Banna Upadhyaksh Akadmi ka Sudarshan Vashishth द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Banna Upadhyaksh Akadmi ka

बनना उपाध्यक्ष अकादमी का

व्यंग्य

सुदर्शन वशिष्ठ

‘‘मुबारक हो.....मुबारक हो.....!'' सुबह ही फोन बज उठे।

कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की चिंताएं ओढ़ सोते हैं, दूसरों की चिंताओं से जागते हैं। और उठते ही फोन दबाना शुरू कर देते हैं। कई लोग तो फोन पर अख़बार की बेहूदा ख़बरें पढ़ कर सुनाने लग जाते हैं।

सब से पहला फोन उस लेखक कहलाने वाले रचनाकार को था जो पिछले कई साल से लिखना छोड़ चुका था। लगभग बीस साल से मसि कागद छुयो नहीं, कलम गहि नहीं हाथ; फिर भी बोल उठेः

‘‘भई! आप जैसे लोगों को ही ऐसे पदों पर आना चाहिए।.......आप बैठेंगे कहां, कार्यालय कहां होगा!'' वे चिंतातुर और व्यग्र से लगे।

दूसरा फोन एक संपादक का था जिसे अपने सिवा सब साहित्यकारों में अवगुण ही अवगुण दिखते थे : ‘‘किसी ने तो आप की कद्र की....वरना लिखारी तो कई हैं।''

‘‘अरे! भई, कुछ मिलेगा भी!'' तीसरा अपनी पीड़ा छिपा नहीं पाया।

‘‘कार कौन सी ले रहे हैं...एस्टीम या स्कोर्पियो! नोवा या स्कोडा! हम भी झण्डी वाली कार में घूंमेगे।''

जिस बात का डर था, वही होने जा रहा था। निर्मोही ने संकोचवश किसी अख़बार को भनक नहीं लगने दी थी। वैसे भी अख़बार में ख़बर दी कुछ जाती है तो छपता कुछ है। नेगेटिक ख़बरों का जमाना है, सेंसेशनल ही छापेंगे। और नहीं तो हैडिंग ही उल्टा दे देंगेे। इस बीच एक हितैषी अधिकारी ने अख़बार में बयान दे डाला और छोटी सी खबर छप गई। छोटे से कॉलम में ख़बर ऐसी नहीं थी कि एकदम पढ़ ली जाए मगर दो पंक्तियों की इस ख़बर से बहुत लोगों के कान खड़े हो गए....अरे! पंकज निर्मोही को उपाध्यक्ष बना दिया.....बनाया नहीं, वह अपनी कोर्िशश से बना है, बड़ा मीसणा है, उसे यूं न समझो.....कॉफी हाउस, चायघरों में खुसर फुसर होने लगी। कुछ ने गुप्त मन्त्रणा कर इस गलत नियुक्ति के ख़िलाफ ख़बर छपवाने का ड्राफट भी बना डाला कि किसी छद्‌म नाम से जड़ देंगे।

.... हां, भई इतने लम्बे समय से संस्कृति विभाग से जुड़े रहे हो, साहित्यकार भी हो। तुम से ज्यादा उपयुक्त व्यक्ति और कौन हो सकता है...... एक मित्र से लगने वाले वरिष्ठ साहित्यकार ने रूंधे हुए गले से थूक निगलते हुए लम्बा उच्छवास लेते हुए आवाज निकाली।....अरे! थोक में किताबें लिखने से थोड़े ही कोई साहित्यकार हो जाता है। गुलेरीजी को देखो, तीन ही कहानियां लिखीं और मशहूर तो केवल एक ही हुई फिर भी सभी उनका लोहा मानते हैं। बहुत किताबें छपवाने से कोई साहित्यकार नहीं बना जाता, क्वालिटी तो चाहिए न....दूसरा गुर्राया।

