×

लघुकथा ओनलाईन किताबें पढ़ें अथवा हमारी ऐप डाऊनलोड करें

    नयी सहर
    by Ankita Bhargava
    • (5)
    • 94

    निधी के सोने जाने के बाद पीछे पीछे मोहित भी अपने कमरे में चला आया वह मुंह दूसरी ओर किये लेटी थी मोहित समझ रहा था वह ...

    निवि
    by Anjali Raghuvanshi
    • (2)
    • 35

    आठ साल हुए, काफी अरसे बाद मैं उनसे मिलने वाला था, वो अपना शान्त सा पहाड़ी शहर छोड़ के दिल्ली में एक कॉलेज की प्रोफेसर थी, कभी सोचता हूँ ...

    अयं नृलोके
    by Bhargav Patel
    • (0)
    • 59

    आजकल ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्मियाँ असह्य होती जा रही हैं। कई स्थानों पर तो तापमान ४६-५० डिग्री तक पहुँच जाता है। ऐसे में सर्वाधिक कष्टदायी ग्रीष्म लगता है। ...

    एक नींद हज़ार सपने
    by Anju Sharma
    • (0)
    • 45

    उस नामुराद रात का दूसरा पहर भी बीत चुका था! दिन भर की चहलकदमी और तमाशे से ऊबी गली अब चाँद के साए में झपकियां ले रही थी और ...

    मुक्ति और भय
    by Shraddha Thawait
    • (0)
    • 19

    वह पिछले पैतीस वर्षों से रोज अपने ऑफिस में कलम घिसते आ रहे थे, इस आशा में कि यह घिसाई शायद किसी के हित का हेतु बन जाये, पर ...

    कांट्रैक्टर - 1
    by Arpan Kumar
    • (7)
    • 116

    सब अपने-अपने हिसाब से नौकरी करने आए थे। सब अपने-अपने हिसाब से नौकरी किए जा रहे थे। अगर देखा जाए तो आख़िरकार कोई ऑफिस भला क्या होता है! राजनीति ...

    मातमी जलसा
    by Saadat Hasan Manto
    • (3)
    • 71

    रात रात में ये ख़बर शहर के इस कोने से उस कोने तक फैल गई कि अतातुर्क कमाल मर गया है। रेडियो की थरथराती हुई ज़बान से ये सनसनी ...

    चम्पा चुड़ैल
    by Swatigrover
    • (17)
    • 163

    बड़ी देर से खुद को शीशे मैं निहारते हुए बोली, "कि अब  पहले  से  ज्यादा  डरावनी  लग  रही हूँ । त्वचा  बिलकुल  काली  हो  गई  हैं । और  धीरे-धीरे  कुत्ते  के  ...

    भव्यता में भयावहता भी होती है
    by Sushma Munindra
    • (3)
    • 44

    कॉंल बेल की घ्वनि सुन माधुरी बाहरी बरामदे में आई। शुक्ला प्रणामी मुद्रा में तैनात मिले — ‘‘मैडम, मैं शुक्ला। टी.सी. । आप और डॉंक्टर साहब जबलपुर जा रहे थे। ...

    माई नानकी
    by Saadat Hasan Manto
    • (8)
    • 158

    इस दफ़ा मैं एक अजीब सी चीज़ के मुतअल्लिक़ लिख रहा हूँ। ऐसी चीज़ जो एक ही वक़्त में अजीब-ओ-ग़रीब और ज़बरदस्त भी है। मैं असल चीज़ लिखने से ...

    काँटों से खींच कर ये आँचल - 1
    by Rita Gupta
    • (1)
    • 79

    क्षितीज पर सिन्दूरी सांझ उतर रही थी और अंतस में जमा हुआ बहुत कुछ जैसे पिघलता जा रहा था. मन में जाग रही नयी-नयी ऊष्मा से दिलों दिमाग पर ...

    अनंत यात्रा..
    by Arpan Kumar
    • (3)
    • 75

    माधुरी सांगवान हरियाणा में पली-बढ़ी एक महिला हैं। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं। अपने दोनों बच्चों को अपने साथ रखकर। वे एक महत्वाकांक्षी और सजग महिला ...

    आज शाम है बहुत उदास
    by Anju Sharma
    • (2)
    • 48

    लोहामंडी..… कृषि कुंज...… इंदरपुरी...… टोडापुर .....ठक ठक ठक.........खटारा ब्लू लाइन के कंडक्टर ने खिड़की से एक हाथ बाहर निकाल बस के टीन को पीटते हुये ज़ोर से गला फाड़कर ...

    माई जनते
    by Saadat Hasan Manto
    • (4)
    • 66

    माई जनते स्लीपर ठपठपाती घिसटती कुछ इस अंदाज़ में अपने मैले चकट में दाख़िल हुई ही थी कि सब घर वालों को मालूम हो गया कि वो आ पहुंची ...

    नृत्यांगना सुरभि
    by Ved Prakash Tyagi
    • (9)
    • 123

    नृत्यांगना सुरभि सुरभि ने अपनी माँ को मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन टस से मस नहीं हुई, भैया, भाभी और पिताजी को इस बारे में अभी कुछ बताया ...