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सालिगराम की चिट्ठी

सालिगराम की चिट्‌ठी

कहानियां

सुदर्शन वशिष्ठ

आख़िरकार उसने प्रधान मंत्री को चिट्‌ठी लिख डाली :

‘‘परमपूज्य परधान मंतरी जी, सादर परणाम! मैं यहां पर कुशलपूर्वक हूं और आपकी कुशलता के लिए स्रीभगवानजी से पराथना करता हूं। आगे समाचार यह है कि मजबूर हो कर आपको यह खत लिख रहा हूं। मेरे पास और कोई चारा नहीं है। बुरा न मानिएगा। मैं यह भी जानता हूं कि आप बहुत मशगूल रहते हैं........।‘‘

एकाएक लिखते लिखते उसकी कलम रूक गई। अमरूद के पेड़ पर कौआ अपना गला फुला कर और रूंधा कर ‘करड़ करड‘़ बोलने लगा।

सुबह की नवजात धूप उसे सहला रही थी। आंखें उन्नींदी हो रहीं थीं, फिर भी हाथ में कलम लिए परधान मंतरी से तार जोड़े बैठा था कि यह कौआ.........कई बार सोचा अमरूद के इस पेड़ को काट कर धराशायी कर दे। अमरूदों में पकने से पहले ही कीड़े पड़ जाते हैं। बड़का नहीं मानता कि बापू की निशानी है। उसने फुर्ती से उठ कर आंगन से पत्थर उठाया और जोर से कौए की ओर दे मारा। कौआ उसके हाथ से पत्थर निकलने से पहले ही शोर मचाता उड़ गया।

पुनः शांत होने मेें देर लगी सालिगराम को। फिर संयत हो दीवार से पीठ टिकाए बीह पर बैठ गया। उसका पेन कलम की तरह हो गया था जिसकी ट्‌यूब में स्याही नहीं भरती थी। दवात में डूबो डूबो कर लिखना पड़ता। लिखना भी क्या होता था। यह तो ऐसी आन पड़ी कि अंततः लिखना ही पड़ा। उसने दवात में पेन डुबोया और लिखने लगा :

‘‘.......... एक तो आपका नाम ही गलत है.....परधान मंतरी। अरे! मंतरी क्या होता है, चाहे परधान ही क्याें न हो। है तो मंतरी ही न। आपको तो राजा या महाराजा होना चाहिए हुजूर! मंतरी थोड़े ही हैं आप... राजा हैं, महाराजा हैं, चक्रवर्ती सम्राट हैं। अकबर और अशोक महान की तरह। मैं आपका नाम भी लिख सकता था। म्हाराज! शेर जैसे बड़े जानवरों की तरफ उंगली नहीं करते, वैसे ही बड़े आदमी का नाम नहीं लेते। खैर... अरज है कि मैं आपके सूबे की मुखमंतरी को कई सालों से चाहता हूं..... या यूं कहिए कि बचपन से ही.....।''

लिखते लिखते शर्मा गया सालिगराम। बचपन की यादों में खो गया जब वह स्कूल में उसकी सहपाठी थी। पचास साल से भी पुरानी घटना उसे अभी भी कल की बात लग रही थी। उसे याद आया एक बार उसकी दवात की सारी स्याही टाट पर गिर गई थी तो सालिगराम के दवात से कलम डूबो डूबो कर पट्‌टी लिखती रही। उसकी लिखावट बहुत ही सुंदर थी, ठीक उसके दांतों की तरह। तब वह कठोर और भारी भरकम मुख मंतरी नहीं, नन्हीं गुड़िया सी थी। दवात में कलम डूबोने को ‘जोह्‌के लेना‘ कहा जाता था। उसने बहुत ही पतली, मुलायम और नेहभरी आवाज में पूछा था :‘‘ जोह्‌के देगा सल्लू....।‘‘ उसे कोई जबाब देते नहीं बना और टिन के दवात से रबड़ का ढक्‌कन टक्‌ से खोल दिया। दवात पकड़े बैठा रहा सल्लू न जाने कितनी देर जब तक पट्‌टी सुंदर अक्षरों से भर नहीं गई। आधी छुट्‌टी में सब बच्चे खेलने चले गये थे। उसका ध्यान तब टूटा जब किसी ने टन्‌ टन्‌ स्कूल की घण्टी बजाई।

कौआ फिर वापिस अमरूद पर आ बैठा था। बहुत गुस्सा आया सालिगराम को। इस बार वह उठा नहीं। मन ही मन भाई को कोसने लगा कि अमरूद काटने नहीं देता। गुस्सा पी कर वह लिखने लगा :