यूं तो सरकार में अनेकों बोर्ड, निगम और संस्थान होते हैं जिनमें मन्त्री, जीते या हारे हुए एमएलए और पार्टी के वरिष्ठ नेता अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तैनात किए जाते हैं। कई संस्थानों के अध्यक्ष स्वयं मुख्यमन्त्री होते हैं तो उपाध्यक्ष कोई अन्य भाग्यशाली। प्रायः उपाध्यक्ष को वेतन, भत्ते, कार्यालय, पी0ए0, वाहन, सरकारी आवास आदि सुविधाएं दी जाती हैं। कईयों को तो केबिनेट मन्त्री तक का दर्जा दे दिया जाता है।

साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष और उस पर तुर्रा यह कि साहित्यकार लगाया जाए, कुछ अजीब सी बात थी। पत्रकार लगा दिया जाता तो भी कोई आपत्ति न थी। अतः अधिसूचना जारी होने में काफी समय लग गया। गर्भाधान से ले कर प्रसव तक जितना समय लगता है, उतना ही समय अधिसूचना निकलने में लगा। कुछ घनिष्ठ और करीबी मित्रों ने इस साहित्यिक अधिसूचना में कई कुछ लिखवा दिया।

एक अविकसित और अपंग बच्चे की तरह अधिसूचना सचिवालय के गर्भ से विकट पीड़ा के बाद निकली। संस्कृति सचिव नामधारी पिता द्वारा जारी इस अधिसूचना में ‘‘आप उपाध्यक्ष नहीं होंगे''...यह वाक्य ही नहीं था, बाकि तमाम नकारात्मक वाक्य उसमें जोड़ दिए गए थे...... बेशक आप उपाध्यक्ष है, उपाध्यक्ष के नाते आप किसी प्रकार की बैठक की अध्यक्षता नहीं करेंगे; आपको किसी प्रकार का मानदेय देय नहीं होगा, आपको अकादमी की कोई फायल नहीं भेजी जाएगी, आपका किसी प्रकार का दखल अकादमी में नहीं चलेगा, कोई भी कार्यक्रम आप बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के तय नहीं कर पाएंगे आदि आदि। हां, एक सकारात्मक वाक्य था कि आपको अकादमी की जनरल हाउस की बैठक में आने और बैठने के लिए नियमानुसार टी0ए0 डी0ए0 दिया जाएगा। यह बात अलग थी कि जनरल हाउस की बैठक सरकार के पांच साल के कार्यकाल में एकाध बार ही हो पाती थी और कई बार तो होती ही नहीं और सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर चली जाती।

उपाध्यक्ष की नियुक्ति की यह अधिसूचना, अधिसूचना कम और ‘ज्ञापन' या ‘कारण बताओ नोटिस' ज्यादा लग रही थी।

हां, निर्मोही से पहले भी एक बदनसीब साहित्यकार उपाध्यक्ष बना था। उसे कार्यालय में बैठने की तो क्या खड़े होने की जगह भी नहीं मिल पाई थी। वह उपाध्यक्षी का तगमा लिए अकादमी के बाहर छटपटाता रहा।

जब एक मेहरवान अधिकारी ने आग्रहवश उपाध्यक्ष की फाईल चलाई तो कुछ साहित्यकार मित्रों (?) ने आश्वासन दिया था कि हम आपके उपाध्यक्ष बनने का विरोध नहीं करेंगे।

......सरकार की अधिसूचना गर्भ में हाथ डाल कर निकालनी पड़ती है, एक ने कहा था। 'वर्डिंग' ठीक तरह से लिखवा लेना नहीं तो कोई ऐसी घुण्डी मार देगा कि न निगलते बनेगा न उगलते। और वैसा ही हुआ। अधिसूचना में लिखा था : बहूए सारा घर तेरा पर देखणा कहीं हाथ लगाना।

यह साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष क्या होता है! किसी ने पूछा। पर्यटन का उपाध्यक्ष सुना है, परिवहन का उपाध्यक्ष सुना है, सहकारी बैंक का भी सुना है, जंगल पानी, पशु पक्षी, भेड़ ऊन, रेत बजरी, ईंट पत्थर, कूड़ा कर्कट का उपाध्यक्ष सुना है; यह साहित्य का उपाध्यक्ष पहली बार सुना। और वह भी एक लखारी! अरे! लखारियों, पढ़ने पढ़ाने वालों के लिए क्या स्कूल कॉलेज बंद हो गए जो राजनीति में हाथ पांव मारने लगे! एक एमएलए ने बहकावे में आ कर इतना तक कह दिया कि मैंने यह साहित्य संस्थान ही बंद करवा देणा.... न रहणा बांस न बजणी बंसरी.....। जितने मुुंह उतनी बातें फैलने लगीं। उपाध्यक्ष का उच्चारण करते हुए साहित्यकार एक दूसरे पर मुंह से पान की पीक और थूक झाड़ने लगे।

