीवन में पहली बार आहुति को मानव-जीवन की इस कड़वी हकीकत का एहसास हुआ कि, किसी भी घोंसले में बैठ जाने से वह नीड़ बैठनेवाले का नहीं हो जाता है। जीवन का सच्चा आगोश तो वही होता है जो परमेश्वर बनाकर इंसान को देता है।

समाप्त.


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