''..... मैं उसे दिलोजान से चाहता हूं जनाब! वह मुझे बिल्कुल नहीं मानती। तेज दिमाग और अमीर तो वह पहले से ही थी और अब तो...... मैं राष्ट्रहित में सालों से सह रहा हूं। देश की ख़ातिर मुझे उसे मनाना पड़ता है। आप जानते हैं राष्ट्रहित में कई चीजों को नज़रअंदाज करना पड़ता है.... आप तो राजा है, महाराजा हैं, पूरे मुल्क के सरताज हैं। वह आपकी सूबेदारनी है। वह सूबे का काम भी करे, करती रहे। मुझे क्या! मैं उसे रोकूंगा नहीं पर......। अब आप ही उसे समझाइए......।''

इतने में घरवाली चाय ले आई।

''पकड़ो..... यह क्या लिखने बैठ गए सुबह सुबह..... कुछ काम ही करो। डंगरों का गोबर ही उठाओ.....।''

आंखें लाल हो गईं सालिगराम की। लाल डोरे घुमाता हुआ बोला :''चल हट! गंवार कहीं की। देखती नहीं औरतें मुख मंतरी और परधान मंतरी तक बन गईं और तू है कि अभी भी गोबर उठाने की बात कर रही है। उम्र भर डंगर चरा कर डंगर ही बन गई। मूरख!''

घरवाली सुबह ही तकरार से बचने के लिए चुपचाप भीतर चली गई।

सुड़प!सुड़प!!सुड़प!!! कर चाय पीने से उसका तनाव कम हुआ और चेहरे पर मुसकराहट आ गई। ख़त को उसने इस दोहे से पूरा किया :

‘‘समुद्र में पानी है बहुत घड़े में भरा नहीं जाता

दिल में तो बहुत था ख़त में लिखा नहीं जाता।

चिठी लिखी है खून से स्याही न समझना

मरता हूं याद से जीता न समझना।

———लिखने वाले की तरफ से पढ़ने वाले को राम!राम! जय हिंद!''

थूक से लिफाफा बंद कर किया और बाहर पता लिख दिया :‘‘देस के परधान मंतरी। दिल्ली वासी, नई दिल्ली।'' एक ओर अपना पता भी लिख डाला :''पं0 सालिगराम ‘सेहरे वाले' बमुक़ाम बंदला मौज़ा राजपुर बरास्ता पालमपुर, बिलासपुर सदर।‘‘

बहुत दिनों से प्रधान मंत्री को लिखने की सोच रहा था। हिम्मत नहीं हुई। कुछ दिन पहले पालमपुर भाषण देने गया तो अखबार में एक खबर पढ़ी। अखबार में मोटे अक्षरों में लिखा था :''अन्ना हजारे ने लिखा प्रधान मंत्री को पत्र!'' नीचे की लाईनों में यह खुलासा था कि प्रधान मंत्री अन्ना हजारे के पत्र से एकदम थर थर कांप उठेंगे जैसे पत्र नहीं, तीर छोड़ा गया है।..... अरे! तू भी परधान मंतरी को सूबे की मुख मंतरी के ढिलमुल रवैये के प्रति चेता सकता है......तू भी तो पुराना फौजी है।

दो महीने तक खत का कोई उत्तर नहीं आया। वह रोज डाकिए को पूछता रहता।

लगभग अढ़ाई महीने बाद सलिगराम के घर थाने से दो सिपाही आ धमके। वह उस दिन घर नहीं था, भाषण देने पालमपुर गया था। वे घर वालों को धमका कर उसे अगले दिन थाने में हाजिर होने का हुक्म दे गए।

रात बड़के ने उसे फटकारा... कुछ न कुछ उपद्रव जरूर किया है। सुबह ही थाने चले जाना।

पालमपुर तो वह दूसरे तीसरे दिन जाता ही रहता था। सुबह टहलता हुआ थाने पहुंच गया।

‘‘एह चिट्‌ठी तूं लिक्खी है....!‘‘ थानेदार ने एक कागज दिखाते हुए उसे पूछा। वह केवल मुसकाया, बोला कुछ नहीं।

''एह तेरे दस्तखत हैगे न.......।'' वह फिर मुसकाया।

‘‘ओए मादर.... तूं हस्स रिया। तैंनू पता है तूं किन्ना बड्‌डा जुर्म कित्ता है.... करो ओए इस नूं अंदर......।‘‘

थानेदार बाघ की तरह चिंघाड़ा तो अब की बार वह सहम गया।

‘‘सीएम नूं की समझदा ओए तूं...... सौरी दिया...।‘‘ थानेदार ने सख्त बूट की ठोकर मारी तो वह सीधा जमीन पर आ गिरा। दो सिपाहियों ने लात घूंसों से पीटते हुए उसे हवालात में बंद कर दिया।