हरियाणा में रेत बजरी का उपाध्यक्ष बहुत बड़ा आदमी होती है। जब वह हिमाचल आता है तो एके 47 लिए गन मैन उसके आगे पीछे रहते हैं। उसकी गाड़ी इतनी बड़ी है कि पूरा जहाज लगता है। पंजाब में ईंट पत्थर का उपाध्यक्ष है। जब कभी वह मॉल रोड़ पर आता है तो चारों ओर काले पकड़े सिर पर लपेटे कमाण्डो घेरा डाले रखते हैं।

अपनी दयनीय स्थिति देख बहुत दिन दुखी रहा निर्मोही। जब वह बाजार जाता, कोई न कोई साहित्यकार मित्र फब्ती कसता.... देखो तो वे आ रहे हैं उपाध्यक्ष....अरे भई रास्ता छोड़ो।

आसपास के त्रस्त वातारण को देख अंततः निर्मोही के मन में अपनी लेखक बिरादरी के प्रति करूणा जाग उठी। कुछ दिनों बाद बड़ी मेहनत से त्याग पत्र का ड्राफ्‌ट तैयार किया। कहानी के ड्राफ्‌ट की तरह तीन चार बार लिख कर बदला। कभी गुस्से में फाड़ा, फिर लिखा। एक एक शब्द चुन चुन कर दुरूस्त किया।

अब तक सचिवालय में फेरबदल हो चुका था। पहले के संस्कृति सचिव दिल्ली भेज दिए गए थे। सचिव का कमरा वही था मगर उनकी जगह अब नए सचिव विराजमान थे।

निर्मोही ने बड़ी दरियादिली और लापरवाही से त्यागपत्र संस्कृति सचिव के सामने रख दिया। उन्होंने एक नजर उस पर डाली और शालीनता से पूछा :

‘‘क्या क्या सुविधाएं मिल रहीं हैं आपको?''

‘‘सुविधा तो कुछ नहीं, बस दुविधा ही दुविधा है।'' धीरे से बोला निर्मोही।

''तो रहने दीजिए न। त्याग पत्र देने की क्या जरूरत है.....यह कोई प्रधानमन्त्री का त्यागपत्र थोड़े ही है। लीजिए, रख लीजिए।''

किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया निर्मोही।

‘‘मुख्यमन्त्री हैं न इस अकेडेमी के अध्यक्ष! अरे! आप तो मुख्यमन्त्री के बाद नम्बर दो पर हैं। सेकैण्ड न कमॉण्ड हैंं.....चाय लाना...।'' उन्होंने सामने खड़े चपरासी और निर्मोही से एक साथ कहा।

त्यागपत्र हाथ में लिए कुछ बोल नहीं पाया निर्मोही।

‘‘देखिए, मैं इस क्षण संस्कृति सचिव हूं। हो सकता है शाम होते होते प्रकृति सचिव बन जाऊं। हमें तो अगले पल का पता नहीं होता........आप लेखक लोग भी बड़े इमोशनल होते हैं,,,आई नो।'' सचिव ने धीमे कहा।

सचिव द्वारा मुसकराते हुए सहज भाव से लौटाया त्यागपत्र उस जेब में जैसे सहेज कर रख लिया निर्मोही ने जिससे कल ही बटुआ खोया था। बटुए में रूपए पैसे तो नहीं थे, मान मर्यादा जरूर थी।

(94180—85595)

सुदर्शन वशिष्ठ

जन्म : 24 सितम्बर, 1949. पालमपुर हिमाचल प्रदेश (सरकारी रिकॉर्ड में 26 अगस्त 1949)।