तगड़ा फौजी रहा था, हवालात में लात खा कर भी मुसकाता रहा।

अगले दिन उसका भाई लम्बरदार को ले कर थाने आ पहुंचा। लम्बरदार ने थानेदार को अलग ले जा कर बात की :''जनाब! ये बंदा ठीक नहीं है। घर से भाग कर फौज में भरती हो गया था। रंगरूटी छुट्‌टी आने पर बाप ने शादी कर दी। पांच छः साल नौकरी करने के बाद छोड़ छाड़ कर आ गया। कई साल तो पेंशन भी नहीं लगी। घर तो इसके बड़े भाई ने सम्भाल रखा है। ये तो इधर उधर घूमता रहता है। हर कहीं खड़ा हो कर भाषण देने लगता है। कभी यहां रहता है, कभी कहीं और चला जाता है। इसका कोई ठौर ठिकाना नहीं है।‘‘

‘‘ओए! पर सीएम मैडम नूं....तुसीं समझ रहे हो न मेरी गल्ल।‘‘ थानेदार चिल्लाया।

‘‘जी जनाब! पर इस दे परिवार वल्ल वेखो जनाब!‘‘ कहते हुए लम्बरदार ने हजार के नोट थानेदार की जेब में सरका दिए। थानेदार नरम पड़ गया।

‘‘जे बचणा है तां इक सर्टिफिकेट बणा देओ भई इस दी दमागी हालत ठीक नईं....असीं भी तां उप्पर जबाब देणा है।........ ओए पर सीएम मैडम नूं... शर्म कर ओए कमिनियां शर्म कर....ओ मरजाणया.....।'' थानेदार ने हवालात की ओर देखते हुए कहा, ‘‘छड देओ ओए इस रांझण नूं... छड देओ।‘‘

घर आने पर वह तीन दिन तक बिस्तर से नहीं उठ पाया। गूदड़ों से लपेटी गरम ईंट का सेंक देने पर चीख उठता। घर वाली रात को दूध में हल्दी की गांठ उबाल कर पिलाती रही। तब उठने काबिल हुआ।

पांचवें दिन देखा, तो बिस्तर में नहीं था। सोचा, जंगल पाणी गया होगा। होते होते दोपहर हो गई। शाम ढल गई। ढोर डंगर चुग कर वापस आ गए। पंछी घरों को लौट आए। वह नहीं आया।

घर से तो वह पहले भी जाता रहता था। खासकर चुनाव के दिनों में वह गले में फूलों का हार डाले सबसे अलग खड़ा हो भाषण देता। घर मैडम के चुनाव क्षेत्र में ही पड़ता था। पिछले चुनाव में जब मैडम की पार्टी की हार हुई तो जहां जहां मैडम जाती, वहां वहां पहुंच जाता। जोर जोर से मैडम जिंदाबाद के नारे लगाता। दूसरी बार सीएम बनने पर मैडम उसकी पहुंच से बहुत दूर हो गई।

सुबह की बस पकड़ वह राजधानी पहुंच गया। राजधानी में भतीजा रहता था। वह सचिवालय में काम करता था। उसके घर डेरा जमा दिया। सुबह ही खा पीकर बाजार निकल जाता और अन्धेरा होने से पहले डेरे पर लौट टी0वी0 देखता रहता।

तेज दिमाग तो था ही, उसने राजधानी में भी भाषण करने की जगह ढूंढ ली।

आज वह शेरे पंजाब रेस्तरां के पास खड़ा हो भाषण दे रहा था। आधी हिन्दी, आधी पहाड़ी, कुछ पंजाबी। लोग समझ रहे थे या नहीं, इसकी उसे परवाह नहीं थी। कोई आता जाता उसे ध्यान से देखता, कुछ सुनता और आगे बढ़ जाता। लोअर बाजार के प्रवेश से पहले शेरे पंजाब रेस्तरां के साथ एक रास्ता भर जगह थी जहां लोअर बाजार की ओर से आने वाले जलसे जुलूस आ कर रूक जाते क्योंकि माल रोड़ पर जाने की इजाजत नहीं थी। अतः यहीं खड़े हो कर नेता लोग भाषण देते। आसपास दस बीस लोग जमा हो जाते। लोअर बाजार आना जाना मुश्किल हो जाता। लाल, भगवां, तिरंगे झंडे वाले, व्यापार मण्डल, कर्मचारी नेता, तिब्बती शरणार्थी सब यहां आ रूक जाते।

आज उसने बड़े बड़े गेंदे के फूलों की माला पहन रखी थी। सिर की टोपी पर कलगी थी। दोनों ओर सेहरे की तरह गेंदे के फूल लटके हुए थे। आंखों में सुरमा डाला हुआ था, नाखूनाें में लाल नेल पॉलिश। हाथ में सोटी घुमाता हुआ वह जोर जोर से बोल रहा था :