125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन।

नौ कहानी संग्रह : (अन्तरालों में घटता समय, सेमल के फूल, पिंजरा, हरे हरे पत्तों का घर, संता पुराण, कतरनें, वसीयत, नेत्र दान तथा लघु कथा संग्रह : पहाड़ पर कटहल)।

चुनींदा कहानियों के चार संग्रह : (गेट संस्कृति, विशिष्ट कहानियां, माणस गन्ध, इकतीस कहानियां)।

दो लघु उपन्यास : (आतंक, सुबह की नींद)। दो नाटक : ( अर्द्ध रात्रि का सूर्य, नदी और रेत)।

एक व्यंग्य संग्रह : संत होने से पहले।

चार काव्य संकलन : युग परिवर्तन, अनकहा, जो देख रहा हूं, सिंदूरी सांझ और खामोश आदमी।

संस्कृति शोध तथा यात्रा पुस्तकें : ब्राह्‌मणत्वःएक उपाधिःजाति नहीं, व्यास की धरा, कैलास पर चांदनी, पर्वत से पर्वत तक, रंग बदलते पर्वत, पर्वत मन्थन, पुराण गाथा, हिमाचल, हिमालय में देव संस्कृति, स्वाधीनता संग्राम और हिमाचल, कथा और कथा, हिमाचल की लोक कथाएं, हिमाचली लोक कथा, लाहौल स्पिति के मठ मंदिर, हिमाचल प्रदेश के दर्शनीय स्थल, पहाड़ी चित्रकला एवं वास्तुकला, हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक संपदा।

हिमाचल की संस्कृति पर छः खण्डों में ‘‘हिमालय गाथा‘‘ श्रृंखला :देव परम्परा, पर्व उत्सव, जनजाति संस्कृति, समाज—संस्कृति, लोक वार्ता तथा इतिहास।

सम्पादन : दो काव्य संकलन : (विपाशा, समय के तेवर) ; पांच कहानी संग्रह : (खुलते अमलतास, घाटियों की गन्ध, दो उंगलियां और दुष्चक्र, काले हाथ और लपटें, पहाड़ गाथा)।

हिमाचल अकादमी तथा भाषा संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश में सेवा के दौरान लगभग सत्तर पुस्तकों का सम्पादन प्रकाशन। तीन सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।

सम्मान : जम्मू अकादमी तथा हिमाचल अकादमी से ‘आतंक‘ उपन्यास पुरस्कृत;

साहित्य कला परिषद्‌ दिल्ली से ‘नदी और रेत‘‘ नाटक पुरस्कृत। हाल ही में ‘‘जो देख रहा हूं'' काव्य संकलन हिमाल अकादमी से पुरस्कृत। कई स्वैच्छिक संस्थाओं से साहित्य सेवा के लिए सम्मानित।

देश की विगत तथा वर्तमान पत्र पत्रिकाओं : धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से ले कर वागर्थ, हंस, साक्षात्कार, गगनांचल, संस्कृति, आउटलुक, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य आदि से रचनाएं निरंतर प्रकाशित। राष्ट्रीय स्तर पर निकले कई कथा संकलनों में कहानियां संग्रहित।

कई रचनाओं के भारतीय तथा विदेशी भाषाओं मेें अनुवाद। कहानी तथा समग्र साहित्य पर कई विश्वविद्‌यालयों से एम0फिल0 तथा पी0एचडी0.।

पूर्व सचिव/उपाध्यक्ष हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी ; उपनिदेशक/निदेशक भाषा संस्कृति विभाग हि0प्र0।

पूर्व सदस्य : साहित्य अकादेमी दिल्ली, दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।

वर्तमान सदस्य : सलाहकार समिति आकाशवाणी; हिमाचल राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, विद्याश्री न्यास भोपाल।

पूर्व फैलो : राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्‌ भारत सरकार

सीनियर फैलो : संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार।

संपर्क : ‘‘अभिनंदन‘‘ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009.हि0प्र0

फोन : 094180—85595 (मो0) 0177—2620858 (आ0)

ई—मेल : vashishthasudarshan@yahoo.com