‘‘संविधान ने मुझे बोलने का हक दिया हुआ है...विवाह करने का हक भी दिया हुआ है। मैं अपनी मरजी से कहीं भी विवाह कर सकता हूं। मेरे हक हकूक कोई नहीं मार सकता.... अरे! इतना लम्बा चौड़ा ब्राह्‌मण का छोकरा और देखो उसे, कहां बैठ गई हलवाई के साथ...।'' एकाएक वह गुस्से में आ गया। आंखों में लाल लाल डोरे उभर आए। सोटी हिलाता हुआ वह लोअर बाजार की ओर उतर गया।

कुछ साल पहले सीएम मैडम ने चुनाव में पार्टी की हार के बाद एक होटेलियर से विवाह कर लिया था। होटेलियर बनने से पहले उसकी हलवाई की दूकान थी।

थोड़ी देर बाद वह पुनः उसी स्थान पर आ खड़ा हुआ और जोर जोर से बोलने लगा : ‘‘देखो... इस मुल्क का इन्होंने बेड़ा गर्क कर दिया। इन से तो अंग्रेज ही अच्छे थे। अंग्रेज कद्रदान था। न्याय करता था। नरमदिल था। मेहरवान था। उसने कई तरक्की के काम किए। अस्पताल बनवाए, स्कूल खुलवाए। वह यहां से लूट कर सात समुद्र पार अपने घर कुछ नहीं ले गया। सब का सब यहीं छोड़ गया।..... गोरे गोरे ही थे। और ये काले अफसर। बाहर से भी काले और अंदर से भी काले......साले।''

उसने सोटी घुमाई जो एक राहगीर को लगते लगते बची :‘‘और ये मूरख मुख मंतरी... कहां एक हलवाई के घर बैठ गई। इतना बड़ा लम्बा तगड़ा पण्डत का छोकरा नहीं दिखा इसे......।'' वह जोर जोर से हंसने लगा।

मालरोड़ की रेलिंग पर खड़े लोग बतिया रहे थे :

‘‘ये है कौन! किस पार्टी का है!‘‘

‘‘अरे, होगा किसी पार्टी का। इतनी पार्टियां हैं आजकल। किसी न किसी का तो होगा।‘‘

‘‘कई बातें तो बड़ी समझदारी की करता है।''

‘‘कोई हिला हुआ है.....या मसखरा है।''

''अरे! हिला हुआ नहीं है। बातें क्रांति की करता है। हिले हुए तो हम हैं इस गुलाम आजादी में।‘‘

''किसी पार्टी का पेड वर्कर है जो रोज ही भाषण देता है।''

‘‘एएसआई का एजेंट भी हो सकता है।‘‘

‘‘नहीं नहीं भईया! लगता तो हिन्दुस्तानी ही है। ऐसा काम हिन्दुस्तानी ही कर सकते हैं।''

दो दिन बाद भतीजे के घर में सादा लिबास में पुलिस वाले पूछताछ करने आ गए।

‘‘ये आदमी आपके पास रहता है.......,‘‘ उन्होंने सालिगराम का बहुत पुराना मगर एकदम जवां, फौजी वर्दी वाला फोटो दिखाया। पहले तो पहचाना ही नहीं गया।

‘‘यहां तो नहीं रहते, एक दो दिनों से गांव से यहां आए हुए हैं।''

‘‘इनके पीछे सीआईडी पड़ी है... दिल्ली से इंस्ट्रक्शन आई हैं। सावधान रहिए। प्राब्लम आ सकती है।''

भतीजा अगले ही दिन वापसी का टिकट ले आया।

''आप का टिकट लाया हूं। सीट बुक करवा दी है, सुबह साढ़े सात बजे। बस सीधी पालमपुर जाएगी।''

टिकट हाथ में पकड़े मुसकाया सालिगराम :''बच्चू! अब घर जाऊंगा तो घर वाली नाराज होगी। कहेगी फिर चला गया था उस जादूगरनी के पास। देश हित में अब उसे भी मनाना होगा। बच्चू! कई चीजें ऐसी हैं जो राष्ट्रहित में नजरअंदाज करनी पड़ती हैं। तू तो पढ़ा लिखा है भतीजे। जब अन्ना हजारे परधान मंतरी को खत लिख सकते हैं तो मैं क्यूं नहीं! असल बात यह है कि इन लोगों की मंशा ठीक नहीं है।‘‘

सालिगराम ने माथे से लगाते हुए टिकट कोट की अगली जेब में सम्भाल कर रख लिया।

94180—85595 ‘‘अभिनंदन'' कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009

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